वर्तमान समय में भारतीय विधि तथा न्याय व्यवस्था के अत्यधिक जटिल, व्ययसाध्य तथा विलम्बशील होने के कारण अनेक बार यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या कोई ऐसी प्रणाली या प्रक्रिया हो सकती है जो जन-साधारण को समुचित तथा सरल रूप से विधि का ज्ञान करा सके, तथा शीघ्र एवं स्वल्प व्यय के साथ न्याय दिला सके l

आइल लिए हमको प्राचीन संविधान तथा न्याय व्यवस्था का ज्ञान होना आवश्यक है, यह ज्ञान हमको – वैदिक साहित्य, वेदांग, सूत्र-ग्रन्थों, स्मृति-शास्त्रों, रामायण, महाभारत, पुराणों तथा अन्य अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों, संस्कृत काव्यों आदि के अध्ययन से ही हो सकता है l

भगवन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो गीता का उपदेश दिया था उसमे भी कहा था कि कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय करने में तुम्हारे लिए शास्त्र ही प्रमाण हैं, शास्त्रों के कहे गये कर्म को तुम्हें इस संसार में करना चाहिए l

तस्माच्छास्त्रं प्रमाण ते कार्याकार्यव्यस्थितौ l
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ll श्रीमद्भगवद्गीता – १६.२४

प्राचीन भारतीय मनीषियों का ध्येय और आदर्श था कि अधर्म का विनाश करके धर्म की स्थापना की जावे l अपराध होना ही अधर्म है l अत: अपराधों के अस्तित्व का न्याय द्वारा विनाश करके धर्म की स्थापना करनी चाहिए l अत: प्राचीन मनीषियों ने न्याय की स्थापना को ही धर्म माना था l

अपराध होते क्यों हैं ?
इसके पीछे मानसिकता क्या है ?
अपराध का मूल कारण अरिषडवर्ग (काम – क्रोध – लोभ – मोह – मद – मत्सर ) हैं, इन छ: शत्रुओं को जीतने से ही पापों का, अधर्म का विनाश होकर धर्म की स्थापना होगी l इसी से न्याय की उचित व्यवस्था बनेगी l
दार्शनिक परिभाषा में काम का अर्थ है – अनुचित इच्छा का मन में होना l
यह अनुचित इच्छा ही मनुष्य को कुत्सित कर्म करने में प्रवृत्त करती है, इस इच्छा की पूर्ति के लिए मनुष्य विविध प्रकार के पाप कर्म करता है l मनु ने कहा था कि जो व्यक्ति काम (इच्छा) से रहित है, वह कोई कार्य नही करता l मनुष्य द्वारा जो कोई भी कार्य किया जाता है, वह काम की ही चेष्टा है l

मनुष्य की प्रेरणाओं का मनु ने समुचित विश्लेषण किया था और कहा था कि प्रत्येक चेष्टा के पीछे प्रेरक शक्ति काम है l मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह लैंगिक और भावनात्मक आनंद को प्राप्त करे, इसके लिए उसको भौतिक संपत्ति (अर्थ) को प्राप्त करना आवश्यक है, अर्थ की प्राप्ति के बिना कोई भी भौतिक कामना पूर्ण नही हो सकती, कामशास्त्र के रचयिता ऋषि वात्स्यायन ने कहा था कि भौतिक आनंद को प्राप्त करने हेतु भौतिक संपत्ति को प्राप्त करने के लिए किये गये कार्य ही पापों का (अपराधों का ) मूल हैं, इन कामनाओं को पूरा करने की इच्छा करना और प्रयत्न करना ही व्यक्तियों में परस्पर द्वेष उत्पन्न करता है, परस्पर टकराहट उत्पन्न करता है और इसलिए मनुष्य पाप (अपराध) करता है l

मनुष्य की ये इच्छाएं (काम) अन्य भावनाओं को उपन्न करती हैं… ये भावनाएं हैं :- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर l इस प्रकार पापों (अपराधों) के लिए मनुष्यों को प्रेरित करने वाले छ: तत्व हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर l इनको  ”रिपुषडवर्ग” भी कहा गया था और ये मनुष्य के स्वाभाविक शत्रु हैं, रिपु का अर्थ ही शत्रु होता है l प्राचीन मनुष्यों के अनुसार इन छ: शत्रुओं को जीतकर धर्म की स्थापना करनी चाहिए l इसी से अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रियनिग्रह प्राप्त होते हैं, संक्षेप में कहा जाए तो यही धर्म है l दुसरे शब्दों में यही न्याय है l

अहिंसा सत्यमस्तेय: शौचमिन्द्रियनिग्रह: l
एते सामासिकं धर्मं चातुर्वर्न्येब्र्वीन्मनु: ll मनुस्मृति १०.६३

प्राचीन समय में प्रशासन व्यवस्था के विकास के साथ साथ विधि तथा न्याय व्यवस्था का विकास हुआ, वैदिक संहिताओं में वरुण और सोम देवता को शासन, विधि एवं न्याय का अधिष्ठात्र देवता कहा गया है l

लोक व्यवहार में राजा को ही वरुण का प्रतिनिधि माना जाता रहा था, राजा का कर्तव्य है कि शासन व्यवस्था के विधि-नियमों का सुचारू रूप से पालन कराये तथा जनता को त्वरित तथा सत्य-न्याय उपलब्ध कराये l

प्राचीन राजनीति तथा धर्म से सम्बन्धित ग्रन्थों से उस युग की विधि तथा न्याय-व्यवस्था के संगठन का विशद परिचय मिलता है, बृहस्पति, कौटिल्य, शुक्र, कामन्द्क, मनु, पराशर, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, नारद, गौतम, वसिष्ठ, अंगीरा आदि ऋषियों और मनीषियों ने विस्तार से विधि और न्याय-व्यवस्था के संगठन का विशद परिचय दिया है और विवेचना की है, उनके ग्रन्थों में न्याय व्यवस्था की सैद्धांतिक तथा व्यवहारिक रूप से विस्तृत प्रस्तुती है, इन मौलिक ग्रन्थों के अनन्तर निबन्ध ग्रन्थों में – ‘वीरमित्रोदय’, ‘कृत्यकल्पतरु’, ‘व्यवहार-निर्णय’, ‘विवाद-तांडव’ आदि में न्याय व्यवस्था का विस्तृत रूप से वर्णन है l

प्राचीन संस्कृत काव्यों में विधि-निर्माताओं तथा न्यायाधिकारियों के गुणों एवं विशेषताओं, न्यायालयों के अन्य कर्मचारियों एवं न्यायालयों की कार्य पद्धतियों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है, इन प्राचीन काव्यों में कहीं-कहीं न्यायालयों में पक्षपात एवं भ्रष्टाचार का भी किसी सीमा तक संकेत है l ‘मृच्छकटिकम’ प्रकरण में निर्दोष चारुदत्त पर चलाया गया अभियोग तथा उसके लिए मृत्यु दंड दिया जाना इसका उदाहरण है l

प्राचीन धर्मशास्त्रों के अनुसार विवादों के निर्णय जिन विशेष नियमों के एवं कानूनों के आधार पर होते थे, उनको पांच भागों में विभक्त किया जा सकता है –
1) वेदादि धर्मशास्त्रों के निर्देश,
2) देश, जाति एवं कुल की रीतियाँ,
3) विभिन्न वर्गों के अपने रीति-रिवाज,
4) तर्क,
5) त्रैविध वृद्धों की सम्मतियाँ

प्राचीन न्याय व्यवस्था में साक्षी का भी बहुत महत्व था, यह लिखित और मौखिक दोनों प्रकार की हो सकती थी, विधि सम्बन्धी ग्रन्थों में साक्षी के गुणों का विशद वर्णन किया गया है, ये दोनों प्रकार की साक्षी लौकिक ही थी, प्राचीन ग्रन्थों में दिव्य साक्ष्य को भी बहुत महत्व दिया गया था l

प्राचीन समय की दंड प्रणाली कठोर थी, तथापि यह सुधारात्मक भी थी, कठोरता इसलिए भी थी कि सामान्य जन को इससे शिक्षा मिल सके l दण्डों के कठोर होने के कारण जन सामान्य की प्रवृत्ति अपराधों की और से विमुख रहती थी तथापि सरल, सस्ता और त्वरित न्याय उपलब्ध होता था l

प्राचीन धर्मशास्त्रों में आठ प्रकार के दण्डों का उल्लेख मिलता है:-
1) वाग्दण्ड
2) धिग्दण्ड
3) अर्थदण्ड
4) उद्वेजन
5) अंग-विच्छेदन
6) निर्वासन
7) कारावास
8) मृत्युदंड

प्राचीन संस्कृत शास्त्रों तथा काव्यों के आधार पर प्राचीन समय में विधि-निर्माण की प्रक्रिया का बोध होता है और भारतीय ब्याय-व्यवस्था का व्यवहारिक रूप भी उपलब्ध होता है, इसका पर्यालोचन करके उसके गुणों को समझा जा सकता है तथा वर्तमान न्याय व्यवस्था में इसका लाभ उठाया जा सकता है l

प्राचीन न्याय-व्यवस्था में राजकीय कानूनों का बारीकी से ज्ञान होना अनिवार्य नही था, उस समय का न्याय एक प्रकार से प्राकृतिक तथा स्वाभाविक था, वादी तथा प्रतिवादी स्वयम ही अपने पक्ष को प्रस्तुत करते थे, इससे वस्तुस्थिति का आकलन अधिक सही होता था, न्याय का निर्णय भी त्वरित होता था तथा व्यय भी कम होता था, इस प्रक्रिया में बिचौलिये (वकील आदि)  यथासम्भव नहीं रहते थे, भ्रष्टाचार की सम्भावना न्यूनतम थी, मुकद्दमों का व्यय भी बहुत कम होता था, वादों का निर्णय बहुत कुछ स्वाभाविक था प्राकृतिक सिद्धांतों के आधार पर होता था l

वर्तमान समय में कानूनों के बहुत जटिल होने, सामान्य जन की समझ से बाहर होने और बिचौलिये के मध्य में होने के कारण मुकद्दमों के निर्णयों में बहुत विलम्ब होता है, इससे भ्रष्टाचार की सम्भावना में भी वृद्धि होती है, अनेक बार तो मुकद्दमा इतना लम्बा खिंच जाता है कि न्यायार्थी का अपना जीवन पूरा हो जाता है और वह न्याय को प्राप्त नही कर पाता l

वर्तमान समय के विधि कानूनों के अत्यधिक जटिल और पेचीदा होने से, न्याय की प्रणाली के अत्यधिक व्ययसाध्य और विलाम्ब्शील होने के कारण सीधा सच्चा व्यक्ति अपनी सत्य बात को कहने के लिए भी न्यायलय में जाने का साहस नहीं जुटा पाता… न्यायलय की यह समस्त पैशाचिक व्यवस्था अंग्रेजी शासन की देन है l

अत: आधुनिक भारत के मनीषी न्यायमूर्तियों तथा राजनीतिज्ञों का ध्यान, भारतीय विधि तथा न्याय व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में, ‘उपभोक्ता-अदालतों’, न्यायाधिकरणों और लोक अदालतों के गठन की और गया है, ये अदालतें प्राचीन पंचायत प्रथा से प्रभावित हैं l इस व्यवस्था में मुकद्दमों की तुरंत सुनवाई के साथ साथ ही निर्णय होकर जन-सामान्य का अमूल्य-समय, जन-धन की बर्बादी न होना आदि तत्व निहित हैं, वादी-[र्तिवादी को सरल एवं शीघ्र न्याय मिलने की सम्भावना रहती है, इसलिए भी आवश्यक है कि प्राचीन विधि और न्याय-व्यवस्था का वास्तविक रूप लोक के समक्ष प्रस्तुत किया जाये, जिसको जान कर पश्चिमी विद्या में पारंगत न्यायाधिकारी और शासनाधिकारी भी जनहित में ठीक ठीक निर्णय कर सकें l

भारत पर विदेशी आक्रान्ताओं के आधिपत्य काल में भी हिन्दू राज्यों में प्राचीन दंड-संहिताओं का कार्य प्रमुख रूप से प्रचलित रहा है, सत्रहवीं शताब्दी ई में ओरछा के राजा वीरसिंहदेव से प्रभावित मित्रमिश्र ‘वीरमित्रोदय’ और कुमाऊँ के राजा राज बहादुर की प्रेरणा से अनंतदेव ने ‘राजधर्म-कौस्तुभ’ निबन्ध ग्रन्थ संविधान और न्याय व्यवस्था सम्बन्धी लिखे l इस युग में अंग्रेजों और मुसलमानों के सार्वभौम राज्यों में उनकी न्याय व्यवस्था चलती रही l परन्तु हिन्दू राज्यों में भारत की प्राचीन न्याय व्यवस्था बहुत कुछ प्रचलित रही l अत: प्राचीन का अभिप्राय वैदिक युग से लेकर सत्रहवीं शताब्दी तक समझना चाहिए l

समस्त ऋषियों एवं मनीषियों ने इसी अपनी अपनी दण्ड-संहिताओं में निम्नलिखित सिद्धांत पर प्रमुख ध्यान दिया है :-
“अपराध को होने ही न देना, उसके लिए सर्वोत्तम दण्ड है तथा दण्ड देने से बेहतर है l”

समस्त युगों, शताब्दियों में समस्त दंडात्मक-क्रियाओं, दण्ड-संहिताओं आदि के अनुसार जन-साधारण में अपराध के प्रति भय एक प्रमुख उद्देश्य होता था, परन्तु इसके साथ साथ राजा तथा सम्पूर्ण शासन व्यवस्था इस बात का भी मुख्य ध्यान रखते थे कि उनकी प्रजा के लोगों का उतम चरित्र निर्माण हो सके, जिससे कि एक सभ्य, संस्कारी, शिक्षित तथा अपराध मुक्त समाज का निर्माण हो सके, वर्तमान में दंड-संहिताओं पर तो कार्य होता है परन्तु चरित्र निर्माण की और समस्त सरकारें निष्ठुर हैं l

इस लोकतंत्र और राजनीति में भारत का नागरिक पिस कर रह चुका है… बड़ा प्रश्न यह है कि क्यों की लोकतंत्र में राजनीती का क्या काम  ?

लोकतंत्र में लोकनीति होनी चाहिए… यदि राजनीती करनी है… तो फिर पुन: राजतन्त्र को स्थापित किया जाये l

साभार-लवी भरद्वाज सावरकर

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