बेटा, तुझे अर्जुन बनना है। अर्जुन की तरह ही अधर्म के विरुद्ध तलवार अस्त्र उठाना है।’ बालक शिवाजी माता जीजाबाई की बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे। वीर अर्जुन की शौर्यगाथा सुनने के उपरांत उन्होंने अपने दादाजी से पूछा- ‘दादाजी, माँ कहती हैं कि मुझे अर्जुन बनना है।’ अपने वंश के उत्तराधिकारी के मुख से महान विचारों को सुनकर दादाजी का हृदय गदगद हो उठा। वे माता द्वारा शिशु मन में रोपे गए उन भावों को और दृढ़ करना चाहते थे। उन्होंने कहा, ‘बेटे शिवा, अर्जुन बनने के लिए तो कृष्ण का साथ चाहिए।’ यह सुनकर शिवाजी का चेहरा मुरझा गया, बोले- ‘दादाजी! मुझे कृष्ण कहाँ मिलेंगे?’ दादा ने शिवाजी की व्याकुलता भाँप कर हँसते हुए कहा, ‘यदि अर्जुन बनने की ठान ली है, तो कृष्ण अपने आप मिल जाएँगे।’
शिवाजी ही नहीं, भारतीय इतिहास में ऐसे महान व्यक्तियों के असंख्य उदाहरण मिल जाएंगे, जिन्हें बचपन से ही अच्छे संस्कार देकर संवारा गया। श्रेष्ठ संस्कारों और उत्तम विचारों की नींव डालकर उनके चरित्र का निर्माण किया गया। उन्हें ऐसा उत्तम वातावरण दिया गया, जिसके आधार पर वे भविष्य में महान व्यक्तित्व के रूप में समाज के सामने आए।
प्राचीन समाज में माता के गर्भ को एक प्रयोगशाला का दर्जा दिया जाता था। नौ महीनों तक संस्कारों के माध्यम से गर्भस्थ शिशु का व्यक्तित्व गढ़ा जाता था। माता अपने श्रेष्ठ विचारों और संस्कारों से अपने शिशु के जीवन की दिशा तय करती थी। गर्भस्थ शिशु पर इन संस्कारों का कितना प्रभाव पड़ता है- इसका एक उदाहरण प्रहलाद का है। पौराणिक कथा है कि जब प्रहलाद की माता कयादु को महर्षि नारद से ब्रह्मज्ञान मिला, उस वक्त वे गर्भवती थीं। नारद ऋषि से मिले ज्ञान का गर्भस्थ शिशु प्रहलाद पर अमिट और दिव्य प्रभाव पड़ा। इस बालक को भविष्य में भक्त प्रहलाद के रूप में प्रतिष्ठा मिली, साथ ही, वह एक महान राजा के रूप में भी समाज के सामने आया।
यह विडंबनापूर्ण है कि आधुनिकता के प्रभाव के चलते आज के दौर में अनेक माताएँ गर्भावस्था में चलचित्रों व सस्ते मनोरंजन में अपना समय व्यतीत करती हैं। प्रभुचिंतन की जगह पदार्थों की चिंता में डूबी रहती हैं। भला ऐसी स्थिति में श्रेष्ठ विचारों वाले बालकों का जन्म कैसे होगा? नेपोलियन की माता के बारे में प्रचलित है कि वह गर्भावस्था में सैनिकों की परेड देखा करती थी। युद्धगीतों और बिगुलों की आवाज सुनकर उसका रोम-रोम खिल उठता था। फलस्वरूप नेपोलियन जैसे महत्वाकांक्षी योद्धा का निर्माण हुआ। कह सकते हैं कि यह बात पूरी तरह गर्भवती माता पर निर्भर है कि वह समाज को भविष्य में प्रहलाद जैसा भक्त देना चाहती है या नेपोलियन जैसा युद्धप्रिय व्यक्ति।
व्यक्तित्व-निर्माण का अगला चरण शिशु के संसार में जन्म लेने के साथ आरम्भ होता है। इस समय शिशु एक कोरे कागज के समान होता है, जिस पर हम अपना मनचाहा चित्र बना सकते हैं। कच्ची जमीन जैसे कोमल मन वाले बालक पर हमारे द्वारा दिए गए विचार, संस्कार और वातावरण ऐसे अंकित हो जाते हैं, जैसे कच्ची जमीन पर पगडंडियां बनती हैं। इन्हीं संस्कारों के आधार पर शिशु के भावी जीवन के आचार, विचार, व्यवहार विकसित होते हैं। इसलिए जरूरी है कि शिशु के जीवन के इस दौर का बहुत बुद्धिमानी के साथ नियोजन किया जाए। अनुचित शिक्षा और कुसंस्कार बालक को अनाचारी व चरित्रहीन बना सकते हैं। एक प्राचीन कथा इस बारे में है। श्रीमद्भगवद् पुराण के अनुसार तीन वर्षीय बालक ध्रुव जब अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था, तो उसकी सौतेली माँ सुरुचि ने उसे दुत्कार कर वापस भेज दिया। सौतेली माँ के व्यवहार से आहत बालक ध्रुव ने सारी घटना अपनी माता सुनीति को सुनाई। माता सुनीति ध्रुव के साथ हुए व्यवहार पर उत्तेजित नहीं हुई। सुनीति ने ध्रुव को प्रतिशोध का मार्ग नहीं दिखलाया। इसके स्थान पर परमात्मा प्राप्ति की ओर अग्रसर किया। उनका कथन था, ‘पुत्र, तू सांसारिक पिता की गोद का मोह त्याग और परमपिता की आनन्दमय गोद की ओर बढ़।’ माता सुनीति की यह शिक्षा आज के भौतिकवादी समाज के सामने एक आदर्श स्थापित करती है।

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