धर्म या सत्य की खोज आध्यात्मिक आवश्यकता है। ब्रह्यांड की प्रक्रिया पर दृष्टिपात करने पर हम पाते है कि एक वस्तु के बाद दूसरी वस्तु अस्तित्व मे आ रही है या एक घटना के बाद दूसरी घटना घट रही है – महान सभ्यताओ, कला के महान प्रतीको तथा अन्य महान वस्तुओ का उदय होता है, विकास होता है और फिर अन्त हो जाता है। और हम यह प्रश्न करते है, ‘क्या अन्त होना ही सब कुछ है या कुछ ऐसा भी है जिसका अन्त नही होता?’ सतत् परिवर्तन की इस प्रक्रिया मे क्या कुछ ऐसा भी है जिसे अपरिवर्तनीय माना जा सकता है? यह ऐसा प्रश्न है जिसे हर प्रबुद्ध व्यक्ति अवश्य ही उठाता है। वह यह नही सोच सकता कि मात्र विनाश ही सम्पूर्ण अस्तित्व का अंत है और ब्रह्यांड की प्रक्रिया का उदय होता है और अवसान हो जाता है। यह प्रश्न अवश्य ही उठता है और यही कारण है कि सत्य के महान खोजी यह प्रश्न करते है।

उपनिषद् के ऋषि ने कहा है, ‘मुझे असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चल।’ दूसरे शब्दो मे उस ऋषि की यह अनुभूति है कि जिस विश्व मे हम रह रहे है, वह असत्य, अंधकार और मृत्यु वाला विश्व है, किन्तु वह यह विश्वास नही करना चाहता कि अन्धकार, मृत्यु और असत्य ही अस्तित्व या जीवन का अन्त है। वह किसी ऐसी वस्तु की आवश्यकता महसूस करता है जो इन बातो से परे ही है। अत: यह प्रार्थना करता है, ‘मुझे उस ओर ले चल।’

इसी प्रकार महात्मा बुद्ध ने प्रश्न किया, ‘बुढापा, बीमारी और मृत्यु ही सब कुछ है या इनके परे भी कुछ है? क्या मनुष्य बुढापे, बीमारी और मौत के लक्षण वाले समय के प्रभुत्व से स्वयं को मुक्त कर सकता है या विनाश ही परम सत्य है।’

इसी प्रकार ईसाई धर्मोपदेश के अनुसार, ‘मृत्यु सब कुछ का अन्त नही है। आखिरी जीत कब्र की नही होगी।’ ईसाई धर्म सूली पर लटके ईसा को अन्तिम सत्य नही मानता, वह कहता है, वह (ईसा) उठ खङा हुआ है।’ इसका मतलब यह है कि कुछ ऐसा है जो मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है। विनाश जिसका अन्त है, यदि ऐसा जीवन ही सब कुछ होता तो संसार का कोई भी मनुष्य ऐसे जीवन से सन्तुष्ट न होता। यदि समय ही सब कुछ है यानी सब कुछ को समय निगल जाता है और ऐसा कुछ भी नही है जो समय से बच जाए-यानी यदि शाश्वत या सनातन कुछ भी नही-तो जीवन का कोई भी अर्थ नही रह जाता है।

यदि जीवन का महत्त्व है, यदि इसका कोई अर्थ है, यदि इसका कोई उद्देश्य है तो हमारे पास कोई ऐसी वस्तु होनी चाहिए जो कालजयी या समय को लांघने वाली हो, जो हमे यह महसूस कराए कि हम सबमे कोई अमर तत्त्व है। यदि यह ब्रह्याण्ड की प्रक्रिया ही सब कुछ है या यह अस्तित्व ही सब कुछ है तो वास्तविकता या सत्य क्या है? इसका यह उत्तर है कि परमेश्वर ही सत्य है, क्योकि यदि परमेश्वर न होता तो अस्तित्व भी संभव नही होता।

क्या वह परम शक्ति, बुद्धिहीन या निष्क्रिय है? नही। विश्व मे जो भी व्यवस्था या नियम तथा प्रगति आप पाते है, वह इस बात का द्योतक है कि इस सबमे बुद्धि का उपयोग हुआ है और इस सबका कोई प्रयोजन है। जिस परमेश्वर को आप अनंत और अन्तहीन मानते है, क्या यह विश्व ही उसका संभावित प्रकट रूप है? क्या वह इस संभावना को प्रकट करने के लिए बाध्य है या इसके चयन के लिए वह स्वाधीन है? अत: हम इसे स्वाधीनता कहते है। आप इसे सच्चिदानन्द कह सकते है या प्रकृति, बुद्धि और स्वाधीनता कह सकते है। पर ये ऐसी बाते है जिन्हे हमे इस विश्व की प्रकृति की छानबीन करते समय और इन प्रश्नो को पूछते समय स्वीकार करना पड़ता है या मान्यता देनी पड़ती है- क्या यह बाहरी दुनिया ही सब कुछ है या इसके पीछे ‘कुछ’ है जो इसे ज्ञान देता है, जीवन देता है; क्या यह ‘कुछ’ बुद्धि रखता है और इसका कोई उद्देश्य है, क्या यह ‘कुछ’ अपने आपके चयन के लिए स्वाधीन है; क्या यह जो कुछ करना चाहता है, उसके लिए स्वाधीन है?

धर्म का वास्तविक गुण तब प्रकट होता है जब हम जीवन का सत्य जानने के लिए और इस दुनिया की दया और क्षमा योग्य वस्तुओ मे वृद्धि के लिए निरन्तर खोज करते है और सतत अनुसंधान करते है। अनुसंधान या खोज की लगन और उन उद्देश्यो का विस्तार जिन्हे हम प्रेम अर्पण करते है- ये वास्तविक रूप मे आध्यात्मिक मनुष्य के दो पक्ष होते है। हमे सत्य की खोज तब तक करते रहना चाहिए जब तक हम उसे पा न ले और उससे हमारा साक्षात्कार न हो। और जो कुछ भी हो, हर मनुष्य मे वही तत्त्व मौजूद है, अतः वह हमारे प्यार और हमारी सद्भावना का अधिकारी है। समाज और सारी सभ्यता केवल इस बात का प्रयास है कि मनुष्य आपस मे सद्भाव के साथ रह सके। हम इस प्रयास को बनाए रखते है। हम तब तक प्रयास करते है जब तक सारी दुनिया हमारा परिवार न बन जाए।

सब धर्मोँ मे इस बात का उल्लेख किया है। उनमे मानव चरित्र के इस पहलू पर बल दिया गया है जिसे मनुष्य का आध्यात्मिक पहलू कह सकते है। चार वेदो मे चार महावाक्य है जो इस पर बल देते है। वेदो की रचना जिस निष्ठापूर्वक की गई है कि विश्व के साहित्यो के इतिहास मे उसकी कोई मिसाल नही है।

प्रज्ञांनांब्रह्य (प्रज्ञा या बुद्धि ही ब्रह्म है।)
अयमात्मा ब्रह्म (आत्मा ही ब्रह्म है।)
अहं ब्रह्मास्मि (मै ब्रह्म हूं।)
तत्त्वमसि (वह तू ही है)

ये चार कथन चार वेदो से लिए गए है और ये एक ही मौलिक सत्य पर बल देते है। वह सत्य यह है कि मनुष्य वर्तमान स्थिति से ऊपर उठने की सामर्थ्य रखता है, वह अपना उत्कर्ष कर सकता है और वह अपने जीवन को परिपूर्ण कर सकता है। यह परिपूर्णता कोरा सपना नही है। पर यह कुछ ऐसी चीज है, जो कोशिश करने पर हम प्राप्त कर सकते है। ईसाई धर्मोँपदेश भी हमे यही बताते है, ‘क्या तुम यह नही जानते है कि तुम स्वयं भगवान का मन्दिर हो और तुममे परमात्मा का वास है? मोहम्मद साहब ने हमे बताया है कि ईश्वर तुम्हारी गर्दन की धमनी से भी अधिक तुम्हारे निकट है। प्रत्येक धर्म यह कहता है : देहो देवालयो नाम। देह यानी शरीर को देवालय समझना चाहिए; जीव सनातन है और उसकी प्रकृति शाश्वत है। यदि हम उस आत्मा की उपेक्षा करते है, परमात्मा के उस अंश की अपेक्षा करते है जो हम सबमे विद्यमान है तो हम अवश्य ही वस्तुओ, विचारो और सूक्ष्मताओ से सीमित हो जाते है। हम मानव की वास्तविक सृजनात्मकता खो बैठते है।

जब तक हम अस्तित्व की धारा से, घटनाओ के क्रम से, उन सब बातो से जो एक के बाद एक करके घटित होती रहती है, अपने को अलग नही कर सकते और जब तक हम यह महसूस नही कर सकते कि हममे कोई पदार्थेतर तत्व (जो मात्र पदार्थ-विषयक घटनाक्रम से ऊपर होता) है, तब तक हम सही मायने मे मनुष्य नही है- हम केवल वस्तु है और हम केवल स्थूल पदार्थ है। हम तब मानव नही है बल्कि समाज की मानवता रहित इकाई है। मुख्य बात यह है कि चाहे आप वैज्ञानिक हो, प्रोद्योगिकीविद हो, दार्शनिक या नाटककार हो, या चाहे कुछ भी हो, आपको अपने अन्दर मौजूद जीवित आत्मा की अनुभूति होनी चाहिए।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने अपना आदर्श वाक्य (मोटो) रखा हैः वेरिटास। इस लैटिन भाषा के शब्द का अर्थ हैः सत्य। हीडलवर्ग विश्वविद्यालय का आदर्श वाक्य हैः दी लिविंग स्पिरिट; यानि जीवंत चेतना। जीवंत चेतना आपमे मौजूद है और सब वस्तुएं उसके प्रकट रूप है; विज्ञान, साहित्य, कला आदि भी उसके प्रकट रूप है। जब मनुष्य स्वयं मे प्रवेश कर सकेगा और अपने सामने रखी बातो पर मत प्रकट कर पाएगा तभी उसमे निर्णय करने की क्षमता का जन्म होगा और तभी वह सृजन कर पाएगा।

हम ये सब बाते कह चुके है। पर व्यक्ति की पवित्रता के इस सिद्धान्त पर हमने समाज मे अमल नही किया है। किसी भी व्यक्ति का अपमान नही होना चाहिए, किसी भी मनुष्य को गरीबी, बीमारी और अज्ञानता द्वारा कुचला नही जाना चाहिए। जो उपदेश हम देते है; उस पर हम अमल भी करे तो हमारा सामाजिक ढाँचा इसे दर्शायेगा; परन्तु जब तक समाज का ढाँचा इसे नही दर्शाता, हमारा उपदेश गाल बजाना है और हमारे सिद्धान्त तथा व्यवहार मे शर्मनाक अंतर है।

इस विषय पर न केवल हमारे देश मे बल्कि दूसरे देशो मे भी हाल मे वास्तविक जागृति हुई है। ऐसी प्रवृत्ति दिखाई दे रही है कि जातिवाद, उपनिवेशवाद और ऐसी अन्य बुराईयाँ समूल नष्ट हो और मनुष्यो को राजनीतिक उत्पीड़न, सामाजिक अपमान, आर्थिक शोषण, जातिवादी अन्याय से मुक्ति दी जाए और इन सब अन्यायो का निराकरण हो। यदि हम वास्तव मे व्यक्ति को पवित्र समझते है, उसको सम्मान देते है, उसे परमेश्वर का अंश मानते है तो यह समझना हमारे लिए अनिवार्य है कि जब तक हम इस पर व्यवहार नही करते, हम अपने सिद्धान्तो के प्रति ईमानदार नही है। सिद्धांन्त बघारना एक बात है और उन पर व्यवहार करना बिल्कुल दूसरी बात। इसी कथनी-करनी के अन्तर ने हमे मौजूदा हालत मे ला खड़ा किया है और अगर हम अपनी हालत सुधारना चाहते है तो इसी अंतर को हमे मिटाना चाहिए।

अन्तर्राष्ट्रीय मामलो मे भी यही बात लागू होती है। पिछले दो हजार वर्षोँ के दौरान ऐसा एक दशक भी नही रहा जिसमे दुनिया मे सैनिक संघर्ष न हुआ हो। आज भी इस प्रकार के संघर्ष चालू है। सिद्धान्त है: ‘बुराई का प्रतिरोध करो।’ व्यवहार मे यह है: ‘यदि जरूरी हो जाए तो बुराई का प्रतिरोध लड़कर करो।’ दुनिया मे यही सब हो रहा है। परन्तु भगवान इनमे दखल नही देता। नक्षत्रो का प्रभाव भी इस पर नही पङता। जब ईसा को सूली पर चढा दिया गया, तब भी भगवान प्रकट नही हुआ और उसने दखल नही दिया।

इस दुनिया मे इतनी असमानता, इतना अन्याय है। मनुष्य को इसका अहसास करना चाहिए कि उसमे ईश्वर का अंश है; उसे अपनी सृजनात्मकता, अपनी स्वाधीनता का लेखा-जोखा खुद करना चाहिए। मनुष्य के लिए इस दुनिया को सुधारना संभव है, वह प्रगति करता है; उसके लिए बेहतर भविष्य बनाना हमेशा संभव है।

वर्तमान संकट की घड़ी मे हम देखते है कि अतीत धुंधला है, अत: वर्तमान मे हम अपनी महानता को समझे – उस महानता को जिसे हमने भुला दिया है, जिसकी हमने परवाह नही की है। इसे समझिए और इन आध्यात्मिक सिद्धान्तो पर सामाजिक व्यवहार करने का प्रयास कीजिए। इस पर ध्यान दीजिए कि समाज वास्तव मे ईश्वर द्वारा निर्धारित व्यवस्था को दर्शाए।

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