जिस प्रकार भारत के लोगों की उदारता और सम्पन्नता (सोने के अंडे देने वाली चिड़िया) के चर्चे सुनकर अंग्रेजों और मुगलों ने हिंदुस्तान को लूटने के लिए यहाँ आशियाना बनाया ठीक उसी तरह वर्तमान समय में भारत के हर अच्छे और खुबसूरत शहर के संसाधन और उसकी सुविधा-सम्पन्नता का लाभ उठाने के लिए बड़ी संख्या में खुदगर्ज लोग ऐसे स्थानों की ओर भागते चले जा रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों से शहरो की ओर, के अतिरिक्त यह पलायन देश की सीमाओं के पार से भी हो रहा है.
सर्वेक्षण बताते हैं कि देश में वर्ष 2030 तक 35 करोड़ लोग शहरों में पलायन कर जायेंगे जबकि 2050 तक यह संख्या 70 करोड़ को पार कर जाएगी.
ग्रामीण विद्यालयों में शिक्षकों का टोटा है. गावों में चिकित्सक जाना नहीं चाहते. उनका तर्क है कि गावों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. वह कैसे काम करें? इसी संकीर्ण विचारधारा के चलते दूरदराज के क्षेत्रों में विकास की बयार नहीं पहुँच पा रही है. हर कोई शहर में खासकर विकसित एवं बड़े शहर में ही बने रहना चाहता है. गरीब तबका रोज़गार की तलाश में विकसित शहरों की ओर तो भागता ही है साथ ही जल्दी से जल्दी शहर में स्थायी संपत्ति बना लेने के उद्देश्य से वह अपराध की ओर उन्मुख होता है. बढ़ते दु:साहसिक अपराध इस बात की तस्दीक करते हैं. इसके अतिरिक्त शिक्षित वर्ग के लोग भी एक अच्छी या सरकारी नौकरी प्राप्त करने के बाद बड़े शहरों में बस जाने की सोचने लगते हैं. अपनी माटी अपनी जन्मभूमि से मुंह मोड़ना कैसे उचित है?

अफ़सोस की बात ; ऐसे लोग जो रोज़गार, उच्च शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और दूसरी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए विकसित शहरों में अपना आवास बनाते हैं, वे ही उस शहर को बदहाल करने में पीछे नहीं रहते. उदाहरण के लिए; बाज़ारों का अतिक्रमण, बेतरतीब कालोनियां, मकानों के आगे कब्ज़ा, रेंगता यातायात, कराहती सड़के, बिजली की चोरी, भूगर्भ जल का अंधाधुंध दोहन, खतरनाक प्रदुषण, अपराध एवं लूटमार. क्या ये हालात ऐसे ही बन गए? यह ‘शहर चलो’ मानसिकता का परिणाम है.
जो शहर लोगों को तमाम सहूलियतें देता है वे ही लोग उस शहर की संस्कृति एवं तंत्र व्यवस्था को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं रखते. देश के सभी विकसित (तथाकथित) शहरों की स्थिति विकट है. दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता जैसे देश के तमाम बड़े शहरों और अब लखनऊ भी, के असल हालात आपके सामने अख़बारों की सुर्खियाँ बनकर उजागर होते ही हैं. इन बड़े शहरों की पहचान है – बेतहाशा जनसँख्या, बढ़ता प्रदुषण, अतिक्रमण, खस्ताहाल सड़कें, नाला बन चुकी नदी, बदजुबानी और अपराधों के काले साए से ग्रसित जिंदगी. सब बदल चुका है. लखनऊ, दिल्ली जैसे नवाबी शहरों में ‘पहले आप’ की शालीन परंपरा अब ‘पहले मैं’ की हवस में तब्दील हो चुकी है.
बढ़ते जन-सैलाब से शहर पर जो अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है उससे कानून व्यवस्था की धज्जियाँ तो उडती ही हैं इसके अतिरिक्त इसका खामियाजा शहर के निरपराध तथा संस्कृति के मूल संरक्षक निवासियों को भुगतना पड़ता है. इस घातक विसंगति का इलाज मात्र पुलिस के वश का नहीं.
तंत्र की विफलता हमें अराजकता के घनघोर रेगिस्तान की ओर ले जा रही है. शीघ्र कुछ करना होगा. विचारशून्यता के संकट से बाहर निकलने के लिए जरूरी होगा कि शहरों की मूल संस्कृति एवं पहचान बनाये रखने तथा सुगम प्रशासन सञ्चालन के लिए एक ठोस नीति मापदंड बनाया जाये जो प्रशासनिक तंत्र एवं शहर के मूल बुद्धिजीवियों की सहभागिता से संचालित हो.
यदि सरकारें पिछड़े शहरों एवं गावों को समृद्ध करने पर सारा ध्यान केन्द्रित करते हुए वहां बिजली की निर्बाध व्यवस्था रखते हुए , बड़े अस्पताल और लघु उधोगों की स्थापना करे तो विकसित शहरों की ओर अवांछित पलायन रुक जायेगा. इस कदम से विकसित शहरों तथा पूरे प्रशासनिक तंत्र पर पड़ रहे तमाम दबावों से मुक्ति मिल जाएगी.

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