मातंग का अर्थ होता है मेघ। मां दुर्गा का एक रूप है मातंगी। यह दस महाविद्या में से नौवीं विद्या है। मातंग नाम से एक ध्यान होता है, मंत्र होता है और एक हाथी का नाम भी मातंग है। ऋषि वशिष्ठ की पत्नी का एक नाम भी मातंगी है। ऋषि कश्यप की पुत्री का नाम भी मातंगी है जिससे हाथी उत्पन्न हुए थे। मातंगिनी मुद्रा दो प्रकार से होती है- 1.मातंगिनी क्रिया, 2.मातंगी हस्त मुद्रा। यहां प्रस्तुत है- मातंगिनी क्रिया।
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दौहराव/अवधि : इसको बार-बार कर सकते हैं।

मुद्रा करने की विधि : शांत जगह में पानी के अंदर गले तक शरीर को डुबों लें और फिर नाक से पानी को खींचकर उसे मुंह से निकाल लें। फिर मुंह से पानी को खींचकर नाक से बाहर निकाल दें। इस क्रिया को ही मातंगिनी मुद्रा कहते हैं।

इसका लाभ : इस मुद्रा के अभ्यास से आंखों की रोशनी तेज हो जाती है। सिर दर्द में यह मुद्रा अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। इससे नजला-जुकाम आदि के रोग भी दूर हो जाते हैं। इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से चेहरे पर चमक आ जाती है और बाल भी सफेद नहीं होते हैं। इस मुद्रा के सिद्ध हो जाने पर व्यक्ति में ताकत बढ़ जाती है।

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