कुदरत ने अगर फुर्सत से किसी चौपाए को गढ़ा है तो वह है हमारा वैशाखनंदन। क्या सूरत और सीरत पाई है मेरे प्यारे सुकुमार गधे ने। जो मनोहरता और मासूमियत इस प्रजापति के जीवनाधार में दिखाई पड़ी, वह न तो हमें खेचरों में मिली, न खच्चरों में। लोग हाथी का बड़ा मोल-तोल करते हैं। वह बुद्धिमान कहा जाता है। हमें तो वह लंबकर्ण, मिंची-मिचीं आंखों वाला, निहायत थापकथैया ही नज़र आया। कहते हैं कि शेर जंगल का राजा है। जाने कैसा राजा है कि जिसे देखते ही डर लगता है। हमने जो राजा देखे हैं,उनके मूंछ होती है, न कि पूंछ। न उनके खून होता है, न नाखून। निहायत ही कमसिन, बड़े ही खूबसूरत, सजे-धजे गुड्डे-जैसे। और ऊंट ? कितना बेतुका। गर्दन मानो बचपन में किसी ने पकड़कर खींच ली हो। कूबड़ जैसे उसके उबड़-खाबड़ जीवन का प्रतीक हो। टांगें बांस-बांस लंबी, मगर पूंछ आदमी की अक्ल की तरह सूक्ष्म।

हमारे यहां पशुओं में गाय को बड़ा मान दिया गया है। हम हिंदू उसकी मां की तरह पूजा करते हैं, पर यह कैसी माता है,जो बिना चारे-पानी के दूध नहीं देती। गाय मरने पर वैतरणी पार कराती होगी। हमारे सहज-सिद्ध ‘गर्दभराज’ तो अपने आश्रयदाता को लादी सहित इसी जीवन में वैतरणी से पार कराते रहते हैं। रहा कुत्ता जिसके बारे में मसल मशहूर है कि- चाटे-काटे स्वान के दुहूं भांति विपरीत।

मगर गधे के साथ यह बात नहीं है। कम दाम का और बहुत काम का। न बहुत ऊंचा, न बहुत नीचा। न काठी की ज़रूरत, न इसे हांकने के लिए लाठी की ज़रूरत। मौज आए, उछल कर चढ़ जाइए। न बहुत पतला न बहुत मोटा, थोड़ी से थोड़ी जगह में बांध लीजिए। बांधने को भी जगह न हो तो घर के बाहर खुला छोड़ दीजिए, खड़ा रहेगा।

भारतीय नेता की तरह गधे की खाल बहुत मोटी होती है। कोई कुछ कह दे। कोई कुछ लगा दे। मगर यह एकदम निश्छल और निर्विकार। नेता तो मौके-बेमौके रैंक कर मुसीबत भी खड़ी कर देता है, लेकिन हमारे गधे देवता को ऐसी खराब आदत नहीं है। वह कभी भी बेमौके भाषण नहीं देते।

नेता जो जिम्मेदारी की कुर्सी पाकर यानी उनके शब्दों में, सेवा का अवसर मिलते ही आंखें भी फेर लेता है और हाथ नहीं रखने देता, मगर गधे पर जैसे-जैसे उत्तरदायित्व आता है, यानी बोझ पड़ता है, वैसे-वैसे ही वह विनयी, श्रमी और सेवाभावी होता जाता है। नेता तो केवल चुनावों के वक्त में ही काबू में आता है, मगर गधे को जब चाहे कान पकड़कर खींच लाइए। वह अत्यंत सेवाभावी, कभी इनकार नहीं करेगा।

गाय को चारा-पानी न दो तो वह खड़ी हो जाएगी, दूध नहीं देगी। मगर गधा भारतीय पत्नी की तरह भूखा-प्यासा रहकर भी काम में जुटा रहता है। पत्नी तो बड़बड़ाती तब भी है, यह तो मुंह से एक शब्द भी नहीं कहता। गृहस्वामिनियां तो तुनककर असहयोग-आंदोलन भी छेड़ देती हैं, मगर यह अपने स्वामी से रूठकर कभी कोप भवन में नहीं जाता। पत्नियों का तो मायका है, उसकी धमकी होती है, लेकिन गधा इन सबको तिलांजलि देकर स्वामी-सेवा में संलग्न है। कलियुग में शनैःशनैः पतिव्रताओं की संख्या घट रही है। एक समय शायद ऐसा भी आ जाए कि यह पवित्र ‘पतिव्रता’ शब्द केवल शब्दकोश में ही दिखाई पड़े। पर हमें पूरा विश्वास है कि चाहे संविधान बदले, नये-नये कानून बनें, गधों को भी तलाक का अधिकार प्राप्त हो जाए, उन्हें भी अपने स्वामी की संपत्ति में समानाधिकारी घोषित कर दिया जाए, लेकिन कुछ भी हो, गधा अपने शाश्वत धर्म को कदापि नहीं छोड़ेगा। भारत की पतिव्रताएं किसी समय कैसी हुआ करती थीं, आने वाले युग में रिसर्च-स्कॉलर गधे को निकट से देखकर ही उसका कुछ अनुमान लगाया करेंगे। स्वामी चाहे बूढ़ा हो, चाहे अबोध, काना हो या कपटी, कुरूप हो या कोढ़ी, गधे को सिर्फ सेवा से ही काम है।

हम प्रायः यह तय नहीं कर पाते कि आस्तिक रहें या नास्तिक ? खुदा से हमें कई शिकायतें हैं। वह खुदी में खोया है, उसे दूसरों की क्या पड़ी !

वह अपने चक्कर में है, खुदगर्ज कहीं का। मूर्खों को मालामाल कर दिया और ज्ञानियों से कहा-मरो बेटा, भूखों ! कामगार को आराम नहीं और हरामी को करने को काम नहीं। यह ईश्वर का न्याय है, कि गधे पर इतना बोझ लाद दिया, उसे बेजुबान बना दिया, उसे दांतों से काटने योग्य भी नहीं छोड़ा और न उसे लंबे-लंबे नाखून दिए। सारे जानवरों के सिर पर सींग उगा दिए, मगर गधे के वे भी नहीं। कल्पना कीजिए, अगर गधे के सिर पर सींग हुए होते तो क्या होता ?

क्या खुदा को यह डर था कि गधा सींग कटाकर बछड़ों में जा मिलेगा,या सींग होने पर वह आदमी को सींग दिखा जाएगा ? सांड़ ने, भैंसे ने, सींग रखकर मनुष्य का क्या बिगाड़ लिया कि गधे से उसे डर होता ? अल्लाहताला को यह क्या मालुम कि सींग मारने वाले से कहीं भयानक डींग मारने वाले होते हैं। गधा सींग ही तो मारता, डींग तो नहीं मारता कि मैं गोरा हूं, मैं सभ्य हूं, मैं सशक्त हूं, मेरे पास तो जी-हजूरों के इतने पाकेट हैं, इतने बम हैं, इतने राकेट हैं। अगर गधे के सींग होते, दिखाने भर के होते, मारने के नहीं। साहित्य में एक उपमा और बढ़ जाती कि हाथी के दांत ही नहीं, गधे के सींग भी दिखाने के हुआ करते हैं।

हमारा खयाल है कि गधे के सिर पर सींग आने से सबसे बड़ी हानि तो यह हुई होती कि वह दुलत्ती मारना भूल जाता। दुलत्ती मारना, रण-कौशल का एक अचूक भाव है, जिसका प्रयोग सिर्फ गधों को ही आता है। अजी, दुश्मन को सामने से क्या मारना, पीछे से छेड़ना चाहिए। मुंहज़ोरी तो सभी कर लेते हैं। सामने से लात मारना भी कोई बात है। मगर पीठ दिखा करके भी दांत तोड़ देना एक करामात है, एक कला है। इसमें कम-से-कम दुश्मन से आंखें तो नहीं बिगड़तीं। किसी पर हाथ उठाने का पाप तो नहीं आता। मिल-बैठने के लिए इस विधि में हमेशा गुंजाइश रहती है। अगर गधे के सिर पर सींग आ गए होते तो आज के लोग इस अनोखी कला से वंचित रह जाते।

जरा सोचिए कि गधे के सिर पर सींग आ गए होते और वह पीछे वालों को दुलत्तियां न मारकर आगे वालों को सींग घुसेड़ने लगता तो धोबी-कुम्हारों के ही नहीं, बड़े-बड़े अत्तेखांओं के भी लत्ते उड़ जाते ? तब शेर को क्या गधे को मारना बहादुरी समझा जाता। लोगों के नाम शेरसिंह, शमशेर बहादुर, शेरजंग आदि न रखे जाकर गर्दभसिंह, गधाबहादुर, गर्दभजंग रखे जाते।लोग शेर खां न होकर, गधे खां होते। बच्चों के गले में बाघ-नख न पहनाकर, गधे का खुर पहनाया जाता। तब नंदनंदन का नहीं, वैशाखनंदन का वंदन होता। तब गोबर-गणेश को छोड़कर भक्त लोग गर्दभदेव को अक्षत-चंदन चढ़ाते। सूरदास अपने पद में कह जाते- खर को सदा अर्गजा लेपन, मरकट भूषण अंग। करो मन शीतला-वाहन संग।

एक खतरा और भी था। पशु-गधे के सिर पर सींग आए देखकर संसार का हर गधा सींगों की कामना करने लगता। अगर उसे असली नहीं मिलते तो किसी से उधार मांग-मांगकर ही भले आदमियों को वैसे ही डराता रहता जैसे पाकिस्तान अमेरिका से हथियार ले-लेकर हिंदुस्तानियों को धमकाया करता है।

सर्वनाश की ओर तेजी से जाती हुई दुनिया में अगर गधे के सिर पर भी सींग उग आए होते तो डूबतों को तिनके का भी सहारा न मिलता। सृष्टि में केवल गधा ही तो बचा है, जिसे देखकर मनुष्य के मन में करुणा, क्षमा, सहानुभूति, सहिष्णुता, संयम और तप की अनिर्वचनीय प्रेरणा जगती है।

हे जगदीश्वर ! तू सब कुछ करना, मगर गधे के सिर पर सींग न देना। हमें साम्यवाद मंजूर है, मगर गधे के सिर पर सींग स्वीकार नहीं। क्योंकि साम्यवादियों को सह-अस्तित्व सिखाया जा सकता है। मगर सींग निकलने पर गधा पंचशील का परित्याग कर देगा और सह-अस्तित्व को फिर कभी स्वीकार नहीं करेगा।

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