(यह सितम्बर 2001 के पुराने लेख का परिवर्धित रूपांतरण है)

जब संस्कृत और यूरोप की मुख्य भाषाओं में समानतायें उजागर होना शुरू हुईं तब औपनिवेशिक काल के यूरोपियन विद्वानों द्वारा आर्य आक्रमण के सिद्धांत की स्थापना की गई थी। उभरते हुए यूरोपी-केंद्रीयतावाद के वातावरण में यह नितांत आवश्यक हो गया था कि यह अबोधगम्य खोज कालांतर में प्रतिमानतः जातिवादी और वैचारिक व्यंजना ग्रहण करेगी। देखिए संदर्भ 1 ।

आर्य आक्रमण के सिद्धांत का औपनिवेशिक शोषण

ब्रिटिश विद्वान हकबकाये खासकर जब उन्होंने विजयेता और विजित की भाषाओं के बीच स्पष्ट सूत्रों को देखा। भारत में ब्रिटिश शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी अनजाने में आगे बढ़ती गई बिना नैतिक द्विविधा, सिद्धांत या जातिवादी श्रेष्ठता के आश्रय के। परंतु जैसे जैसे उसका शासन फैलता गया यूरोपियन जातीय श्रेष्ठता का आश्रय ब्रिटिश उपस्थिति के लिए नितांत आवश्यक होता गया। यह न केवल ब्रिटिश विवेक को शांत करने के लिए आवश्यक था वरन् भारतीय जनता को यह भी विश्वास दिलाने के लिए आवश्यक था कि ब्रिटिश मात्रा विजेता नहीं थे वरन् एक उच्च कुलीन जाति संबद्ध सांस्कृतिक उत्थान के प्रचारक भी थे।

1857 के बाद, भारत में ब्रिटिश शिक्षा पद्धति की ऐसी संरचना की गई कि उसके माध्यम से भारत में ब्रिटिश राजभक्तोें का छोटा परंतु प्रभावशाली वर्ग पैदा किया जा सके। आर्य आक्रमण के सिद्धांत की ब्रिटिश व्याख्या एक औजार की तरह से भारत में ब्रिटिश शासन की उपस्थिति की न्यायसंगता सिद्ध करने में इस वर्ग का इस्तेमाल किया जा सके। शास्त्राीय एवं औपनिवेशिक आभामय अवतरण में ब्रिटिश ने आर्यों को उच्च, उन्नत, सांस्कृतिक तौर पर प्राचीन तथा विश्व की सर्वोच्च जाति की तरह चित्रित किया। उस जाति का उद्गम स्थल उत्तरीय यूरोप में चिह्नित किया। तत्पश्चात् ब्रिटिशों ने सुझाव देना शुरू किया कि भूतकाल में आर्य यूरोप के उसी उद्गम स्थान से भारत में आये थे। भाषा, उन्नत सभ्यता और लोकोत्तर दर्शन में भारतीय उपमहाद्वीप के पिछड़े हुए द्रविड़ निवासियों को सुसंस्कृत करने के उद्देश्य से आर्य आये थे। और, बाद में भारतीय सभ्यता की समस्त महानताओं के लिए आर्यों को ही श्रेय दिया गया। इस प्रकार से यह समझाया गया कि यदि भारत को पुनः महानता को प्राप्त करना है तो आर्यों के शासन की ओर पुनः वापिस होना आवश्यक होगा।

प्राचीनकाल की कुलीन आर्य जाति और अपने बीच सांस्कृतिक निरंतरता का दावा करते हुए ब्रिटिश, आर्य रीतिरिवाजों के उत्तराधिकारी हो सकते थे तथा वे इस उपमहाद्वीप की जनता पर शासन करने का ’’न्याय संगत’’ एवं सांस्कृतिक अधिकार प्राप्त कर सकते थे। ब्रिटिश का यह अधिकार भारतवासियों के शोषण करने के लिए नहीं वरन् ब्रिटिश का यह अधिकार मुसलमानों के हिंसक एवं जंगली आक्रमणों द्वारा कलंकित तथा विकृत हो चुकी भारतीय सभ्यता को आर्य मानदण्डों द्वारा ’’पुनर्जीवन’’ देने के लिए था। असंगत, विकृत और बेतुके इस जातिवादी सुझाव को उच्च वर्गीय हिंदुओं में ’’रुचिकर’’ बनाया गया। उन हिंदुओं से कहा गया कि वे आर्यों के वर्ण से थे और केवल वे ही आर्यों के बहुमुखी और विश्वव्यापी उपलब्दियों से एकात्मकता स्थापित कर सकते थे यदि वे ब्रिटिश शासन को स्वीकार कर लें तो। और, इस तरह, तब वे भारत में एक महान आर्यन पुनर्जागरण के भागीदार भी बन सकते थे। देखिए संदर्भ 2।

इस सुझाव ने उंची जाति के हिंदुओं में गहरीं जड़ें जमाईं जिससे वे मुस्लिम कुलीनों के विरुद्ध न्यायसंगत पकड़ पा सकें। हिंदुओं को मुस्लिम राजदरबारों में समान पद पर आसीन होने का अधिकार नहीं था। उन्हें हर प्रकार के संघर्ष के लिए कमजोर बनाया गया और कारीगरों एवं किसानों के बीच बैर पैदा किया गया। फलतः कोई भी मुस्लिम सामंतशाही के खिलाफ विद्रोह में भागीदारी न कर सकंे। दूसरी ओर, ब्रिटिश शासकों ने औपनिवेशिक शासन के प्रति मौन स्वीकृति के बदले में कुछ सुविधाओं का लालच दिया। आर्य आक्रमण के सिद्धांत ने वैचारिक न्यायसंगतता खुद के देश का ही विरोध करने के लिए पैदा की। सुदूर उत्तरी यूरोप में आर्यों के प्राचीन उद्भव को बतलाने से ब्रिटिश हिंदुओं के मस्तिष्क में यह विचार रोपना चाहते थे। उच्च हिंदू वर्ग को भारतीय जनगण से अलग कर लिया गया और सामान्य जनता की पारस्परिक संगति के लिए कोई कारण शेष न रहा।

आर्य आक्रमण का यह सिद्धांत इस प्रकार से, भारतीय जनता के उस हिस्से के लिए भावनात्मक प्रलोभन बना जो भारत में औपनिवेशिक शासन को समर्थन और सहयोग दे रहे थे। यद्यपि इसमें से कुछ भारतीयों ने राष्ट्र्ीय भावना पैदा की और राष्ट्र्ीय पहचान को मजबूत किया जो औपनिवेशिक शासन के साथ टकराव में पहुंची। इस आर्य आक्रमण सिद्धांत ने स्वतंत्राता बाद भी भारतीय बुद्धिजीवियों में मनोवैज्ञानिक भ्रम पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आर्य आक्रमण खासकर बहुत प्राचीनकाल से संबंध रखता और अपने समर्थन में बहुत ही थोड़ा प्रमाण रखता है। आक्रमण सिद्धांत का पक्ष या विपक्ष बेहद काल्पनिक है। सकारण सत्याभाषी है। तब भी, वस्तुपरक इतिहासकार केवल कथित अनुमानों तक ही पहंुचते हैं। वास्तविक तथ्यों के अभाव और प्राचीन गं्रथों के भाषांतरणों की अस्पष्टता आर्यकाल के इतिहास को /जिसे प्रतिरोधी लेखन और औपनिवेशिक प्रमोशित विश्लेषकों से रंगा गया था/ दुगना कठिन बनाती है। कठनाई और भी तब बड़ी जब औपनिवेशिक विश्लेषकों को प्रोत्साहित कर प्रमाणस्वरूप मान्यता दी गई।

तब भी यह संभव है कि सत्याभाषी रूपरेखा बनाई जाये और कम से कम जो मात्रा कथा या कल्पना है उसे हटाया जाये।

आक्रमण के पक्ष और विपक्ष में तर्क

आक्रमण सिद्धांत के विरोधी, कुछ सत्याभाषी बहस करते हैं कि वैदिक गं्रथों में वर्णित बलिदानी रस्में या धर्मिक विधियां हरप्पनकाल में प्रचलित प्रथाओं से समानता रखतीं हैं। हरप्पा और वैदिक वेदी की समानता उलझन भरी है। यह इस तर्क को मजबूत करेगा कि वैदिककाल के ब्राह्मण हरप्पन पुरोहितों से उत्पन्न हुये थे, किसी आर्य आक्रमण से नहीं। परंतु हरप्पन पुरोहित और वैदिक ब्राह्मण के मध्य की कड़ी आर्य आक्रमण अथवा विदेशी प्रवास की संभावना को समाप्त नहीं करती। यह विचार करना गलत न होगा कि वैदिक ब्राह्मण ने हरप्पन पुरोहित का एक मिश्रण उत्पन्न किया और आक्रमणकारियों ने समुदाय या कुल का पुरोहित। उस काल में पशु बलि अनेक कबीलों में प्रचलित थी और यह संभव था कि किसी प्रकार का सम्ममिश्रण हुआ हो।

भाषाशास्त्राीय विश्लेषण

आक्रमण या स्थानांनतरण के सिद्धांत के मानने वाले बहुत जोरदार ढंग से महसूस करते हैं कि भारत-यूरोप भाषायी समानताओं की व्याख्या अन्य किसी भी प्रकार से नहीं की जा सकती और भाषायी अध्ययन पर ही जोर देते हैं जो उनके दावे का सहायक होना प्रगट करता प्रतीत होता है।

जो भी हो, आक्रमण सिद्धांत के विरोधी दावा करते हैं कि भारत-यूरोप की भाषायी समानतायें आर्य आक्रमण के बिना भी होना संभव है। उनका मानना है कि हरप्पन सभ्यता के बेबीलोन से व्यापारिक और वाणिज्यिक संबंध थे, साथ ही अन्य दूरस्थ पश्चिमी सभ्यताओं से भी संबंध थे। प्रतीक चिंहों और सांस्कृतिक पुरावशेषों की विशेष समानतायें हरप्पन भारत, बेबीलोन और यहां तक कि मेडीटरेरियन जैसे क्रेट सभ्यताओं के बीच रहीं हैं। इसलिए वे दावा करते हैं कि व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों के द्वारा भाषायी समानतायें पहले ही पैदा हो चुकीं थीं और बाद के काल में, समान भाषायी ढांचा दक्षिण से उत्तर की ओर चला गया हो। क्योंकि मेडीटरेरियन यूरोप और मध्य पूर्वी सभ्यतायें उत्तरी यूरोप के काफी पहले उन्नत हो चुकीं थीं, इस बात की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

परंतु इस परिकल्पना को नहीं झुठलाया जा सकता कि आक्रमणकारी या स्थान परिवर्तनकारी कुलीन उस समय की भारतीय भाषा में गैर भारतीय शब्दों को दे सके हों जो एक मिश्र भाषा बनी भारत-यूरोपियन और स्थानीय देशज भाषाओं के साथ। /उर्दू एक ऐसी ही भाषा का उदाहरण है जो आक्रमणों की एक श्रृखंला के परिणाम स्वरूप बनी, विदेशी शब्दों के बड़े भंडार को जोड़ते हुए परंतु वाक्य रचना और शब्द भंडार जिनका आधार था पूर्ववर्ती भाषा/।

शब्द भंडार से संबंध रखते हुए मध्य एशिया के पैतृक योद्धा कुलीनों के घालमेल को नकारा नहीं जा सकता। जिम्बूतास जैसे लेखक ’’दी सिविलाईजेशन आॅफ दी गाडेस्, दी वल्र्ड आॅफ ओल्ड यूरोप’’ एक विश्वनीय नमूना पेश करता है कि कैसे यूरोप की पुरानी मातृसतात्मक व्यवस्था धीरे धीरे अप्रवासियों या आक्रमणकारियों जो भारतीय यूरोपियन गुट की भाषाओं के कुछ निश्चित तत्वों की मिलीजुली भाषा बोलते थे, के द्वारा बिखर गई। यद्यपि यह गलत होगा कि हम उन निर्णयों को भारत के लिए लागू करें, भाषायी और भाषाशास्त्राीय तर्कों को नकारना कठिन है।

तब भी इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि भारत-यूरोपियन भाषाओं में समानतायें और भिन्नतायें, दोनों हैं और बहुदा, इतिहासकार तथा भाषाशास्त्राी भारतीय भाषाओं की उन्नति में आदिवासी भाषाओं और तामिल भाषा की धाराओं के योगदान की उपेक्षा करते हैं। भारतीय भाषाशास्त्राीय विश्लेषण से भारत-यूरोपियन संबंध और साथ ही बहुत हद तक स्वतंत्रा उन्नति की ओर इशारा है। जैसा कि दक्षिण भारत की भाषाओं ने संस्कृत के शब्दों को आत्मसात् कर लिया है, वैसा ही उत्तर भारत की भाषाओं ने तामिल और उससे संबंधित भाषाओं के शब्दों को अपने में समाहित किया है।

आर्य आक्रमण सिद्धांत की दूसरी आलोचना आर्य शब्द की व्याख्या के संबंध की है। यह शब्द जाति, राष्ट्र् अथवा भाषा बोधक नहीं है। आलोचकों का कहना है कि ऋग्वेद एवं दूसरे ग्रंथों में आर्य शब्द का उपयोग कुलीन, कुलीन कार्य या संभवतया कुलीन पृष्ठभूमिका वाले से है। इसलिए आर्य शब्द का उपयोग जातीय या राष्ट्र्ीय चरित्रा के आक्रमणकारी कुल या कुलों के मायने में करना गलत होगा। इस प्रकार यदि एक आक्रमण हुआ होगा और आक्रमणकारियों ने अपनी पहिचान ’’आर्य’’ कहकर बनाई होगी तो यह केवल उनकी उच्च कुलीनता के दावे के लिए ही था परंतु उनके राष्ट्र् अथवा जातिगत उद्गम के अर्थ में नहीं।

दूसरी ओर इतिहासकार और आक्रमण पक्षधर अपने दावों को भारत में आक्रमणकारी ’’आर्यों’’ द्वारा घोड़ा और रथ के आरंभ की अभिधारणाओं पर आधारित करते हैं। वे ऋग्वेद की कुछ गीतिक ऋचाओं की ओर ध्यान दिलाते हैं जिनमें घुमंतू पशुपालक योद्धाओं की कुलीन जाति या संघ और रथ आरूढ़ सशस्त्रा योद्धाओं के संदर्भ हैं। बेबीलोन और परशिया में मिले ऐतिहासिक तथ्यों से इस कल्पना की समता बैठती है। उनमें रथारूढ़ योद्धाओं का अंकन है। ऋग्वेद के दूसरे साक्ष्य भी परशियन सभ्यता के ’’आर्यन’’ से संबंध रखने वालेे प्रतीत होते हैं।

हरप्पन सभ्यता की समाविष्ठता में शहरी बस्तियों में रहने वाले योद्धाओं के कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। पशुओं के रेवड़ों एवं पशुपालक घुमंतुओं के भी संदर्भ नहीं हैं। हरप्पन तुलनात्मक तौर पर शहरातीजन प्रतीत होते हैं और उनके जीवन का आधार मौलिक रूप से सुस्थापित कृषि दिखलाई पड़ता है। ऋग्वेद की ऋचाओं का वर्णन उनसे मेल नहीं खाता जिन्होंने अनाज के विशाल भंडारण, सड़कंे, शहरी रिहायसी मकान, और उस समय की सबसे उन्नत जलमल निकास व्यवस्था बनाई हो। हरप्पन साक्ष्य वहां पुरोहित वर्ग के होने का इशारा तो करते हैं परंतु सैन्यशक्ति एवं अस्त्रा शस्त्रों का नहीं। स्थानीय सुरक्षा के साक्ष्य तो हैं पर इस बात के बहुत ही कम सबूत हैं कि वह सुरक्षा दल अस्त्रा शस्त्रा से सुसज्जित था या वे धनुष विद्या में ही होशियार रहे हों। जबकि, ऋग्वेद में योद्धा जनसमुदायों का वर्णन है। बेबीलोन और प्राचीन परशिया की सभ्यता जहां एकतंत्रा राज्य व्यवस्था की स्थापना हो चुकी थी और जिन्हें सेनाओं और योद्धाओं की आवश्यकता राज्य और राजकुल की सुरक्षा के लिए होती रहती थी, के विपरीत हरप्पन सभ्यता जनतंत्रात्मक रही। उसके पास सुरक्षा और स्थाईत्व के लिए कमजोर और छोटे छोटे दल ही थे। प्राप्त ऐतिहासिक प्रमाणों के सर्वेक्षण पर आधारित तथ्य है कि हरप्पन राज्य की न्यायसंगतता के लिए पुरोहितों की बड़ी भूमिका रही होगी जबकि मध्य पूर्व और केंद्रीय एशिया की सभ्यताओं में योद्धाओं के शक्तिशाली योगदानों का होना शुरू हो चुका था।

राजतंत्रा और स्थाई सेना की स्थापना और बाद के काल में ’’क्षत्रिय’’ की मान्यता और वर्ण व्यवस्था की स्थापना परोक्षरूप से आक्रमणों या विजयों के परिणामस्वरूप हुई। इनकी संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। आक्रमण के पक्ष में एक और दावा है कि अन्य स्थाई सभ्यताओं में भी आर्य समान आक्रमणों के साक्ष्य मौजूद हैं। ऐसे आक्रमण ग्रीस और पूर्व की सीमावर्ती एवं यूरोप की सभ्यताओं तथा गैर भारतीय कुलीनवंशी शासकों की ओर से रहे हों। ’’मनुस्मृति’’ के संदर्भ से भी ऐसा प्रतीत होता है। उत्तर पश्चिम से इस उपमहाद्वीप ने अनेक आक्रमणों को झेला है और ’’आर्य’’ जैसे आक्रमण का अनुभव बिलकुल ही अलग तो नहीं होगा। इन संभाव्य आक्रमणकारियों के उद्गम स्थल के संबंध में निर्णयक होना बड़ा कठिन है परंतु सभी संभावनाओं में उनका उद्गम काॅस्पियन सागर से ज्यादा दूर नहीं होगा।

ऋग्वेद की कुछ ऋचायें स्थापित कृषक समाज के संबंध में हैं परंतु पशुपालन के द्वारा किसकी आर्थिक जिंदगी पर असर पड़ा और काॅस्पियन सागर के विशाल जल से किसका सामना हुआ था। भौगोलिक रूप से परशिया इन वर्णनों से मेल खाता है अपेक्षाकृत काॅस्पियन सागर या उसके आस पास के भौगोलिक प्रदेशों के। ये प्रदेश मुश्किल से कृषि की संभावनायें रखते थे और अर्ध शहरी सभ्यताओं में भेड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी जो कि काॅस्पियन घाटी के चारों ओर पैदा होतीं थीं।

आर्यों की पहचान कराने वाले योद्धागण परशिया के योद्धाओं की एक शाखा भी हो सकती थी या वे मध्य एशिया में पैदा हुए हों या दक्षिण रूस में ऐसी सभ्यता के साथ जिसकी समानता परशियन सभ्यता से रही हो। ऋग्वेद की कुछ ऋचायें परशियन संबंधों की ओर इशारा करतीं हैं और दूसरी ऋचायें दर्शातीं हैं कि भारत आने वाली जनजाति के रीतिरिवाजों में परशियन रीतिरिवाजों की निकटता की झलक दिखलाई पड़ती है फिर चाहे उनका उद्गम परशिया भले न रहा हो। रूस और भारत में विभिन्न सगोत्रों और पारिवारिक संबंधों के बीच नामों की समानता इन आर्य कहलाने वाले गणों को या जनजातियों को कास्पियन के उत्तरी भाग पर रखते प्रतीत होते हैं। इस स्पष्ट विरोधी साक्ष्य के साथ का समझौता यह व्याख्या करता है कि वह कोई एक आक्रमण नहीं था वरन् अनेक प्रयासों या आवागमनों की एक आर्य गणों की श्रंृखला थी। उनमें से कुछ ने एक दूसरे का सहयोग किया हो जबकि कुछ ने एक दूसरे को विरोधी पाया हो या शत्राु माना हो।

आर्य आक्रमण

तरोताजे ऐतिहासिक उदाहरण हमें कुछ नुक्ते देते हैं जो कभी घटित हुए थे। भारत इस्लामी शासकों के आक्रमणों की लम्बी श्रृंखला का सामना कर चुका था जो मध्य पूर्व और केंद्रीय एशिया के भिन्न भिन्न जगहों से थी। अब यह विचारणीय है कि अनेक आर्यों जैसी जनजातियों या गणों ने समान सांस्कृतिक गुण विकसित किए जो परशिया, कंेद्रीय एशिया और दक्षिण काकेसस प्रदेश में छा गये और तब दक्षिण पूर्व भारत की ओर फैले और उत्तर एवं पश्चिम रूस, यूरोप तथा मेडेटरेरियन में भी फैले। यह संभव है कि भारत में प्रवेश कर उन्होंने भारत की कृषि सभ्यता को सीख लिया हो जो अनेक रूपों से और सांस्कृतिक रूप से ज्यादा विकसित रही हो।

वैकल्पिक रूप से ऋग्वैदिक काल के आक्रमणकारी राजपूतों या गज्जरों के समान रहे हों और भारत में, भूभागों को जीतते, उसकी सभ्यता को ग्रहण करते तथा उसमें कुछ सुधार करते हुए प्रवेश किया हो। आक्रमणकारियों की गीतगाथाओं को ऋग्वेद में प्रवेश मिला। ऋग्वेद की कुछ ऋचायें उनकी विजयों को गौरवांतित करतीं और उनके खास दृष्टिकोणों को प्रगट करतीं हैं। यह भी संभव है कि राजपूतों और दूसरे राजकुलों ने दरबारी इतिहासकार को कुलीन संबंधों की निरंतरता को प्रगट करने के लिए मनगढंत कहानियों को लिखने के लिए कहा हो।

हड़प्पा और वैदिक सभ्यता के बीच संबंध

जो भी हो, यह ध्यान देने योग्य है कि ऐसे आक्रमणकारियों के भौगोलिक उद्गम की परवाह किए वगैर यह लगभग निश्चित है कि गंगा के मैदानी शासकों में स्थानीय और आक्रमणकारी दोनों सम्मलित थे। मनुस्मृति समान ग्रंथ शासक गणों की बड़ी संख्या का वर्णन करते हैं, विभिन्न राष्ट्र्ों के उद्गम तथा द्रविड़ों के मूल के सहित जो ’’आर्यों’’ के समान कुलीन वंशज रहे हों। इसलिए यह कहना गलत होगा कि वैदिककाल के शासक गण केवल ’’आर्यों में से ही थे।

पहले की हरप्पन बस्तियों और गंगा के मैदानों में बसने वालों के बीच संबंधों के परिस्थितिगत एवं बाध्यकारी प्रमाण हैं। उदाहरण के लिए प्राचीन नदी के सूखने एवं स्थान बदलने के भौतिक प्रमाण और इन प्राचीन नदियों के किनारों की अनेक खुदाईयों ने विश्वास दिलाया इस दावे का कि गंगा के मैदानी निवासी मुख्यतया घरेलू प्रवासी ही रहे होंगे। जैसे सरस्वती नदी जो कभी सिंधु के समानांतर बहा करती थी।

शतरंज के मुहरे, पांसे, पशु मृण्मूर्तियां और दैवि आकृतियां भी हरप्पन और बाद की सभ्यताओं के बीच संबंध की ओर ध्यान आकर्षित करती है। राजस्थान और पश्चिमी मध्य प्रदेश के कुछ मंदिरों की सजावट उत्तर भारत में हरप्पन स्थानों की खुदाई में मिले कुछ जेवरातों से ली गई प्रतीत होती है।

कुछ विद्वान ’’शुलवासूत्रा’’ और हरप्पन सभ्यता के मध्य निरंतरता पाते हैं जिसने अपनी भौतिक प्रगति के कारण संभवतया समांतर और पारंपरिक और आध्यत्मिक दर्शन का सहगामी स्तर, शहरी योजनाबद्धता और कृषि व्यवस्थापन में से उत्पन्न किया हो। हरप्पन सभ्यता में दशमलव बाॅट और नाप के प्रमाण और बाद में, भारत में अंकीय दशमलव व्यवस्था ने आगे के दावों के लिए साक्ष्य प्राप्त किए।

आर्यों की संबद्धता

पहले जितना जाना गया था उसके मुकाबले ये सब कुछ भारतीय सभ्यता की निरंतरता की उंची श्रेणी का प्रमाण देते हैं और भारतीय ऐतिहासिक अभिलेख प्रगट करते हैं कि भारत में दार्शनिक एवं सांस्कृतिक उन्नतियों के संबंध ’’आर्य’’ आक्रमणकारियों से नहीं जोड़े जा सकते। वास्तव में, आक्रमण सिद्धांत का महत्व इस बात में कतई नहीं है कि ऐसा आक्रमण हुआ था या नहीं, वरन् भारतीय सभ्यता कथित आक्रमण का कितना ऋणी है।

उदाहरण के लिए, भारतीय इतिहास के आर्यकाल के बाद और इस्लामी आक्रमणों के पूर्व अनेक आक्रमण हुए जिनका प्रभाव इस उपमहाद्वीप पर पड़ा था। तब भी केवल ’’आर्य’’ आक्रमण ही सामान्यजन और विद्वानों का ध्यान आकर्षित करता है ! यह इसलिए कि मौलिक रूप से ’’आर्य आक्रमण’’ को ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहासकारों के द्वारा महत्व दिया गया था। ब्रिटिश सिद्धांतकारों द्वारा अन्वेषित ’’उन्नत’’ आर्य ऋग्वेद के आर्य संबंधी संदर्भ किसी प्रकार की विशेषता के लिए नहीं जाने गए और आर्यों के युद्धकाल की जानकारी कुछ ही भारतवासियोें को रही हो। यह आश्चर्यजनक नहीं होगा क्योंकि इस प्रकार के आक्रमणकारी योद्धा कुल या जनजाति की धरोहरों का भारतीय सभ्यता के लिए कोई विशेष महत्व नहीं था।
आर्य आक्रमण के पूर्व भारत में तुलनात्मक रूप से उन्नत कृषि व्यवस्था शहरी सभ्यता पर आधारित थी और उनके संभाव्य आक्रमण से कुछ ही शताब्दियों में ऋग्वेद में वर्णित आर्य भगवानों का पूजन बंद हो गया था और शनैः शनैः वे भारतीय अवचेतना से विलुप्त हो गये थे। ऋग्वेद में वर्णित ब्राह्मण गोत्रा नामों ने अपना महत्व खो दिया था। ब्राह्मण गोत्रा के अधिकांश नाम सामान्य जनता के उपयोग में आने लगे और उनका ’’आर्य’’ आक्रमण से कोई संबंध नहीं रहा। जैसा कि कौशाम्बी ने अपनी ’’इन्ट्र्ोडक्शन टू इंडियन हिस्ट्र्ी’’ में भारत में बहुत से ब्राह्मण ’’हिंदूआईज्ड’’ जनजाति से उठे थे जो पहले जडात्ववाद या गणचिह्न पूजक थे या उर्वरक देवों और या देवियों की अर्चना करते थे या प्रजनन् चिह्न जैसे ’’लिंग’’ या ’’योनि’’ को पूजते थे। इन हिंदूआईज्ड जनजातियों के अधिकांश अपने पुराने समय की पूजन विधि को कायम रख सके थे और अनेक ब्राह्मण गोत्रा नाम आर्य पूर्व के गणचिह्नों और दूसरे जनसमूहों के संघों से निकलकर उभरे थे।

उदाहरण के लिए भारतीय कुल देव में से सबसे ज्यादा माने जाने वाले शिव, किसी भी आर्य आक्रमण से संबंध रखते प्रतीत नहीं होते और वे हरप्पनों के प्रजनन् देव के ही प्रतिरूप वास्तव में, हैं। समान रूप से हनुमान, गणेश, काली, या महाराष्ट्र् के बिठोवा किसी भी आर्य गण से संबंध नहीं रखते क्योंकि इन में से किसी का भी उल्लेख ऋग्वेद में नहीं है। जनसामान्य के धर्म या फिर उच्च दर्शनशास्त्रा का मामला तो इनमें से बहुत ही कम याददास्त के योग्य है कि जिसका आर्य आक्रमण के साथ सीधे तौर पर तदात्म बैठाया जा सके।

वैदिक साहित्य के बेजोड़ भारतीय पक्ष

यह महत्वपूर्ण एवं ध्यान में रखने योग्य है कि वैदिक साहित्य का बहुत सा हिस्सा काव्यों की शैली और सारत्व में बेजोड़ तौर पर भारतीय है और यह असंभव नहीं है कि उनमें से कुछ ऋचायें हरप्पन मूल से हों। दार्शनिक मतों के अनेक रूप जो वैदिक साहित्य में खोजे और उन्नत हुए उनके प्राकृतिक संदर्भ भारतीय भौगोलिकता से संबंधित है। साथ ही वैदिक साहित्य के कुछ निश्चित दार्शनिक पक्ष हैं जिनको अन्य किसी दूसरी समकालीन सभ्यता में दुहराया नहीं गया परंतु और भी सभ्यतायें वैदिक सभ्यता की समकालीन रहीं हों।

वैदिक श्लोकों का सरोकार सब प्राणियों के एक दूसरे से जुड़े रहने में, मनुष्य के पारस्परिक सामाजिक जुड़ाव में, अनेकता में एकता के विचार में और किस प्रकार से समाज के विभिन्न हिस्से भिन्न भिन्न पूजा प्रार्थनायें और कामनायें रख सकें में था। दूसरे कुछ छंद इच्छापूर्ति का आधार मानकर ईश्वर के प्रति हैं और कुछ श्लोकों में ईश्वर के स्वभाव के बारे में शंकायें और प्रश्न हैं, क्या वास्तव में ईश्वर का अस्तित्व है और क्या कभी इन प्रश्नों के उत्तर मिल सकेंगे। वैदिक विचार के इन पक्षों पर भारतीय दर्शनशास्त्रा के बाद के सिद्धांतों ने व्याख्यायें दीं थीं और ये भारतीय साहित्य और दर्शनशास्त्रा में बारंबार उठ खड़ीं होतीं हैं।
भारत के बौद्धिक मतांवलंबियों के संघ वेद के समानंतर पैदा हुए और वैदिक गं्रथों में उप परिच्छेदों की तरह से जुड़े। जबकि अन्य कुछ वेदों से स्वतंत्रा होकर उत्पन्न हुए या उनके विरोध में। वेद के खंडनात्मक रूप जैन और बौद्ध, दोनों हैं। देखिए फिलास्फिकल डेवेलपमेंट फ्राॅम उपनिषादिक थेइज्म टू सांइटिफिक रीअलिज्म। उपनिषद, सांख्य और न्याय वैशेषिक मतांवलंबी, औषधियों पर निबंध, नीतिशास्त्रा, वैज्ञानिक तरीके, तर्कशास्त्रा और गणित स्पष्ट तौर से भारतीय मिट्टी की पैदायश हैं और भारतीय अनुभव एवं बौद्धिक उपक्रमों के परिणाम हैं।

भारत में उपलब्ध मंदिर और स्तूप की नक्काशियां और मूर्तियां सौंदर्य सिद्धांतों और सूत्रों पर बनायीं गयीं थीं जो किसी आक्रमणकारी या अप्रवासी ’’आर्य’’ के अनेक शताब्दियों के पश्चात् वे भारतीय समाज में घुल मिल चुके होंगे और यह संभव है कि इन विदेशी ’’आर्यों’’ ने कुछ निश्चित तकनीकी खोजों और अविष्कारों को प्रवेश दिलाया होगा। खासकर धातु विज्ञान, धातु के औजार या बढ़ईगिरी और इस प्रकार कृषि सभ्यताओं को गंगा के मैदानों में फैलाया एवं विकसित किया होगा। वस्त्रा उत्पादन के ज्ञान, औजार बनाने की कुशलता और धातु विज्ञान तो हरप्पन लोगों को तो पहले से ही ज्ञात थे।
संस्कृत की व्याकरण और उसकी व्यवस्थित वर्णमाला का ’’आर्य’’ आक्रमण से कोई लेना देना नहीं है। संस्कृत बेहद व्यवस्थित और संरचित भाषा है, वह बौद्धिक वादविवाद और गणित सूत्रों की अभिव्यक्ति के लिए पूर्णरूपेण सक्षम है। इस भाषा की व्यवस्थित वर्णमाला की यूरोपियन चचेरी बहिनों की वर्णमालात्मक बेतरतीबी और अटपटेपन से कोई तुलना ही नहीं बैठती। उसका शब्द भंडार और वाक्य रचना कथित आक्रमण के बहुत बाद में उन्नत हुए। यद्यपि दक्षिण भारत की भाषाओं की संरचना उत्तर की भाषाओं से कुछ भिन्नता रखती है परंतु भारत की अधिकांश भाषाएं – उत्तरी या दक्षिणी, दोनों – संस्कृत से निकले सामान्य शब्दों को आत्मसात् किए हुए हैं। इसके अतिरिक्त यह खास उल्लेखनीय है कि उत्तर भारतीय लिपि दक्षिण भारत की लिपि से किस कदर साम्य रखती है। स्वर और व्यंजन की ध्वन्यात्मक संगठना, ध्वन्यात्मक हिज्जे और अन्य अनेक समानतायें तो भारतीय भाषाओं की अक्षरात्मक लिपियां आर्यों के आक्रमण सिद्धांत को भाषाई सीमाओं या क्षेत्रा में पूरी तौर पर कमजोर करतीं हैं। वास्तव में, जब लिपियों, व्यंजनों और स्वरों की बात आती है तो भारत की सभी भाषायें आपस में गुंफित प्रतीत होतीं हैं और उनके करीबी रिस्तेदार दक्षिण पूर्व एशिया, युथोपिया और यहां तक कि कोरिया और मंगोलिया में कुछ हद तक मिलते जुलते हैं परंतु यूरोप में तो कतई नहीं। देखिए संदर्भ 6।

यह आश्चर्यजनक है कि भारतीय सभ्यता एक आयातित ’’आर्य’’ सभ्यता की समानार्थी की तरह से व्याख्यातित की जाती है और बहुत अधिक भारतीयों के स्वाभिमान को आर्यों के आक्रमण सिद्धांत को नकारने से बांध दिया जाता है। भारत में गणतंत्रावाद के पतन को तेज किए जाने सिवाय क्या हो सकता है और संभवतया उत्तरी मैदानों में स्थापित कृषि का तेजी से विस्तार किया। दूसरे कुछ संभाव्य लम्बे समय तक रहने वाले प्रभाव ’’आर्य’’ आक्रमण से जोड़े जा सकते हैं।

यह स्पष्ट ही नहीं है कि वैदिक साहित्य में आक्रमणकारी या अप्रवासीगणों को कितना स्थान दिया जाये, जबकि वैदिक सभ्यता हिंदू सभ्यता का ही उप समूह है।

जब वेदों के आर्यों को ’’हिंदू’’ सभ्यता की नीव गंगा के मैदानों में डालने का श्रेय दिया जाने लगा, हिंदू सभ्यता का सारत्व धीरे धीरे अनेक शताब्दियों का समय लेते हुए उभरने और ठोस रूप में प्रगट होने लगा। भीतरी परिवर्तन और पूर्व की जनजाति तथा मातृसत्तात्मक संस्कृति के साथ सम्मिश्रित होते हुए जनता और शासकों का हिंदूवाद उभरता रहा। यहां तक कि उसने वैदिक साहित्य से कुछ निश्चित दार्शनिक तत्व बचा रखे जो कालांतर में फैले और कुछ रूप में वेदों से पूरी तौर पर विपरीत दिशा में चले गए।

गंगा यमुना मैदान के बाहर आर्य वर्णित वैदिक सभ्यता का प्रभाव आम तौर से ही सीमित था। बंगाल, आसाम और उड़ीसा की सभ्यताओं पर वैदिक प्रभाव कम पड़ा औेर पूर्वी सभ्यताओं ने अपने खुद का और कुछ कुछ अतुलनीय पथ का अनुसरण किया जैसा कि दक्षिण भारत की सभ्यताओं ने किया था – वैदिक दर्शन को क्रमिक और आंशिक तौर पर ग्रहण किया था। संपूर्ण भारत वर्ष में बौद्ध और जैनों को भी परिवर्तित जन मिले और कश्मीर, उत्तर पश्चिम और पूर्व में बौद्ध धर्म का खासकर गहरा प्रभाव पड़ा जबकि पश्चिम भारत में, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और कर्नाटक में जैन धर्म बहुत प्रभावी था। झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिमी बंगाल और उड़ीसा में तांत्रिक प्रभाव महत्वपूर्ण रहा।

सारांश में हिंदू सभ्यता फिर चाहे हिंदू, बौद्ध या जैन या अन्य कोई मूलरूप से बेजोड़ और विभिन्न भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों एवं उन मानवीय प्रयासों से पैदा हुई जो कृषि के विकास और स्थाई सभ्यता के लिए लगातार किये जाते रहे थे।

भारत के इतिहास के लगभग तीन से चार हजार वर्षों को ’’आर्यों’ आक्रमण या आक्रमणों से जोड़ना कठिन है जैसा कि ब्रिटिश द्वारा उसे महत्व प्रदान किया गया था। जबकि ब्रिटिश का ’’आर्य’’ को भारतीय सभ्यता का बढ़ा चढ़ा कर बताने का उद्देश्य बहुत साफ है और यह समकालीन आर्यों के प्रश्नों के संबंध का धुंधलका जिसने भारतीय विद्वान वर्ग को जकड़ लिया था, बतलाता है कि ब्रिटिश द्वारा फैलाये गए इस सैद्धांतिक उलझाव को अभी तक नहीं सुलझाया जा सका।

इसका एक परिणाम यह है कि आर्यों का यह विवाद इतिहाकारों के साथ बहुत ही झगड़ालू रहा है जिन्होंने कटु और एकतरफा छोर पकड़ लिये हैं बिना यह देखे ही कि भारतीय सभ्यता के विकास में निरंतरता और अवरोध, दोनों बने रहे थे। इसने भारत के इतिहासकारों को अब जहां जहां नए स्मारकों की सामग्री उपलब्ध हो गई है उन भारतीय इतिहास के कालों एवं विवरणों को आज के उपलब्ध इतिहास में पुनर्गठित करने के महत्वपूर्ण लक्ष्यों से हटा दिया है।

भारत के मूल और युगांतरकारी इतिहास के भारतीय पक्ष खोजविहीन और अलिखित ही रह गए हैं। अंग्रेजी बोलने वाले इतिहासकारों के द्वारा संस्कृत और प्रादेशिक भाषाओं के ग्रंथों को पढ़ा नहीं गया और उनको अपनाया भी नहीं गया है। भारतीय इतिहास की प्रादेशिक विभिन्नताओं का अध्ययन नहीं किया गया। भारतीय इतिहास के बारे में झूठे सामान्यीकरणों को समूचे भारत में फैले और छोटे राज्यों के गहरे अध्ययन एवं मनन् के द्वारा सही करने की आवश्यकता है। जाति एवं लैंगिक समीकरण और सामाजिक आंदोलनों को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। सामान्यीकरण और सरलीकरण पर आधारित ’’मनुस्मृति’’ जैसे पुरातन ग्रंथ भारत में सामाजिक संबंधों और रीतिरिवाजों की अधूरी एवं विकृत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। यह स्मरणनीय है कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने ’’मनुस्मृति’’ का मृतोत्थान किया था और सामाजिक संबंधों की प्रादेशिक एवं स्थानीय विशिष्ठताओं के संबंध में ’’मनुस्मृति’’ बहुत ही कम समझ दे पाती है। देखिए संदर्भ 3।

भारत के दर्शन, विज्ञान, तकनीक एवं उद्योग के आर्थिक इतिहास के क्षेत्रों के बिखरे और अस्त व्यस्त अध्ययन को एकीकृत करने के लिए बहुत काम करना पड़ेगा। यह महत्वपूर्ण है कि स्वतंत्राता बाद से अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित भारी भरकम काम को देश की प्रादेशिक भाषाओं में अनुदित किया जाये। यह बहुत ही दुखद है कि भारतीय इतिहास में अनिवेषणों के सर्वोत्तम काम केवल इंग्लिश बोलने वालों के लिए ही उपलब्ध हंै। भारतीय इतिहासकारों की जमात द्वारा इन कुछ कामों पर ध्यान दिये जाने की जरूरत है।

आर्यों के उद्गम संबंधी विवाद कितना ही जटिल क्यों न हो, वह भारत के इतिहास का केवल एक पक्ष है जिस पर इतिहासकार एवं पुरातत्व विद्वान ताजी और नई अंतरद्ष्टि डाल सकते हैं और उसको भारतीय सभ्यता की विशाल गतिशीलता से समावेशित कर सकते हैं।

टिप्पणी और संदर्भः

1.डा. आर. बी. अम्बेडकर भारतीय संविधान पर अपने कार्य के लिए और साथ ही देश के दलित समुदाय के समर्थन के अपने कार्यक्रम के लिए प्रसिद्ध ने इस सिद्धांत के पीछे जातीय धारणाओं को महसूस किया और आर्य आक्रमण सिद्धांत के ब्रिटिश समर्थन को इन शब्दों में व्यक्त कियाः ’’आक्रमण सिद्धांत एक खोज है। यह खोज इस बात की स्वीकारिता के लिए जरूरी थी कि इन्डो-जरमन आधुनिक मौलिक आर्य जाति के सबसे शुद्ध लोग हैं। यह सिद्धांत वैज्ञानिक जांच पड़ताल की विकृति है। बल्कि इस सिद्धांत की अवधारणा पहले बना ली गई और उसे सिद्ध करने के लिए तथ्यों को बाद में चुना गया था। वह हर नुक्ते पर असफल रहा है।’’
ब.ब्रिटिश मानवशास्त्राी एडमंड लीच ने भी आर्य आक्रमण सिद्धांत को योरोपियन जातिवादिता से उपजा हुआ माना है।
2.’’भारत में ब्रिटिश शासन की शुरूआत से जो कुछ भी हुआ, कुछ हद तक, उसी कुटुम्ब के सदस्यों का पुनर्मिलन मात्रा है। औपनिवेशिक मिशिनरी के एक जाॅन विलसन ने सम्मुख होकर घोषणा की और स्वाभाविक तौर से इस पुनर्मिलन ने भारत का संपर्क ’’दुनिया के सबसे अधिक ज्ञानवान और लोकोपकारक देश से कराया।’’ श्री अरविंदो ने उद्धृत कियाः दी ओरीजन्स आॅफ आर्यन स्पीच / दी सीक्रेटस् आॅफ दी वेद पृ. 554 /,
3.देखिए मधु किसकरः मनुस्मृति टू मधुस्मुति,
4.देखिए मरिजा जिम्बूतासः दी सिविलीजेशन आॅफ दा गाॅडेस, दी वल्र्ड आॅफ ओल्ड यूरोप – भारत यूरोप भाषाओं की भाषायी समानताओं और कैसे ये समानतायें चारागाही घुमंतू पितृसत्तात्मक कुलीनों के स्वभाव और संस्कृति से संबंध रखतीं हैं।
5.पी. टी. श्रीनिवास आयेंगरः हिस्ट्र्ी आॅफ तामिल्स् उसी प्रकार से तामिल भाषा और सभ्यता के देशज विकास पर जोर देकर बतलाते हैं। यद्यपि उनके कुछ निष्कर्ष अनुमानित प्रतीत होते हैं जैसे कि तामिलनाडू को सुमेरियनों का ’’उद्गम’’ स्थल मानने के संबंध में। उनकी यह स्थापना कि तामिल भाषा और संस्कृति तामिल भूमि की ही उत्पत्ति है। उन्होंने प्राचीन तामिलों के मानवशास्त्राीय अवलोकन के उदाहरणों द्वारा सिद्ध किया है कि किस प्रकार से तामिल देश के खास भौगोलिक गुणों से उत्पादन के विशेष रूप और रहन सहन के तरीकों के विकास पर प्रभाव पड़ा जिसने उनकी भाषा और संस्कृति को रूप देने में योग दिया।

लेख का अंतिम परिवर्धनः दिसम्बर 7, 2006।

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