समाधान- बिलकुल ! देखिए मारीच-वध के सम्बन्ध मेँ क्या लिखा है। मारीच को देखकर सीताजी कहती हैँ-
आर्यपुत्राभिरामोऽसो मृगो हरति मे मनः।
आनयैनं महाबाहो क्रीडार्थ नो भविष्यति।।(वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड सर्ग 43,श्लोक 10)
अर्थात्‌- हे आर्यपुत्र, यह मृग ऐसा सुन्दर है कि मेरा मन हरता है। आप इसको पकड़ लीजिए, हम इसके साथ खेला करेँगेँ।
और आगे इसी बात के पटापेक्ष मेँ सीताजी कहती हैँ-
यदि ग्रहणमभ्येति जीवन्नेव मृगस्तव।
आश्चर्यभूतं भवति विस्मयं जनयिष्यति।।
समाप्तवनवासानां राज्यस्थानां च नः पुनः।
अन्तः पुरे विभूषार्थो मृग एवं भविष्यति।।
भरतस्यार्यपुत्रस्य श्वश्रूणां च मम प्रभो।
मृगरूपमिदं दिव्य विस्मयं जनयिष्यति।।(अरण्य काण्ड श्लोक 16,17,18)
अर्थात्‌- अगर तुम इसको पकड़ लाओ तो हमारे लिए यह एक अद्‌भुत चीज होगी और जब वनवास समाप्त करके अपने देश चलेँगेँ तो आपके भाई भरत और मेरी सासेँ इसको देखकर आनन्दित हुआ करेँगी।
निष्कर्ष- इस बात से अपने आप साबित होता कि मांस भक्षण तो छोड़ियो वे शिकार तक नहीँ करते

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