विश्व की सभ्यताओं तथा संस्कृतियों के सृजन तथा विकास में भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्राचीनतम देशों में होने के कारण यह देश विश्व की अनेक घुमक्कड़ जातियों, कबीलों तथा काफिलों की शरणस्थली रहा है। यूनानी, ईरानी, शक, हूण, पठान तथा मुगल समय-समय पर भारत में घुसपैठ करते रहे हैं, परन्तु वे सभी शीघ्र ही या तो यहां के जनजीवन में समरस हो गये या पराजित होकर भाग गये। 16वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मुगल बाबर भी भारत में एक विदेशी, आक्रमणकारी तथा लुटेरे के रूप में आया था। उसने मजहबी उन्माद तथा जिहाद की भावना से इस देश के कुछ भाग में लूटमार की, परन्तु वह यहां के जनजीवन को अस्त-व्यस्त न कर सका।

यदि केवल बाबर से लेकर औरंगजेब (1526-1707 ई.) के काल की कुछ प्रमुख घटनाओं का विश्लेषण करें तो सहज ही जानकारी हो जाएगी कि उस समय यहां के प्रमुख हिन्दू समाज ने उसका तीव्र प्रतिकार तथा संघर्ष किया था। यह संघर्ष राजनीतिक तथा सांस्कृतिक, दोनों ही धरातलों पर था। परन्तु मुगल आक्रमणकारी न तो इस देश को दारुल हरब से दारुल इस्लाम ही बना सके और न ही यहां के सांस्कृतिक जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर सके।

विदेशी लुटेरा बाबर

मुगल शासकों में बाबर पहला विदेशी आक्रमणकारी था जिसका पिता उमर शेख मध्य एशिया के एक छोटे से राज्य फरगना (आधुनिक खोकन्द) का स्वामी था। कई संघर्षों में असफल होने पर उसने भारत की ओर रुख किया। 1504 ई. में उसने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था। 1519-1526 ई. के बीच उसने भारत पर पांच आक्रमण किए। अप्रैल, 1526 ई. में वह पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी को हराने में सफल हुआ था।

“बाबरनामा” के अनुसार हिन्दुस्थान पर अधिकार करने की उसकी इच्छा थी। परन्तु बाबर को न यहां के लोगों से कोई लगाव था और न ही हिन्दुस्थान से। उसे केवल यहां की विस्तृत भूमि तथा अपार धन सम्पदा से लगाव था। वह यहां के हिन्दुओं को सर्वदा “काफिर” कहकर पुकारता था। हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम ने “हुमायूंनामा” में बाबर की लूट का वर्णन किया है। उसने लिखा है कि पानीपत के युद्ध के पश्चात्, “हजरत बादशाह (बाबर) को पांच बादशाहों का खजाना प्राप्त हुआ और उसने सब खजाना बांट दिया।” बाबर ने भारत के खजाने को अपने परिवार, रिश्तेदारों, दरबारियों में बांटा तथा किसी को भी इससे वंचित नहीं किया। समरकन्द, खुरासन, काश्गर तथा ईरान, अफगानिस्तान तक धन तथा उपहार भेजे। मक्का व मदीना धन भेजा। उसने स्वयं माना कि भेरा से बिहार तक (1528ई.) तक उसके पास 52 करोड़ की सम्पत्ति लूट के रूप में थी।

राणा संग्राम सिंह का महान संघर्ष

बाबर ने पानीपत के युद्ध को तो जीत लिया परन्तु हिन्दू समाज ने उसे केवल एक विदेशी, आक्रमणकारी तथा लुटेरे से अधिक स्वीकार न किया। बाबर के आगरा पहुंचने पर उसके अधिकारियों तथा सेना को तीन दिन तक भोजन नहीं मिला। घोड़ों को चारा भी उपलब्ध नहीं हुआ। अबुल फजल ने स्वीकार किया है कि हिन्दुस्थानी बाबर से घृणा करते थे। इस विदेशी लुटेरे बाबर का अपने जीवन का महानतम संघर्ष खानवा के मैदान में मेवाड़ के शक्तिशाली शासक राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) से हुआ। राणा सांगा महाराणा कुंभा के पौत्र तथा महाराणा रायमल के पुत्र थे। वे अपने समय के महानतम विजेता तथा “हिन्दूपति” के नाम से विख्यात थे। वे भारत में हिन्दू-साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने मालवा तथा गुजरात पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था। बाबर के साथ इस संघर्ष के बारे में इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है, “अब बाबर को ऐसे उच्च कोटि के कुछ योद्धाओं का सामना करना पड़ा जिनसे इससे पहले कभी टक्कर न हुई थी।”

इस भीषण युद्ध के प्रारंम्भ में ही बाबर की करारी हार हुई तथा उसकी विशाल सेना भाग खड़ी हुई। वास्तव में इस युद्ध में ऐसा कोई राजपूत कुल नहीं था जिसके श्रेष्ठ नायक का रक्त न बहा हो। परन्तु बाबर भागती हुई अपनी सेना को पुन: एकत्रित करने में सफल हुआ। उसने अपने सैनिकों में मजहबी उन्माद तथा भविष्य के सुन्दर सपने देकर जोश भरा तथा लड़ने के लिए तैयार किया, जिसमें उसे सफलता मिली। चन्देरी दुर्ग के रक्षक, राणा सांगा द्वारा नियुक्त मेदिनी राय ने 4,000 राजपूत सैनिकों के साथ संघर्ष किया। संख्या अत्यधिक कम होने पर भी केसरिया वस्त्र धारण कर सैनिकों ने अंतिम सांस तक संघर्ष किया।

राती घाटी का महायुद्ध

मुगल वंश का दूसरा शासक हुमायूं था, जो बाबर का चहेता तथा ज्येष्ठ पुत्र था। व्यक्तिगत जीवन में जहां बाबर शराब का व्यसनी था, वहीं हुमायूं पक्का अफीमची था। हुमायूं जीवन भर लुढ़कता रहा तथा उसकी मौत भी लुढ़ककर (सीढ़ियों से) हुई थी। उसने अपने शासनकाल में कुछ गिने-चुने संघर्ष किए, जिसमें उसे नाममात्र की सफलता मिली। हिन्दू जनता ने उसे पूर्णत: विदेशी शासक के रूप में जाना।

वस्तुत: कामरान बाबर का योग्यतम पुत्र था जो दिल्ली का शासक बनना चाहता था। उसने दिल्ली पर अधिकार करने के लिए पहले राजस्थान को जीतने की योजना बनाई। इस संदर्भ में राती घाटी युद्ध भारतीय शौर्य की एक अमर गाथा है। तात्कालीन मुगल इतिहासकारों ने इस घटना का जानबूझकर वर्णन नहीं किया है। यह युद्ध बीकानेर की भूमि पर 26 अक्तूबर, 1534 ई. को लड़ा गया। इसका वर्णन तत्कालीन लेखक बीठू सूजन ने 1535ई. में अपनी पुस्तक “छन्दराय जैतसी” में किया है। बाद में “वीर विनोद” तथा राजस्थान के अन्य इतिहासकारों ने वर्णन किया है।

इस संघर्ष में कामरान की सेना के साथ घमासान युद्ध हुआ। बीकानेर के शासक जैतसी ने इसमें समस्त राजस्थान के शासकों का सहयोग लिया। जैतसी ने एक विशेषज्ञ रणनीति अपनाई। इसके अनुसार भैंसों तथा बैलों के सीगों पर मशालें बांधी गईं तथा उन्हें भारी संख्या में बीकानेर के जंगलों में बिखेर दिया गया। बीकानेर की जनता को भी अपना बहुमूल्य सामान लेकर शहर छोड़ने की आज्ञा दी। उसने अपनी सेना को भी छुपा दिया। कामरान की विशाल सेनाएं जब बीकानेर पहुंचीं तथा नगर को उजाड़ पाया, यह देख कामरान अति प्रसन्न हुआ। विजय का जश्न मनाया। परन्तु जैतसी ने उसी रात्रि कामरान की सेना पर आक्रमण कर दिया। पशुओं की सींगों पर बंधी हुई मशालों की रोशनी में यह भयंकर संघर्ष हुआ। कामरान की सेना में भगदड़ मच गई, भाग्य से कामरान बच निकला परन्तु उसका शिरस्त्राण वहीं गिर पड़ा। कामरान की सेना को महान क्षति हुई, अत: इस युद्ध को खानवा युद्ध की पराजय के प्रतिकार के रूप में लिया गया।

हेमू द्वारा स्वराज्य स्थापना का प्रयत्न

मुगल वंश का तीसरा शासक अकबर भी विदेशी था। उसकी रगो में भी भारतीय रक्त की एक बूंद न थी। वह अफीम मिली शराब का व्यसनी था। निरक्षर था परन्तु उसकी बुद्धि विलक्षण थी। व्यक्तिगत रूप में उसमें महिला विषयक सभी लत थी। अबुल फजल के अनुसार उसके हरम में लगभग 3000 महिलायें थीं।

अकबर की भारत में विजय तैमूर की वंश-परम्परा के अनुरूप थी, जो नृशंसता, क्रूरता तथा दमन से पूर्ण थी। उसके युद्ध का उद्देश्य धन सम्पदा की प्राप्ति तथा साम्राज्य विस्तार की भावना थी। वह भी छल-कपट से दूसरों पर आक्रमण करने और जीत लेने के पागलपन से युक्त था। अनेक विद्वानों ने उसके कार्यों का असन्तुलित तथा बढ़ा चढ़ाकर वर्णन किया है। खासकर अकबर के हिन्दू प्रतिद्वंदियों के सन्दर्भ में एकपक्षीय वर्णन है। इन संघर्षों में हेमू, महारानी दुर्गावती तथा महाराणा प्रताप के नाम उल्लेखनीय हैं। उस युग में हेमू एक साधारण व्यक्ति से उठकर ऊंचे पद पर पहुंचा था। आदिलशाह सूरी के काल में वह एक विशाल सेना का सेनापति बन गया था। अपने जीवन में उसने 24 लड़ाईयां लड़ी थीं, जिसमें से उसने 22 में विजय प्राप्त की थी। 7 अक्तूबर, 1556 ई. को वह दिल्ली का सम्राट घोषित किया गया था। उसने “विक्रमादित्य” की उपाधि धारण की थी। उसके नाम के सिक्के भी खुदवाये गये थे। मध्यकालीन भारत में वह प्रथम तथा एकमात्र हिन्दू राजा हुआ था, जिसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया था। उसका अकबर से 5 नवम्बर, 1556 ई. को पानीपत के मैदान में संघर्ष हुआ। हेमू ने अकबर की सेना के तीन भागों में से दो को तितर-बितर कर दिया था। तीसरे अर्थात् केन्द्रीय भाग में स्वयं नेतृत्व कर युद्ध किया। परन्तु दायीं आंख में तीर लगने से युद्ध का पासा पलट गया। हेमू को बेहाशी की हालत में गिरफ्तार किया गया। वी.ए. स्मिथ के अनुसार उसका सर काटकर काबुल भेज दिया। उसके पिता को भरतपुर से पकड़कर दिल्ली लाया गया। इस्लाम मजहब न अपनाने पर उनका वध कर दिया गया।

विचारणीय है कि देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील हेमू की प्रशंसा क्यों नहीं की गई? एक प्रसिद्ध इतिहासकार डा. आशीर्वाद लाल श्रीवास्तव ने गंभीर विवेचना करते हुए सही लिखा, “इतिहास का कोई भी निष्पक्ष विद्यार्थी हेमू के सफल नेतृत्व की सराहना किये बिना नहीं रह सकता कि उसने देश से विदेशी शासन को समाप्त करने के लिए कितनी तत्परता से चेष्टा की।” भारत में यह हेमू का न्यायोचित अधिकार था। कम से कम भारत भूमि की विदेशियों से रक्षा करने में उसका योगदान अद्वितीय है। 350 वर्षों के विदेशी शासन को देश से उखाड़ फेंकने और दिल्ली में स्वदेशी शासन को पुन: स्थापित करने के लिए हेमू के साहसपूर्ण प्रयत्न की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम होगी।

वीरांगना दुर्गावती का बलिदान

सन् 1564 ई. में अकबर का गोंडवाना की विख्यात महारानी दुर्गावती पर एक विशाल सेना के साथ आक्रमण अकारण तथा साम्राज्यवादी लिप्सा का परिचायक है। रानी अपने पुत्र वीर नारायण की संरक्षिका के रूप में शासन चला रही थी। वह अत्यन्त लोकप्रिय तथा अनेक युद्धों की सफल संचालिका थी। वह शेरों का शिकार करती थी। अकबर के अतिक्रमण पर, उसने मुगल सेना से दो दिन तक भयंकर संघर्ष किया। शत्रु द्वारा पकड़े जाने व अपमानित होने की आशंका से उसने स्वयं छुरा भोंककर बलिदान दिया। राजमहल की महिलाओं ने जौहर किया।

जयमल राठौर व फतेहसिंह का बलिदान

मेवाड़ पर अकबर का आक्रमण उत्तरी भारत में सर्वोच्चता प्राप्त करने, साम्राज्य-विस्तार तथा वहां संचित अपार धन सम्पदा प्राप्त करने के लिए था। उसने चित्तौड़ पर दो आक्रमण किए। प्रथम 1567-1568 ई. में तथा दूसरा 1576 ई. में। प्रथम संघर्ष महाराणा उदय सिंह के साथ हुआ, जो मुगल शासक को एक “म्लेच्छ विदेशी” कहता था। उदय सिंह बड़ा दूरदर्शी शासक था। अकबर की नीयत को जानते हुए, उदय सिंह ने चित्तौड़ का समस्त खजाना पहले भामाशाह के पिता, अपने विश्वासपात्र भारमल की देखरेख में रख दिया था। साथ ही एक समानान्तर राजधानी तथा उदयपुर झील का निर्माण किया था। अकबर के आक्रमण के समय किले में 8,000 सैनिकों के साथ जयमल राठौर उसकी देखभाल कर रहा था। अकबर ने स्वयं चार महीने (20 अक्तूबर, 1567-23 फरवरी 1568 ई.) तक किले का घेरा डाला। किले पर अधिकार न होता देख बारूद से सुरंग बनाने की योजना बनाई। इसी में जयमल राठौर घायल हो गया। केलवा के 16 वर्षीय फतेह सिंह (फत्ता) ने संघर्ष जारी रखा और लड़ते-लड़ते अपने प्राणों की आहुति दे दी। अकबर ने दुर्ग पर कब्जा करने के पश्चात कत्लेआम की आज्ञा दी तथा 30,000 हिन्दुओं का कत्ल किया गया। अनेक कलाकृतियां नष्ट हो गईं, महिलाओं ने जौहर किया। “वीर विनोद” में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। क्या विश्व का कोई इतिहासकार अकबर के इस कालिमायुक्त कारनामे को भुला सकेगा?

हल्दी घाटी का महासंग्राम

चित्तौड़ हाथ से निकल जाने पर भी हिन्दू निराश नहीं हुए। 1572 ई. में उदय सिंह की मृत्यु के पश्चात महाराणा प्रताप का गोगुण्डा में राज्याभिषेक किया गया। विपरीत परिस्थितियों में भी उसके स्वतंत्रता के प्रयत्न चलते रहे। इन साहसपूर्ण प्रयत्नों के लिए कौन महाराणा प्रताप की अतुल प्रशंसा न करेगा?

अप्रैल, 1576 ई. में अकबर ने कुंवर मानसिंह व आसफ खां को आक्रमण के लिए भेजा। इस युद्ध की खास बात यह थी कि हिन्दू समाज के प्रत्येक वर्ग ने इसमें बढ़-चढ़कर सहयोग दिया। वनवासी भील भी किसी से पीछ न रहे। यह युद्ध ऐसा था जिसमें दोनों दलों ने अपने को विजयी माना। तत्कालीन सभी भारतीय स्रोतों-राज प्रशस्ति, अमर काव्य वंशावली, राणा रासो तथा जगदीश मंदिर के अभिलेख -जो 13 मई 1652 ई. का है, से यह स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि महाराणा प्रताप की सेना ने मानसिंह की सेना को खदेड़ दिया था। प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीनाथ हीराचन्द ओझा ने उपरोक्त अभिलेख को उद्धृत किया है। आधुनिक विद्वान डा. राजेन्द्र सिंह कुशवाहा ने हल्दी घाटी के संघर्ष के परिणामों की विशद व्याख्या की है। इस संघर्ष ने मुगलों की सेना के अजेय होने के विश्वास को समूल नष्ट कर दिया। संघर्ष में मुगलों के हाथ कुछ भी नहीं लगा, सिवाय महाराणा प्रताप के एक हाथी “राम प्रसाद” के, जिसका नाम अकबर ने “पीर प्रसाद” रख दिया। इस युद्ध से भारतीय नागरिकों में स्वतंत्रता की भावना का जागरण हुआ। यह कहना मूर्खतापूर्ण होगा कि अकबर महाराणा प्रताप की वीरता से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपने शेष जीवन काल में राणा प्रताप से संघर्ष नहीं किया। वस्तुत: महाराणा प्रताप को नीचा दिखलाने के लिए अकबर के निष्फल प्रयास चलते रहे। इसी काल में महाराणा प्रताप ने छीने गए अधिकांश प्रदेशों पर पुन: अधिकार कर लिया। वास्तव में महाराणा प्रताप सरीखे देशभक्ति के उदाहरण मिलने दुर्लभ हैं, उनकी तुलना अकबर जैसे साम्राज्यवादी से करना उचित नहीं है।

संक्षेप में, अकबर के काल में हेमू विक्रमादित्य, महारानी दुर्गावती तथा महाराणा प्रताप के हिन्दुओं के लिए संघर्षों की स्वर्णिम गाथा का कोई भी निष्पक्ष भारतीय इतिहासकार विश्लेषण तथा विवेचना करेगा तो निश्चय ही उपरोक्त तीन विजेताओं के देश की स्वतंत्रता के लिए, परकीय सत्ता को अस्वीकार करने वाले शासकों की कोटि में रखकर इतिहास में यथोचित सम्मान देगा।

जहांगीर तथा शाहजहां में टकराव

अकबर के पश्चात क्रमश: जहांगीर, शाहजहां तथा औरंगजेब शासक बने। ये तीनों ही मतान्ध थे। इनकी मजहबी कट्टरता तथा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विरुद्ध हिन्दू प्रतिकार चलता रहा। मेवाड़ के साथ इनका महाराणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र राणा अमर सिंह के साथ संघर्ष चलता रहा। 1599 ई. में अकबर ने अपने पुत्र सलीम तथा मानसिंह को भेजा था। जहांगीर के काल में 1606, 1608, 1609 तथा 1613 ई. में परस्पर युद्ध होते रहे। अंत में 1613 ई. में मेवाड़ से संधि हुई, जो औरंगजेब के काल तक प्रभावी रही।

इसी भांति बुन्देलों से टकराव बना रहा। 1626-1628 व 1635-1636 ई. में बुन्देलों ने शहाजहां को चैन से बैठने नहीं दिया। जोधपुर का अमर सिंह राठौर भी उसके लिए चुनौती बना रहा।

औरंगजेब के विरुद्ध हिन्दुओं का प्रतिकार

हिन्दुओं का महानतम संघर्ष तथा प्रतिकार मतान्ध तथा क्रूर अत्याचारी औरंगजेब के काल में हुआ। यह प्रतिकार उत्तर तथा दक्षिण भारत में हुआ। यह प्रतिकार गोकुल जाट के नेतृत्व में मथुरा से प्रारंभ हुआ। औरंगजेब के अधिकारी अब्दुल नबी को मार दिया गया, जिसने केशवराय मंदिर में आग लगा दी थी। बाद में गोकुल पकड़ा गया तथा आगरा ले जाकर उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर पुलिस चौकी पर फेंक दिया गया। उसके परिवार को जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया। बाद में राजाराम, राम चेरा व चूड़ामल ने इस संघर्ष को जारी रखा। नारनौल व मेवात के क्षेत्र में सतनामी सम्प्रदाय ने संघर्ष किया, जिसमें 2000 सतनामी शहीद हुए।

मुगलों का सिख गुरुओं से टकराव गुरुनानक देव से ही प्रारंभ हो गया था जब गुरुनानक देव ने अपनी वाणी में बाबर के भारत पर अत्याचारों की कटु आलोचना की थी। जहांगीर ने पांचवे गुरु अर्जुन देव को अनेक कष्ट दिए थे। औरंगजेब के काल में गुरु तेग बहादुर का बलिदान हुआ। गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना कर मुगलों से टक्कर ली। इन्हीं संघर्षों में उनके चारों पुत्रों का भी बलिदान हुआ था। बुन्देलखण्ड में चम्पत राय के नेतृत्व में मुगलों को चुनौती दी गई थी। बुन्देलखण्ड सतत् संघर्ष का केन्द्र बन गया। बाद में छत्रसाल के नेतृत्व में स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई थी। इसी काल में मेवाड़ तथा मारवाड़ में राजसिंह व अजीत सिंह से संघर्ष हुए।

औरंगजेब का सबसे भयंकर संघर्ष महाराष्ट्र के साथ हुआ जो उसके लिए युद्ध का अखाड़ा बन गया। शिवाजी के रूप में हिन्दू शक्ति का अभ्युदय तथा जागरण औरंगजेब के लिए अभिशाप बन गया। शिवाजी का लक्ष्य भारत भूमि से विदेशियों के साम्राज्य को नष्ट कर सुविशाल हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना था। इसी कारण औरंगजेब से अनेक संघर्ष कर उन्होंने 1674 ई. में हिन्दू साम्राज्य का राज्याभिषेक मनाया था। विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार श्री जदुनाथ सरकार ने लिखा “शिवाजी के राष्ट्रव्यापी कार्य से औरंगजेब तथा अन्य सभी मुगल ताकतें विचलित हो गई थीं। औरंगजेब शिवाजी के विरुद्ध अनेक सेनापति भेजता था, पर हर बार एक ही प्रश्न रहता था कि अब किसे भेजा जाए।” शिवाजी के पश्चात संभा जी, राजाराम व ताराबाई उसके लिए विनाशकारी साबित हुए थे।

वामपंथी इतिहासकारों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियां

यहां पर यह उल्लेखनीय है कि कुछ तथाकथित सेकुलरवादी तथा वामपंथी इतिहासकारों ने मुगल साम्राज्य को भारत का “शानदार” काल तथा मुगल शासकों की “महान मुगल” कहा है। इनके अनुसार अकबर तथा औरंगजेब तत्कालीन राणा प्रताप, शिवाजी की तुलना में “राष्ट्रीय शासक” थे। यहां तक कि वामपंथी लेखकों ने औरंगजेब को “जिंदा पीर” तक लिख डाला। जबकि उन्होंने राणा प्रताप, शिवाजी तथा गुरु गोविन्द का प्रभाव कुछ क्षेत्रों तक सीमित बतलाया। वस्तुत: 1960 के दशक से वामपंथी इतिहासकारों ने मुगल शासकों की तुलना करते हुए उन्हें महाराणा प्रताप, शिवाजी तथा गुरु गोविन्द सिंह से श्रेष्ठ बताते हुए एक झूठे प्रचार तंत्र तथा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अवसरवादिता को प्रश्रय दिया।

समझने के लिए यदि महाराणा प्रताप के संघर्षमय जीवन को लें तो विदेशी मुगल शासन की स्थापना के पश्चात पचास वर्षों में यह पहला मुगलों के विरुद्ध संघर्ष था, जिसमें मुगलों की अजेय सेना की धारणा को समूल नष्ट कर दिया था। हल्दी घाटी के महान संघर्ष ने हिन्दू समाज में नव चेतना, आत्मविश्वास तथा वीजिगीषु वृति को जगाया। वामपंथी इतिहासकारों ने महाराणा प्रताप को केवल दिल्ली के सम्राट के संदर्भ में ही देखने का प्रयत्न किया या मेवाड़ के राजाओं की श्रृंखला की एक कड़ी भर माना। वस्तुत: किसी शासक का मूल्यांकन तत्कालीन विद्वानों ने राष्ट्र जीवन मूल्यों के लिए किए गए प्रयत्नों के रूप में आंका जाना चाहिए। कर्नल टाड का यह कथन अकाट है कि “अरावली पर्वत-श्रृंखलाओं का कोई भी पथ ऐसा नहीं है जो प्रताप के किसी कार्य से पवित्र न हुआ हो-किसी शानदार विजय अथवा उससे भी शानदार पराजय से। हल्दी (घाटी) मेवाड़ की धर्मों पल्ली है तथा दिवेर का मैदान उसकी मैराथन है।” आगामी भारत के इतिहास में राणा प्रताप हमेशा प्रेरक रहे, अकबर नहीं। शचीन्द्र नाथ सान्याल की क्रांतिकारी समिति का कोई भी सदस्य ऐसा नहीं हो एकता था जो चितौड़ के विजय स्तम्भ के नीचे शपथ न ले। चितौड़ की तीर्थ यात्रा और हल्दी घाटी का तिलक अनिवार्य हो गया था। वस्तुत: अंग्रेजों के शासनकाल में दासता से मुक्ति दिलाने में प्रताप के नाम ने जादू का काम किया। 1913 में अपनी पत्रिका का पहला अंक प्रताप को समर्पित करते हुए प्रसिद्ध राष्ट्रवादी गणेश शंकर विद्यार्थी ने लिखा था “संसार के किसी भी देश में तू (प्रताप) होता तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने को न्योछावर करते। “अमरीका में होता तो वाशिंगटन या लिंकन से तेरी किसी तरह कम पूजा न होती, इंग्लैण्ड में होता तो वेलिंग्टन या नेलशन को तेरे आगे झुकना पड़ता, फ्रांस में जान आफ आर्क तेरी टक्कर में गिनी जाती और इटली तुझे मैजिनी के मुकाबले रखती।” एक विद्वान ने ठीक ही प्रताप को अकबर के विरुद्ध “भारत के प्रबल तात्विक भावना का प्रतीक” माना है।

इसी भांति महादेव गोविन्द रानडे ने शिवाजी को एक महान संघर्ष तथा तपस्या का परिणाम माना है। वामपंथी इतिहासकार शिवाजी को भी औरंगजेब की तुलना में राष्ट्रीय मानने को तैयार नहीं हैं, उनके संघर्षों को देश के साथ जोड़ने में उन्हें शर्म आती है। बल्कि वे सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, जस्टिस रानडे, पं. मदन मोहन मालवीय, आर.सी. दत्त व लोकमान्य तिलक का भी कटु आलोचना करते हैं, जिन्होंने राणा प्रताप, शिवाजी तथा गुरुगोविन्द सिंह को राष्ट्रीय पुरुष माना।

यह सर्वविदित है कि शिवाजी द्वारा हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना का लक्ष्य औरंगजेब जैसे “जार” शासक से भिन्न था। उनके द्वारा प्रारंभ किया गया आन्दोलन कोई व्यक्तिगत आन्दोलन नहीं था बल्कि एक देशव्यापी आन्दोलन था। जिसका लक्ष्य था हिन्दुत्व की रक्षा तथा भारत भूमि से विदेशी साम्राज्य को पूर्णत: नष्ट कर एक विशाल हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना। यहां पर यह लिखना अनुचित न होगा कि शिवाजी के काल में भारत में आठ विदेशी राज्य थे। यह उल्लेखनीय है कि न केवल मुगलों ने बल्कि इन सभी शक्तियों ने शिवाजी का लोहा माना था। ऐसी परिस्थिति में, हर समय घोड़े की पीठ पर रहने वाले शिवाजी की तुलना पालकी में बैठकर युद्ध करने वाले औरंगजेब से करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में कहीं भी राष्ट्रीय स्फूर्ति एवं जागरण के लिए औरंगजेब का एक भी नाद सुनाई नहीं देता, जबकि शिवाजी के जयघोष के बिना कोई राष्ट्रीय संघर्ष पूरा नहीं होता।

इसी भांति श्री गुरु गोविन्द सिंह का व्यक्तित्व एवं कृतित्व भारतीय इतिहास का ज्वलन्त उदाहरण है। श्री गुरु गोविन्द सिंह ने समस्त समाज को भययुक्त तथा नि:स्वार्थ भावना से ओतप्रोत किया था। नि:संदेह वे मुगल शासन के विरुद्ध एक प्रखर धर्मनिष्ठ योद्धा थे।

उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मुगल सम्राट विदेशी साम्राज्यवादी तथा अधिकतर मतान्ध थे। उन्हें भारत तथा भारतीय जनता से लगाव नहीं था। इसलिए राष्ट्रीय आन्दोलन के काल में भारतीयों को राणा प्रताप, शिवाजी तथा गुरु गोविन्द सिंह से प्रेरणा मिली, न कि अकबर या औरंगजेब से। इन तीनों का वैशिष्ट्य इस बात में था कि तीनों ने ही पराधीनता को नकार कर स्वाधीनता के लिए जीवन भर संघर्ष किया। बाबर से औरंगजेब तक राणा सांगा, हेमू विक्रमादित्य, राणा प्रताप, शिवाजी तथा गुरु गोविन्द सिंह के रूप में भारत में स्वराज्य की स्थापना के लिए सतत संघर्ष होते रहे।

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