मैं अपनी किस्मत पे रो रहा हूं। अब सिर्फ़ खुद को कोसने के अलावा कर भी क्या सकता हूं। मेरी हालत ‘खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे’ वाली हो गई है। वैसे ये हाल सिर्फ़ मेरा है। ऐसा भी नहीं है। मेरे जैसे लाखों हैं। जो खंबा भी नोच नहीं पा रहे हैं। ये देश अनिश्चितताओं से भरा है। इस देश में जब मंत्री-संत्री का भविष्य सुरक्षित नहीं है। सरकार सुरक्षित नहीं है। संसद सुरक्षित नहीं है। एक महिला जो अति-साधरण हो। जैसे-तैसे सांसद बन गई हो। तब वही सांसद सूबा क्या देश क्या। सर्वेसर्वा बनकर अपफसरों को अपनी अंगुलियों पर नचा देती हो। ऐसा हमारे ही देश में हो सकता है।

जिस देश के खिलाड़ी खेल को अनाड़ी का खेल मानकर टट्पूंजों से हार सकते हैं। ऐसे देश के हम और आप नागरिक हैं। मैं तो विधिवत आम नागरिक भी नहीं हूं। दरअसल मतदाता सूची में मेरा नाम आज तक अंकित नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप में मतदान से ही वंचित हूं। मेरे जैसे की पूछ भला कैसे और क्यों कर हो सकती है। मेरी परेशानी का कारण मैं भी नहीं। मेरा बचपन का सहपाठी कलुवा है। जो मानों एकदम खालिस कोयले की खान से निकला हो।

हम टाटपट्टी वाले स्कूल में पढ़े थे। कलुवा दिन में हंसता तो उसकी बत्तीसी ही चमकती। जबकि उसके दांत खासे पीले थे। लेकिन उसके काले चेहरे पर वे गंदले दांत भी चांदी की तरह चमकते। रात के अंधेरे में उसके दांत टार्च का काम करते थे। कलुवा पढ़ाई में निरा कपूत ही था। पर वह चालाक खोपड़ी वाला था। परीक्षा से ठीक एक हफ़्ते पहले वो मुझे अपना जिगरी दोस्त बना लेता। मुझे खाने की चीज़ भेंट करता। मैं परीक्षा में उसे अपनी कॉपी दिखाता। वह हमेशा मुझसे ज्यादा अंक लाकर पास हो जाता। मतलब निकल जाने पर वह मुझे मुंह लगाना बंद कर देता।

कक्षा नौ तक उसने मेरा प्रयोग बड़ी चालाकी से किया। मैं उसकी चालाकी समझता तो था। पर मैं अगर उसे भाव नहीं देता तो वो किसी और को पटा लेता। पटाने में वह माहिर था ही। उसकी कक्षा की लड़कियों से भी अच्छी पटती थी। वो लड़कियों से भी अपना उल्लू कई बार सीधा कर लिया करता था। मसलन वह कॉपी पर मिलने वाला स्कूल का ही नहीं घर का काम भी दूसरों से चुटकियों में करवा लेता था। कार्यात्मक, मिट्टी का कार्य, खेल-कूद, बागवानी, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि में भी वो चतुराई के चलते बाजी मार लेता था।

मास्टरों के व्यक्तिगत काम करके वे उनका कृपा पात्रा बन जाता था। कुल मिलाकर कलुवा जैसा भी था। पर किसी भी कक्षा में वह औसत छात्रा भी नहीं रहा। तब भी वह सालाना परीक्षा में अच्छे अंकों से पास हो जाया करता था। फिर वो अचानक कक्षा दस में प्रवेश के समय गायब हो गया। मैंने एक अच्छे छात्र के रूप में स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की। फिर मैंने पी.एच.डी. हासिल की। अब मैं पिछले दस सालों से अंशकालिक तौर पर एक कॉलेज में पढ़ा रहा हूं। वैसे तो सब कुछ सामान्य न होने पर भी सब ठीक-ठाक चल रहा था। फिर अचानक किस्मत पर रोने और कोसने का दौर शुरु हो गया।

नई सरकार बनी। उसने शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की शपथ ले ली। शिक्षा पर कलंक मानते हुए सरकार ने हम जैसों को एक राजाज्ञा जारी कर बाहर का रास्ता दिखा दिया। अदालत की भी हम हमदर्दी नहीं हासिल कर पाए। फिर मैंने ट्यूशन शुरू कर पेट और परिवार पालना शुरू किया। अभी मैं ठीक से संभल भी नहीं पाया था, कि न जाने कलुवा कहां से टपक पड़ा।

पीले वस्त्र ओढ़े, हाथ में मंहगा मोबाईल, साथ में चार-पाँच कबीर भक्त टाईप के चेले, चमचमाती कार, गले में सोने की माला, हाथों की सभी अंगुलियों में रत्नजड़ित अंगुठियां, माथे पर सफेद लेप, सिर पर चाणक्य से भी लम्बी चुटिया, लगातार पान खाते रहने से लाल और काली हो चुकी बत्तीसी, कानों में मारवाड़ी छाप कुंडल पहने कलुवा अचानक मुझे घेर कर खड़ा हो गया। मैं तो उसे पहचान भी नहीं पाता, अगर वो बचपन का अपना रटा-रटाया जुमला न बोलता। उसने कहा था, ’’भाई। सुन तो। ये कलुवा तेरा पक्का दोस्त है न। बोल है न।’’

तब तो मैंने तुरंत पहचान लिया। लेकिन मैं हक्का-बक्का खड़ा ही रह गया। वो ही मुझसे चिपट गया। उसने अपनी देह में मनमोहक इत्र लगा रखा था। मेरी नाक के नथुने फडफड़ाते ही रहे। मैं कुछ पूछता, इससे पहले वो बोलने लगा। बस अपनी ही कहता रहा। वो किसी संस्कृत के पंडित का चेला बन गया था। सेवा-भाव करने में वो बचपन से ही माहिर था। पंडित मरते वक्त कलुवा के नाम वसीयत कर गया। चार आश्रम, दस एकड़ जमीन के साथ करोड़ों रुपये का बैंक बैलेंस कलुवा को मिल गया था।

कलुवा ने मुझे अपना चमचमाता हुआ कार्ड दिया। मुझे अपने आश्रम में आने का निमंत्रण दिया। चलते-चलते उसने मेरे हाथ में हजार रुपये का करारा नोट रख हुए कहा, ’’भाई। कोई परेशानी हो तो बोलना। आश्रम चले आना।’’

कलुवा चला गया। पर मेरे जहन में कई सवाल सुनामी की तरह छोड़ गया। आखिर मुझमें क्या कमी है? कलुवा में ऐसे कौन से गुण थे, कि वो असाधारण हो गया। ऐसे सैकड़ों कलुवे हैं जो मेरे जैसे हजारों को पीड़ा पंहुचाते हैं, क्योंकि वे ऐसे गुण विकसित कर लेते हैं, जिन्हें समाज कभी मान्यता नहीं देता। लेकिन जब कलुवा जैसे उन गुणों के चलते समाज में एक अच्छा मुकाम हासिल कर लेते हैं तो मेरे जैसों को कष्ट होने लगता है।

मानव में ईर्ष्या स्वाभाविक है। लेकिन कोई भी अपने बच्चों को कलुवा जैसा नहीं बनाना चाहेगा। लेकिन कोई कलुवा बन जाता है तो हर कोई उसकी प्रशंसा करता नहीं थकता। क्या आप भी चाहते हैं कि आपके बच्चे अपने स्कूली जीवन में कलुवे जैसे हों? नहीं न। फिर हर किसी को धन पंडित मिल जाए, जो अपनी धन-संपत्ति कलुवे की तरह आपके बच्चों के नाम कर दे। यह भी संभव नहीं है।

हम जिंदगी भर जिन मूल्यों की वकालत करते हैं, उन पर हम कितना चल पाते हैं। हम अपने बच्चों को क्या से क्या बनाना चाहते हैं। फिर जो वो बन जाते हैं हम चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। वे हमारे सामने उन नीतियों, आदतों और कार्य शैलियों को अपना लेते हैं, जिन पर हमने न चलने का उन्हें पाठ पढ़ाया था। हमारा यह दोहरा चरित्र समाज को किस दिशा में ले जा रहा है। इस बारे में हम कब सोचेंगे। क्यों कलुवे जैसे चरित्र हमारे सामने हमें बार-बार जलील करते हैं। आखिर क्यों कलुवे जैसों को ही धन्ना पंडित अपनी ज़मीन-जायदाद सौंप देते हैं। कदम-कदम पर अयोग्य और असपफल व्यक्ति रातों-रात हमारे सामने नायक की तरह प्रकट हो जाता है। संघर्ष, मेहनत, कठोर साधना, ईमानदारी से नहीं चालाकी और चाटूकारी से जो हमारे सामने यकायक शीर्ष पर पंहुच जाते हैं। हम उन्हें क्यों कर सम्मान का दर्जा देने लगते हैं। आखिर समाज के कलुवों का क्या करना है। यह हम कब सोचेंगे। यह तो सोचना ही होगा। कल नहीं आज। कल तो बहुत देर हो जाएगी।

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