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सूर्योदय से सवा दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्योदय तक का समय ब्राह्ममुहूर्त कहलाता है। शास्त्रों में यही समय निद्रा-त्याग के लिए उचित बताया गया है। उस समय जप, ध्यान,प्राणायाम आदि साधना-उपासना करने की भारी महिमा है।

जगत के करीब-करीब सभी जीव इस समय प्रगाढ़ निद्रावस्था में होते हैं, जिससे वातावरण उनसे निकलने वाली निकृष्ट तरंगों से रहति होता है। दूसरी ओर इस समय ऋषि,मुनि, संत, महात्मा व ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ध्यान-समाधि में तल्लीन होते हैं, जिससे उनकी उत्कृष्ट तरंगों से वातावरण समृद्ध होता है। इसलिए जो लोग ब्राह्ममुहूर्त की वेला में जागते हैं उन्हें वातावरण की इस श्रेष्ठ अवस्था का लाभ मिलता है।

इस समय शांत वातावरण, शुद्ध और शीतल वायु रहने के कारण मन में सात्त्विक विचार, उत्साह तथा शरीर में स्फूर्ति रहती है। देर रात तक चाय पीकर, जागकर पढ़ाई करना स्वास्थ्य और बुद्धि के लिए हानिकारक है। इसकी अपेक्षा ब्राह्ममुहूर्त में जागकर अध्ययन करना विद्यार्थियों के लिए अति उत्तम है।

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