प्रख्यात आलोचक डॉ.नामवर सिंह से लम्बी बातचीत
साक्षात्कारकर्ता: डॉ.अभिज्ञात
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।

अपनी मनोकामनाओं को अभिव्यक्त करने लिए गालिब का यह शेर कहा प्रख्यात आलोचक डॉ.नामवर सिंह ने। वे हाल ही में एक कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता आये थे। प्रस्तुत है इस अवसर पर उनसे डॉ.अभिज्ञात से की गयी लम्बी बातचीत के प्रमुख अंश:

प्रश्न: कई दशकों तक लगातार आलोचक के तौर पर अपने रचनाकर्म के बाद अब क्या कुछ करने की इच्छा बाकी रह गयी है? वह क्या है जो नहीं कर पाने का अफसोस रह जायेगा?

उत्तर: गा़लिब का उपर्युक्त शेर मैं कहना चाहूंगा। मेरी कई तमन्नाएं अधूरी हैं, क्या कहूं क्या न कहूं। और हर इच्छा काफी बलवती है।

प्रश्न: लिखने को लेकर भावी योजना क्या है?

उत्तर: उम्र के चलते स्वास्थ्य सम्बंधी सीमाएं हैं। लिखने बैठने के लिए पहले वाली ऊर्जा अब नहीं रही। पहले तो मैं लिखने के लिए 9-10 बजे रात तक खा-पीकर तैयार हो जाता था और रात भर लिखता रहता था। थोड़ा बहुत दिन में सो लिया तो सो लिया। यह क्रम आठ-दस दिन लगातार चलता और एक ग्रंथ तैयार हो जाता था। अब व्यस्तताएं बढ़ गयी हैं। इस शहर से उस शहर सेमिनारों तथा अन्य कार्योंवश जाना पड़ता है। तो अब जो कुछ बोल लेता हूं वही मेरा रचा हुआ है। इसलिए लोग कहते हैं कि मैं मौखिक साहित्य रचता हूं। अब रात भर बैठ कर लिखने वाली ऊर्जा नहीं रही।

प्रश्न: तीन-चार दशकों तक लगातार आलोचना साहित्य के शीर्ष पर बने रहने का राज क्या है? साहित्य की दुनिया में आप की वही भूमिका है जो अमिताभ बच्चन की सिनेमा में है।

उत्तर: आलोचना की दुनिया का अमिताभ बच्चन कहे जाने की मुझे खुशी है। मैंने कभी कहा था ‘गुण ना हेरानो गुण ग्राहक हेरानो है’ वह गलत साबित हो रहा है अब तो लगता है कि कि गुण-ग्राहक तो बहुत हैं गुणवानों की ही कमी हो गयी है। आप चाहें तो इसी को राज कह लें। मुझे खुशी होती है कि लोग मुझे लगातार प्रासंगिक मानते रहे हैं।

प्रश्न: किसी परिवार में किसी क्षेत्र में जब कोई व्यक्ति ख्यातिप्राप्त कर लेता है तो उसी परिवार के दूसरे व्यक्ति की प्रतिभा दब जाती है? इस संदर्भ में अपने छोटे कथाकार भाई काशीनाथ सिंह के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर: मेरा परिवार इस मिथ को तोड़ता है। काशीनाथ सिंह ने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व और ख्याति अर्जित की है।

प्रश्न: यह तो सही है लेकिन वे इन दिनों अपनी कहानी ‘काशी का अस्सी’ को लेकर खासी चर्चा में हैं। उस पर फिल्म बन रही है और कहा जा रहा है कि इस फिल्म के आने के बाद फिल्मी दुनिया में जो कहानियों का ढर्रा है वह बदल जायेगा। और चूंकि फिल्म साहित्य की तुलना में एक बड़ा माध्यम है लोग आपको काशीनाथ ङ्क्षसह की वजह से जानने लगेंगे। जैसा कि हरिवंश राय बच्चन के साथ हुआ है। साहित्येतर जगत के लोग अमिताभ बच्चन के कारण हरिवंश राय बच्चन को जानते हैं।

उत्तर: मेरे लिए इससे बढ़कर कोई खुशी नहीं हो सकती कि मैं काशीनाथ सिंह के भाई के तौर पर जाना जाऊं। कहानी पर तो फिल्म बन सकती है, कवि फिल्मों में गीत लिख सकते हैं पर आलोचना साहित्य का तो फिल्म मीडिया में इस्तेमाल नहीं हो सकता। मैं यह मानता हूं कि फिल्म साहित्य से बड़ा और पापुलर माध्यम है और आम आदमी पर अपनी अधिक पकड़ रखता है। मैं मानता हूं कि मेरा सबसे बड़ा मीडिया मेरे छात्र हैं। जहां कहीं भी मेरा कोई छात्र है वहां मैं हूं और उससे जुड़े लोगों तक मेरी पहुंच है। मेरे छात्र जानते हैं कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की कैसी धाक मेरे चलते बनी। अध्यापन के लिए मेरे वहां पहुंचने के पूर्व हिन्दी बोलने वाले अपने को दीन-हीन समझते थे और अंग्रेजी वाला माहौल था, अमूमन सभी लोग अंग्रेजी में ही बातचीत करते थे। मैं देहाती वेशभूषा धोती-कुर्ता में वहां पहुंचा था और मैंने वहां धड़ल्ले से हिन्दी में बातचीत शुरू की। बाद में तो हिन्दी की स्थिति जेएनयू में इतनी सबल हो गयी कि वहां छात्रसंघ ने अपनी भाषा के तौर पर हिन्दी को ही अपना लिया। वहां अब जो पोस्टर- बैनर आदि लगते हैं, वे हिन्दी में होते और हिन्दी की जो कक्षाएं मैं लेता था उसमें दूसरी भाषा के छात्र-छात्राएं व अध्यापक तक पहुंच जाया करते थे।

प्रश्न: आज जो नयी पीढ़ी साहित्य सृजन में लगी है उसके संदर्भ में क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर: अद्भुत और सराहनीय। मैं यह कहना चाहूंगा कि बीसवीं सदी में जो कुछ महत्त्वपूर्ण लेखन हुआ है इस सदी का लेखन अभी से ही यह जता रहा है कि वह उससे बहुत आगे है। अब होनहार रचनाकारों की पूरी फौज तैयार है। उपन्यास में तो कम लेखन हो रहा है किन्तु कविता, कहानी, आलोचना इन विधाओं में नयी प्रतिभाएं उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं और मैं नयी पीढ़ी की रचनाशीलता के प्रति आश्वस्त हूं।

प्रश्न: साहित्य में एक साहित्यिक धारा के तौर पर जिस ‘जनवाद’ की चर्चा पिछले दशक में जोर-शोर से थी, चुनावी राजनीति में वामपंथी दलों की शिकस्त के उसका आभामंडल क्षीण हो गया है। क्या यह मान लिया जाये कि यह दौर जनवाद के पतन का या उत्तर जनवाद का है?

उत्तर: पहले तो यह समझें कि जनवाद को साहित्य की धारा के तौर पर जिन्होंने अभिहित किया वह माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) का साहित्यिक मोर्चा था। लेकिन उनकी जो साहित्यिक सोच है, उस पर तो पहले से ही प्रगतिशील लेखक संघ और प्रगतिवादी साहित्य से जुड़े लोग चल रहे थे। यदि जनवाद का अर्थ मेहनतकश मजदूरों, कृषकों व आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों के प्रति सहानुभूति से है तो वह साहित्य में हमेशा से ही विद्यमान रहा है और रहेगा। निम्न मध्यवर्ग को भी उसमें जोड़ लें।

प्रश्न: बुद्धिजीवियों में एक दिग्भ्रम दिखायी देता है क्या मान लिया जाये कि विचारधारा संकट में है?

उत्तर: एक जमाना था जब वामपंथी विचारधारा के बरक्स विचारधारा के अन्त की बात चली थी। अंत का मतलब वहां सैद्धांतिक विचारों से था। किन्तु मैं यह मानता हूं कि आम आदमी या दबे कुचले लोगों की समस्याओं के हल का सपना कभी नहीं मरता और जब तक मनुष्य में सही और गलत का निर्णय लेने की क्षमता बची रहेगी विचारधारा का अन्त नहीं होगा। मनुष्य रेशनल एनीमल है इसे वैज्ञानिकों ने माना है। मनुष्य ही वह प्राणी है जिसमें कला होती है और हर कला में कहीं न कहीं विवेक होता है। साहित्य में भले कुछ लोग सही दिशा नहीं तय कर पा रहे हों लेकिन उनके अन्दर विवेक है और वे सही गलत के द्वंद्व से उबर ही जायेंगे। विचार भले धारा के रूप में न रहे किन्तु विचार तो बने ही रहते हैं। और हर समाज में हर समय नैतिकता के प्रश्न होते हैं भले ही अलग-अलग समय में वे अलग-अलग हों।

प्रश्न: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के रंग-ढंग के संदर्भ में यह प्रश्न उठे हैं कि क्या साहित्य का उत्सव होना चाहिए और ऐसा साहित्य के हित में कहां तक होगा?

उत्तर: जयपुर में साहित्य को लेकर जो उत्सव हुआ वह उस पर पूरी तरह से बाजारवाद हावी था। एक तरह से साहित्य को बेचने की कोशिश थी। खूब पैसा खर्च हुआ और वह एक प्रदर्शन की तरह था। वहां साहित्य प्रमुख नहीं रह गया था साहित्य का प्रदर्शन मुख्य था। हालांकि साहित्यिक उत्सवों को हम आम भारतीयों के जीवन के अन्य उत्सवों की तरह लें तो कोई हर्ज नहीं है। हमारे तमाम तीज-त्योहार उत्सवपूर्ण होते हैं। दुर्गा पूजा, गणेश पूजा, होली, दिवाली, ईद, गुड फ्राइडे सब उत्सव हैं और हमें न तो इनसे परहेज है और ना ही मुझे इनमें कोई बुराई नजर आती है। हमारा समाज उत्सवपूर्ण है। हमारे समाज का यह स्वभाव है। यहां तक कि मोहर्रम शोक के जुड़ा मामला है इसके बावजूद ताजिये पूरे उत्सव के रूप में निकाले जाते हैं। यदि साहित्य से जुड़े कार्यक्रम हमारे जीवन में उत्सव के रूप में आयें तो क्या हर्ज हो सकता है।

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