झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पे इतिहास को इतना अधिक तोडा मरोड़ा गया की हम खुद ही अपना इतिहास भूल गए | जब आजादी के बाद के इतिहास का ये हाल है तब उस से पहले के इतिहास से छेड़ छाड़ का तो अंदाजा लगाना भी संभव नहीं |

जहां पति के मरने की आशंका मात्र से स्त्री शरीर त्यागने की सोच लेती हैं। इसे ही जौहर कहते हैं।

जौहर और सती प्रथा को समाज ने खुद ही मुस्लिम आक्रांताओ की ज्यादितियो के कारण विकसित किया और खुद ही ख़त्म भी किया |
इतिहास में देखने से पता चलता है की मुस्लिम आक्रांताओ के आने से पहले भारत में कितने भी आक्रमण क्यों न हुए हो पर कभी बलात्कार नहीं हुआ न मंदिरों का विध्वंस न धर्मांतरण ये मुसलमानों द्वारा ही लाया गया और सबसे पहला शिकार राजा दाहिर की प्रजा हुई |

प्रथम जौहर:- रानी पद्मिनी ने चित्तौड़गढ़ में दुर्ग स्थित विजय स्तम्भ व गौ-मुख कुण्ड़ के पास विक्रम संवत् 1360 भादवा शुक्ला तेरस 25 अगस्त 1303 में सौलह हजार क्षत्राणियों के साथ अग्नि प्रवेश किया।

द्वितीय जौहर:- महाराणा संग्रामसिंह (महाराणा सांगा) की पत्नी राजमाता महाराणा विक्रमादित्य की माता कर्णावती का विक्रम संवत 1592 में चैत्र शुक्ल चतुर्थी सोमवार, 8 मार्च 1535 को 23,000 क्षत्राणियों के साथ अग्नि प्रवेश किया। यह जौहर चित्तौड़गढ़ में दुर्ग स्थित विजय स्तम्भ व गौ-मुख कुण्ड़ के पास हुआ।

तृतीय जौहर:- महाराणा उदयसिंह के समय जयमल मेड़तिया राठौड़ फत्ताजी के नेतृत्व में चार माह के युद्ध के बाद सांवतों की स्त्रियों ने फत्ताजी की पत्नी ठकुराणी फूलकंवर जी के नेतृत्व में विक्रम संवत 1624 चैत्र कृष्णा एकादशी सोमवार 13 फरवरी सन् 1568 को सात हजार क्षत्राणियों के साथ चित्तौड़गढ़ में दुर्ग स्थित विजय स्तम्भ व गौ-मुख कुण्ड़ के पास अपनी-अपनी हवेलियों में अग्नि प्रवेश किया। उनके लिए संकल्प की पवित्रता अघिक महत्वपूर्ण थी।

चतुर्थ जौहर:- राजौरी कश्मीर में हुआ जिसको इसके होने के बाद से ही परिवर्तित किया जाता रहा | उसका एक फोटो आप ऊपर की फोटो में देख भी सकते हो जिसमे सिर्फ मानव कपाल ही दिख रहे हैं शायद ये भारतीय सेना के अप्रैल 1948 में राजौरी पहुचने पे खीची गयी थी तब तक ये सब वहां यूँ ही पड़े रहे |

अपने जम्मू एवं कश्मीर प्रवास में मेरा भी साक्षात् एक जीवित पदि्मनी से हुआ। वह स्थान भी देखा, जहां जौहर में उनका साथ पुरूषों ने भी दिया। यह दृश्य निश्चित तौर पर अटारी की ट्रेन से ज्यादा वीभत्स रहा होगा, क्योंकि जो कुछ भी कृत्य था, अपनों के जरिए किया हुआ था। शत्रु के छू लेने मात्र की कल्पना भी भयावह थी। क्षण भर में मर जाना और सोच-विचारकर संकल्प के साथ मरने में बड़ा अन्तर होता है।

मई 11 को जम्मू से चलकर राजोरी पहुंचा था। वहां सीधा बलिदान भवन गया। स्थानीय पार्षद भारत भूषण शर्मा हमारे साथ थे। बलिदान भवन स्थानीय तहसील का पिछवाड़े वाला हिस्सा है।

सन् 1947 के युद्ध या बंटवारे की जंग में पाकिस्तानी कबायलियों के जत्थे पुंछ, राजौरी और जम्मू में आक्रमण कर रहे थे। इन क्षेत्रों में किसान ही थे। न उनके पास हथियार थे, न ही इस घटना के लिए कोई तैयार था। जैसे ही सूचना आई कि आक्रांता हमला करने आ रहे हैं, गांव के हिन्दू स्त्री-पुरूष तहसील भवन में इकट्ठे हो गए। गांव की रक्षा में तैनात महाराजा (जम्मू) हरिसिंह जी के प्रभारी अपने 25 लोगों के साथ भाग गए। आक्रांताओं की संख्या हजारों में थी। अस्त्र-शस्त्रों से सुसçज्जत भी थे। केन्द्र सरकार को भी महाराजा ने सेना भिजवाने की प्रार्थना की थी, जिसे ठुकरा दिया गया।

कबायलियों के आगे बढ़ने की सूचना, गांवों में लूटमार, कत्लेआम और बलात्कार की बातें आग की तरह फैल रही थीं। राजौरी की तहसील में बन्द महिलाओं ने अपने पुरूष समुदाय के समक्ष प्रस्ताव रखा कि उन्हें जहर खाने की स्वीकृति दी जाए। बच पाने का दूसरा उपाय नजर नहीं आ रहा। आप लोगों को तो वे तुरन्त मार देंगे। हमें नहीं मारेंगे। पता नहीं किस-किस तरह की यातनाओं से गुजरना पड़े। इसलिए आक्रांताओं के हाथों नहीं पड़ना चाहतीं। इस प्रस्ताव को पुरूषों ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। घटना के साक्षी दो पुरूष एवं एक महिला से हमारा साक्षात् बलिदान भवन में हुआ।

उन्हीं में से श्रीमती रामदुलारी (76 वर्ष) ने आंखों देखा हाल हमको सुनाया। दोनों ही पुरूष भी वहीं बैठे रहे। रामदुलारी ने बताया कि एक-एक करके पुरूषों ने अपनी बहू-बेटियों को जहर बांटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते इसका प्रभाव भी सामने आने लगा। दुर्भाग्यवश ही कहें कि जहर चुकता हो गया। महिलाएं अभी बाकी थी।

दीवानगी शत्रु से लड़ने की नहीं थी। शत्रु के दुर्व्यवहार से बचने की भी थी। भावनाएं चरम पर रही होंगी। çस्त्रयों का दूसरा प्रस्ताव आया कि जिन-जिन के पास भी बंदूकें हैं, हमें मार दें। बंदूकें कम थी। दो-दो महिलाओं को एक-एक बार में मारा गया। गोलियां भी जल्दी ही समाप्त हो गई। तब फिर महिलाओं ने प्रार्थना की कि जल्दी करें। अपने शस्त्रों से हमारा गला काट दें। क्या माहौल रहा होगा। प्रस्ताव स्वीकार हो गया।

श्रीमती रामदुलारी ने बताया कि पुरूषों ने अपनी कटारें, तलवारें निकाल ली, तहसील में ही बने एक कुएं के पास पहुंचे और एक-एक महिला का सिर काटकर कुएं में डालते गए। छोटे बच्चों को छोड़ दिया गया। स्वयं श्रीमती राम दुलारी बारह साल की थी। इनकी मां को इनका जीवित रहना मंजूर नहीं था। अपने ससुर की कटार से इनके सिर पर तीन वार किए। हमको इन्होंने सिर से पल्ला हटाकर वे घाव दिखाए। स्वयं तो बेहोश हो गई थी, कैसे बची, नहीं मालूम।

गांव की आबादी लगभग चार हजार थी। आस-पास के गांवों से भी लोग भागकर राजौरी पहुंच गए थे। स्थानीय बाशिन्दे भी आक्रांताओं के साथ हो चुके थे। भीतर-बाहर मिलाकर लगभग बीस हजार लोग शहीद हो गए। यह सबसे बड़ा नरसंहार था। जिसे आज किसी भी रूप में याद नहीं किया जाता।

शहीद दिवस पर भी इनके लिए दो शब्द नहीं कहे जाते। जो बच्चे बच गए थे, वे भी पाकिस्तानियों के कब्जे में ही रहे। यह दिवाली की काली रात बनकर रह गई। किन्तु श्रीमती रामदुलारी ने कहा कि आप राजस्थान से आए हैं, जहां रानी पदि्मनी का जौहर इतिहास में दर्ज है। हमने भी उसी जौहर का अनुकरण करके दिखाया, जिस पर हम गर्व करते हैं। हमें खेद नहीं कि हमारी गाथा किसी ने सुनी या नहीं। केन्द्र सरकार ने घटना का उपयोग अपनी राजनीति करने में लिया। जैसा कांग्रेस हमेशा से करती रही है

जब महाराजा ने लोगों को बचाने के लिए सेना भेजने की गुहार दोहराई, तब केन्द्र ने जम्मू सरकार के समक्ष विलय स्वीकार करने की शर्त रखी। महाराजा ने शर्त स्वीकार की और छह माह बाद सेना पहुंची। बैसाखी के दिन, छह माह की गुलामी काटकर, लोगों ने स्वतंत्रता मनाई। आज भी उन्हें शिकायत नहीं है कि सरकार उनकी ओर झांकती भी नहीं है। तहसील भवन को स्मारक बनाने की स्वीकृति भी नहीं दी क्योंकि शायद ये सेकुलरवाद के खिलाफ है तब के बच्चे आज बूढ़े हैं। स्मृतियां ही अब इनकी धरोहर रह गई हैं।

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