समस्त धार्मिक एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को नमस्कार l

आप महान हैं, क्यूंकि आप पुन: इस ऋषि भूमि को विश्व गुरु बनाने हेतु संकल्पित होकर कार्य कर रहे हैं, मुझे आशा है परन्तु मैं आप सबको आश्वस्त करता हूँ कि आप सब स्वयं से आश्वस्त रहें कि आप ऐसा मात्र इसी जन्म में नहीं कर रहे अपितु पिछले कई जन्मों (योनियों) से आप इस पुण्य-कार्य हेतु संकल्पित हैं l

आज तक जितने भी आन्दोलन, युद्ध, संघर्ष इत्यादि हुए हैं उनमे आप जैसी पुण्यात्माओं का योगदान सदैव रहा है, क्यूंकि आप जो इस जन्म में इस समय कर रहे हो, वो मात्र इस जन्म के संकल्प नहीं हैं, वो पूर्व में अनेकोनेक जन्मों (योनियों) से आप करते आये हैं… अर्थात आप केवल इस जन्म में ऐसे पुरुषार्थी हो … ऐसा नही है … आप पिछले अनेक जन्मों से ऐसे ही हो l

इतिहास के साक्षी युद्धों, आंदोलनों में आप जैसे पुरुषार्थियों और कर्मयोगियों द्वारा जो संकल्प लिए गये उन्हें पूरा करने हेतु ही आप पुन: मनुष्य योनि में जन्म लेकर अपने संकल्पों को पूर्ण करने हेतु आये हो l

आप महाराणा प्रताप की सेना में भी थे…
आप छत्रपति शिवाजी की सेना में भी थे…
आप चाणक्य के शिष्य भी थे…
आप महाभारत के धर्मयुद्ध में भी थे…
आप देवासुर संग्राम में भी थे…
आप ऋषियों के यज्ञों में भी थे…
आप व्यास की स्मृतियों में भी थे…
आप श्री राम की वानर सेना में भी थे…
आप कृष्ण के पांचजन्य के निर्देश पर भी युद्ध करते थे…
आप ब्राह्मणों की श्रुतियों, स्मृतियों, साधनाओं में भी थे…
आप क्षत्रियों के शौर्य, वचन और पराक्रम में भी थे…
आप वैश्यों के व्यापार कौशल में भी थे…
आप शूद्रों के अनुभव और परिश्रम में भी थे…

वही पूर्वजन्मों के कर्म और संस्कार आपको इस जन्म में भी प्रेरित करते हैं अपने पूर्व जन्मों के अधूरे संकल्पों को पूरा करने हेतु, परन्तु यह भी तो हो सकता है कि पूर्व जन्मों में आप जितने पराक्रमी, अनुभवी, निपुण, ज्ञानी थे… इस जन्म में आप उतने पराक्रमी, अनुभवी, निपुण, ज्ञानी न हों… या हो सकता है कि पूर्वजन्मों से अधिक भी हों l

परन्तु यह स्पष्ट है कि शिक्षा पद्धति, रहन-सहन, भौतिकवाद के कारण हमारा स्तर तो गिरा ही है, चाहे वो किसी भी रूप में हो l
कुछ प्रश्न आप सबके लिए छोड़ रहा हूँ… इनके उत्तर भी मैं यहाँ पर लिख सकता हूँ, परन्तु चाहता हूँ कि आप स्वयं अपने स्तर पर इनके प्रश्नों के उत्तर खोजें…

जन्म एवं मृत्यु क्या कर्म-फल के सिद्धान्त और नियम से बाहर है ?
क्या नये जन्म मे आपके पूर्वजन्म मे किये गये कर्मों का कोई संबन्ध नहीं होता ?
क्या इस जन्म मे किये गये कर्मों का प्रतिफ़ल आपको प्राप्त हो चुका है ?
क्या इस जन्म मे किये गये कर्मों का लेखा जोखा मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जायेगा ?

कर्म कितने प्रकार के हैं ?
प्रारब्ध कर्म क्या होते हैं ?
संचित कर्म क्या होते हैं ?
क्रियमाण कर्म क्या होते हैं ?

वर्तमान योनि और पूर्व-पूर्व जन्म में प्राप्त हुई योनियो का DNA  पूर्व पूर्व योनियो मे किये गये कर्मो द्वारा निर्धारित और फलित हो चुका है… अत: आपके वर्तमान जन्म के कर्मो से ही आने वाली समस्त योनियो का DNA निर्धारित होगा l

संक्षेप में कहूं तो आने वाली योनियों के DNA का Updation इस जन्म में बरते गये कर्मों के आधार पर भी होगा और पूर्व जन्मों के आधार पर भी l

आप जो इस जन्म में हैं, आपका स्वभाव, प्रकृति, प्रवृत्ति, विकृति, सत्य, “धर्म-परायणता तथा धर्म-निरपेक्षता”, यम-नियम, क्रोध, अहंकार, कोमलता, दयाभाव, पौरुष, कायरता, ब्राह्मणत्व, क्षात्रत्व, वैश्यत्व, शूद्रत्व… आदि सब पूर्व पूर्व योनियों में किये गये कर्मों द्वारा जनित होता रहा है और Updated भी होता रहा है l

ये भी निश्चित ही है कि ऋषियों की हम संताने पिछले कई जन्मों से अपने कर्मों, शास्त्रों से दूरी, शस्त्रों से दूरी, आदि जैसे कई कारणों के माध्यम से अपना DNA DownGrade करते चले आ रहे हैं, आप आकलन कीजिये अपने पूर्वजों के संस्कारों, बल, बुद्धि आदि का अपने
साथ और फिर एक बार सोचिये कि क्या हम सही अर्थों में आज धर्म, राष्ट्र, संस्कृति की रक्षा करने लायक हैं … ??

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, अपनी धर्म-परायणता को निखारने और उसको प्रखर रूप में स्थापित कर ऋषि भूमि को पुन: विश्व गुरु बनाने हेतु अपने इस जन्म के DNA को भी और प्रखर बनाएं, जिससे कि यदि इस जन्म में भी कुछ संकल्प अधूरे रह जाएँ तो आगे आने वाले जन्मों (योनियों) में उन संकल्पों को पूर्ण करने हेतु आप दक्ष हो सकें… Update हो सकें l

कठिन हो सकता है परन्तु असंभव नही…

किसी योग्य गुरु का चुनाव करें और उनके सान्निध्य में व्याकरण की शिक्षा प्राप्त करें उसके उपरान्त वेद, वेदाङ्ग, दर्शनो, पुराणो इत्यादि मे से जो भी सुलभ् हो उसका अध्ययन करें और और अपने धर्म को जान कर अपनी धर्म-परायणता को निश्चित दिशा प्रदान करें l

धर्म-परायणता जिसे अधिकाँश हिन्दू उर्दू में कट्टरता कहते हैं… उसे बढायें … यदि संभव हो तो कट्टर कहने के स्थान पर धर्म-परायण कहना आरम्भ करें l

क्यूंकि कट्टरता के अर्थों को देखें तो कट्टरता जड़ता का पर्याय है… तमस का प्रयाय है, जिस प्रकार ठहरे हुए पानी में कीड़े पड़ जाते हैं, उसी प्रकार होती है ये कट्टरता l

इसके विपरीत धर्म-परायणता सात्विकता का पर्याय है, गति-शीलता का जिसके अंतर्गत स्वाध्याय के माध्यम से अविरल बहते जल के समान ज्ञान के प्रकाश को बढ़ाते हैं तथा अपनी प्रज्ञा को निखारते हैं l सत्यापित अर्थों में धर्म-निरपेक्षता का मूक एवं सटीक प्रयुत्तर आप अपने विरोधियों को देने लगेंगे l

चुनाव आपको करना है … धर्म-परायण या धर्म-निरपेक्ष l

और यदि धर्म-परायणता का प्रचार प्रसार आपने किया तो आपके आने वाले जन्मों में आप और अधिक प्रखर बन कर जन्म लेंगे और आपकी इस प्रखरता का लाभ आपकी आने वाली पीढ़ियों को भी प्राप्त होगा l

“क्या आप अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत में सर्वोत्तम DNA देना नहीं चाहेंगे ?

यदि अब भी सनातन-धर्मी कुछ न समझें…
तो वो अपनी आने वाली पीढ़ियों को वर्तमान से भी निम्न-स्तर पर पहुंचा देंगे l
जबकि हमारे पूर्वजों ने हमे उत्तम से उत्तम संस्कारों से परिपूर्ण होकर अपने बल, बुद्धि, वीर्य, शौर्य, पराक्रम, प्रज्ञा से हमारे DNA को सबसे समृद्धशाली बनाया, जिसका लोहा पूरे विश्व ने माना है l

जिस प्रकार आप अपने परिवार के लिए आने वाले वर्षों के लिए व्यापार-सेवा आदि करके धन अर्जित करते हैं और संचित करते हैं… ऐसे ही पुण्य कार्यों द्वारा अपने क्रियमाण और संचित कर्मों का उत्तम निर्वाह करके… उन्हें अपने प्रारब्ध कर्मों में जोड़िये अर्थात उनका Fixed-Diposit कर दीजिये l

ईश्वर में विश्वास रखिये… यह निवेश आपको आने वाले अनेकोनेक जन्मों (योनियों) तक लाभान्वित करेगा और इसका ब्याज भी आपको समय समय पर लाभान्वित करके आपकी प्रसन्नता को बढाता रहेगा तथा आपको आने वाले जन्मो में धर्म, राष्ट्र और संस्कृति हेतु प्रज्ञावान और वीर्यवान बनाता रहेगा l

इससे अच्छी TIP आपको Share-Market में भी कोई नहीं दे सकता l

आने वाली पीढ़ियों के संरक्षण और विकास हेतु इस लेख का अधिक से अधिक प्रचार करें l

जय हिन्दू राष्ट्र!
जय श्री राम कृष्ण परशुराम ॐ
साभार-लवी भरद्वाज सावरकर

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