वह एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक था। भलीभांति जानता था कि अपने बच्चे का भविष्य कैसे सुनिश्चित करना है, कैसे संवारना है? तभी तो उसके पैदा होते ही उसने उसके नाम से एक मुश्त रकम जमा कर दी, जिससे कि जब तक बच्चा स्कूल जाने योग्य हो तब तक किसी ‘अच्छे स्कूल’ में दाखिले लायक धन जमा हो सके।

पर बढ़ती महंगाई का क्या करें कि उसके बेटे की उम्र तो शिक्षा पाने की हो गई लेकिन जमा धन शिक्षा दिलाने लायक ना हुआ। इन चंद सालों में मंहगाई उसकी सोच से दोगुनी रफ़्तार से बढ़ चुकी थी। जो पैसे उसके हाथ आये थे उतने तो मनवांछित स्कूल की एडमिशन फीस देने के लिए भी नाकाफी थे, फिर उसकी आसमान छूती ट्यूशन फीस की बात ही कौन करे। एक बारगी सोचा तो कि “एक-दो साल के लिए अपने ही सरकारी स्कूल में दाखिला दिला दूँ”, लेकिन यह उसकी पत्नी को गंवारा ना हुआ। जब कुछ इंतजाम ना बन पड़ा तो अपने मोहल्ले के ही एक शिशुमंदिर में प्रवेश दिला दिया। यह सोचकर कि, “एक साल यहाँ रहकर अनुशासन तो सीखेगा।। तब तक ‘अच्छे स्कूल’ के लिए कहीं से बंदोबस्त कर ही लूँगा”।

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