महाराष्ट्र में #BeefBan पर त्वरित प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण के उपरान्त बोध हो रहा है की अगर एक साथ सम्पूर्ण भारत में गौ हत्या निषेध अधिनियम लागू कर दिया जाता तो क्या गृह युद्ध छिड़ जाता ? केरल कर्नाटक पश्चिम बंगाल तमिलनाडु में लोग सड़को पे आ गए होते .. JNU और AMU के बुद्धिजीवी जंतर मन्तर पर बीफ पार्टी का आयोजन कर “अपने भोजन की स्वतंत्रता के अधिकार” का प्रदर्शन कर रहे होते .. न्यूज़ चैनल्स पर गौ हत्या निषेध से भारत के लोकतंत्र पर खतरा और सांप्रदायिक राजनीति बताया जाता और फिर भारत की अर्थव्यवस्था को भी खतरा बताया जाता.. फिर 50 तरीको से 50 कारण गिनाकर टीवी पर 50 दिन यही दिखाने की कोशिश की जाती की गाये सोसाइटी के लिए भी खतरा है और स्वच्छ समाज में इनका कोई स्थान नही क्योंकि हर जगह गंदगी फैलाती रहती है सड़को पर आवारा गाय बढ़ जाए परिवहन को नुक्सान पहुचेगा … एक अच्छे पत्रकार का प्रथम गुण यही होता है की किसी भी मुद्दे के समर्थन में भी उसके पास उतने ही प्रभावी तर्क होते है जितने उसके विरोध में हों..

अन्य बीजेपी शासित राज्यो में ये कानून पहले से लागू है महाराष्ट्र में हो चूका है झारखण्ड में होने की तैयारी है लेकिन क्या पूरे भारत में लागू हो पाना एक स्वप्न जैसा है ? .. शायद है…!!! क्योंकि ये “मिक्स ब्रीड फसल” जो हमारे भारत में तैयार हो रही है उनको चावल पर बैन लगने से भले फर्क न पड़े लेकिन बीफ पर बैन लगने से उनको लगता है जैसे अब वो भूखो मर जायेगे ..

बीफ पार्टी, किस ऑफ़ लव जैसे आयोजन करने वाली ये पीढी स्वतंत्रता के नाम पर कल को कुत्ते कुतियों की तरह सड़को पर सेक्स करते मिल तो चौंकिएगा नही क्योंकि पार्को से ये शुरुआत हो चुकी है सड़को तक आने पर देर नहीं लगेगी ..

सुब्रयमन्यम स्वामी जी एक वाकया बताते है की जब वो हॉवर्ड में पढ़ाते थे तब एक छात्र आके उनसे पूछा की सर भारत में 800 वर्षो तक इस्लामिक रूल रहा फिर अंग्रेजो का लेकिन आज भी भारत में 80% हिन्दू बचे हुए है ये कैसे संभव हुआ..स्वामी जी गर्व से बोले की हमारे प्रतिरोध से ये संभव हुआ .. हम झूठा गर्व करने के लिए भले ही ये सोच ले की हमने प्रतिरोध किया है लेकिन गहराई से देखेगे तो पता चलेगा की पिछले 60 वर्षो में ही हम पकिस्तान और बांग्लादेश खो चुके है अगर उनकी पापुलेशन जोड़ दी जाए तो जो भारत बनता है उसमे 40% से भी कम हिन्दू रह जायेगे हमने अफगानिस्तान भी खोया और भी बहुत कुछ.. माँ भारती की कोई अंग अगर संक्रमित हो गया तो हमने उसका उपचार करने के बजाय उसे काट कर अलग कर दिया और हम खुश हो गए की हमने माँ भारती को बचा लिया .. हम पहले ही कई अंगो को काट चुके है और शेष जितना भी अंग बचा हुआ है वो भी कई तरह के सक्रमणो का शिकार है.. रोज नई नई धर्मविरोधी विचारधाराएँ उत्पन्न हो रही..

हिंदुत्व जीवन मूल्य ही तो है जिनके कारण आज तक ये प्राचीनतम संस्कृति जीवित है.. गुरुजनो माता पिता की सेवा करना धर्म है गाय हमारी माता है ये नैतिक ज्ञान ही तो धर्म है हमारी संस्कृति में सब रिश्तों की सीमाये निर्धारित है पूर्ण स्वतंत्रता नही है किसी को लेकिन किसी को ये महसूस नही होता की उसे बाध्य किया जा रहा है .. लेकिन ये जो कान्वेंट और jnu  वाली नई पीढ़ी हमारे नियंत्रण से बाहर हो चुकी है या हो जायेगी उसे स्वम को प्रगतिवादी साबित करने के लिए इन मूल्यों की तिलांजलि देकर विरोध करना आवश्यक लगता है.. तो अगर इन विशेष वर्ग के लोगो को, जो किसी फॉर्म में religion वाले कॉलम में तो मजबूरी में हिन्दू पर टिक करते है क्योंकि वहां ह्यूमनिस्ट का आप्शन नही होता लेकिन हिंदुत्व के मूल्यों का विरोध करते है, हिंदुत्व से बाहर करके देखा जाए तो स्थितियां काफी हद तक साफ़ हो जायेगी आप कितने पानी में है

एक तरह मूलनिवासी आंदोलन चल रहा है एक राजपुताना की मांग प्रबल है कही बोडो जनजाति खतरे में है तो कही “चिंकी” अपमानित हो रहे है कही खालिस्तान का नारा बुलंद होता है तो कही फ्री कश्मीर का.. साउथ के लोग नार्थ ईस्ट से बेखबर है नार्थ के साउथ से .. अपने घर में बैठकर हम सोच रहे है हिंदुत्व सुरक्षित है ..

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