धर्मशास्त्रकारो ने हिन्दू विवाह के आठ प्रकारो की चर्चा की है।
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1. ब्रह्म विवाह –
धर्मशास्त्र मे ब्रह्म विवाह को उत्तम कोटि का माना गया है। इस विवाह के अन्तर्गत पिता शीलवान और विद्वान वर को आमंत्रित करके, कन्या को वस्त्र एवं आभुषण से सुसज्जित करके दान करता था। इस सम्बन्ध मे आपस्तम्ब का मत है कि ब्रह्म विवाह मे वर के कुल आचरण, धर्म मे आस्था, विद्या, स्वास्थय आदि के विषय मे जानकारी प्राप्त कर अपनी शक्ति के अनुसार कन्या को आभूषणो से सजाकर प्रजा की उपस्थिति तथा एक साथ धर्म कर्म करने के प्रयोजन से कन्या प्रदान करे।

  1. दैव विवाह –
    अपनी कन्या का विवाह करने के लिए पिता एक यज्ञ का आयोजन करता था। जो व्यक्ति उस यज्ञ को विधिपूर्वक सम्पन्न कर लेता था, उसी से उस कन्या का विवाह किया जाता था, जो सम्भवत: दक्षिणा के रूप मे विवाह के लिए प्रदान की जाती थी। मनु के अनुसार ज्योतिष्टोमादि यज्ञ मे विधिपूर्वक कर्म करते हुए ऋत्विज के लिए वस्त्र और अलंकारयुक्त कन्या का दान करना दैव विवाह है।
  2. आर्ष विवाह –
    जब कन्या का पिता धर्म कार्य की सिद्धि के लिए वर से एक बैल और एक गाय अथवा इनकी दो जोड़ी ऋषियो लेकर कन्यादान करता था, तब वह आर्ष विवाह कहलाता था। प्राय: सभी माता पिता अपनी कन्या का विवाह ऋषियो से करना चाहते थे, किन्तु ऋषियो की उदासीनता से वे मौन हो जाया करते थे। फलत: कन्या का पिता विवाह के प्रति इच्छुक ऋषि से एक गाय या बैल अथवा इनके जोङे लेता था ताकि यह प्रमाणित हो जाय कि अब ऋषि विवाह के लिए उत्सुक है। अत: वर से प्राप्त वह उपहार कन्या का मूल्य नही बल्कि भेंट होता था। शल्य ने अपनी बहन माद्री के विवाह के लिए कुल प्रथा के अनुसार अत्यन्त संकोच के साथ भीम से विक्रय मूल्य ग्रहण किया था किन्तु यह कन्या विक्रय नही था बल्कि पूर्वगामी परम्परा का निर्वाह मात्र था।

  3. प्रजापत्य –
    इस विवाह के अन्तर्गत वर की विधिपूर्वक पूजा करके कन्या का दान किया जाता था तथा वर वधू को यह निर्देश दिया जाता था कि गृहस्थ जीवन मे दोनो मिलकर जीवन पर्यन्त धर्माचरण करे|जीवन पर्यन्त पत्नी के साथ धर्म की वृद्धि की कामना करना, बिना पत्नी की अनुमति के दूसरा विवाह न करना तथा पारिवारिक जीवन की स्वस्थता, प्रजापत्य विवाह का मूल आधार थी। प्रजापति शब्द से प्रजापत्य बना है जो इस बात का प्रमाण है कि वर वधू प्रजापति के प्रति अपने ऋण अर्थात् सन्तान उत्पन्न करने और उसके पालन पोषण के उत्तरदायित्व का भली प्रकार से निर्वाह करे। आज हिन्दु समाज मे जो विवाह प्रकार प्रचलित है, वे प्रजापत्य विवाह के ही विकसित रूप हैं।

5.आसुर विवाह –
जब कन्या के माता पिता कन्या प्रदान करने के बदले मे वर से धन लेते है तो यह आसुर विवाह कहा जाता है। मनु का कथन है कि जाति वालो (कन्या के पिता, चाचा आदि) को कन्या के लिए यथाशक्ति धन देकर स्वेच्छा से कन्या स्वीकार करना आसुर विवाह है। महाभारत मे कहा गया है कि धन से कन्या को खरीदकर और उसके सम्बन्धियो को धन देकर जो विवाह सम्पन्न किया जाता है, विद्वान उसे आसुर धर्म कहते है। भीष्म ने पाण्डु का दूसरा विवाह भद्र नरेश को अपार धन कन्या के क्रय मूल्य के रूप मे प्रदान करके किया था। एक जातक से ज्ञात होता है कि उदय भद्दा नामक स्त्री ने कहा था कि मनुष्य अपार धन व्यय कर स्त्री प्राप्त कर सकता था।
साधारणत: ऐसी विवाह-पद्धति हिन्दुओ मे आदर की दृष्टि से नही देखी जाती थी। बौधायन ने मूल्य देकर खरीदी गई स्त्री को वैध पत्नी नही माना है। मनु का कथन है कि कन्यादान करता हुआ शूद्र भी कन्या का मूल्य न ले क्योकि ऐसा करने वाला कन्या बेचने वाला होता है। पद्मपुराण के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति कन्या बेचने वाले का मुख न देखे, यदि अज्ञान से उसका मुख देख ले तो सूर्य का दर्शन कर उस पाप से मुक्ति प्राप्त करे।

6.गान्धर्व विवाह –

जब युवक युवती परस्पर प्रेमवश काम के वशीभूत होकर अपने माता पिता की उपेक्षा करके विवाह कर ले तब वह विवाह गान्धर्व विवाह कहा जाता है। मनु ने कन्या और वर के इच्छानुसार कामुकतावश संयुक्त होने को गान्धर्व विवाह कहा है। यह प्रेम विवाह का सूचक है जो हिन्दु समाज मे वैदिक काल से लेकर आज तक विद्यमान है। वैदिक काल मे कन्याएँ प्राय: समारोहो मे अपने पति स्वयं चुन लेती थी। दुष्यन्त और शकुन्तला का विवाह गान्धर्व विवाह का उदाहरण है। एक जातक से ज्ञात होता है कि वाराणसी के आचार्य के एक शिष्य का स्थानीय युवती से प्रेम हो जाने पर उससे विवाह कर लिया। पुरुरवा और उर्वशी का प्रेम विख्यात है। शतरूपा ने प्रेम के वशीभूत होकर मनु को पति के रूप मे स्वीकार किया था। भवभूति ने मालती विवाह नामक नाटक मे गान्धर्व विवाह का उल्लेख किया है। मनु के अनुसार गान्धर्व विवाह सभी वर्गोँ के लिए धर्मसम्मत था और वात्स्यायन के अनुसार तो यही विवाह अनुरागमय, सुखद और सर्वश्रेष्ठ था।

  1. राक्षस विवाह-
    बल प्रयोग (युद्ध और संघर्ष के माध्यम) द्वारा किसी कन्या का अपहरण करके विवाह करना राक्षस विवाह था। मनु के अनुसार कन्या पक्ष वालो को मार मारकर अथवा उनको घायल करके घर के द्वार आदी को तोङकर तथा रोती चिल्लाती कन्या का अपहरण करके लाना राक्षस विवाह है।
    यह विवाह क्रुरता और निर्दयता पर आधारित था, इसलिए इसे राक्षस विवाह कहा गया। शक्ति और बल का प्रदर्शन केवल क्षत्रिय कर सकते थे, अत: यह विवाह उन्ही के लिए सुखद था। अपह्रत कन्या को पूर्णत अविवाहित कहा गया है और दूसरे के साथ उसका विवाह होना समुचित माना गया है। ऋग्वेद से ज्ञात होता है कि पुरुमित्र की पुत्री कमद्यु का विमद ने अपहरण किया था। काशी नरेश को पराजित करके भीष्म ने उसकी कन्या से अपने अनुज विचित्रवीर्य का विवाह किया था। श्रीकृष्ण ने रुक्मी को पराजित कर उसकी पुत्री रुक्मिणी से शादी की थी। पूर्व मध्य युग मे भी पथ्वीराज चौहान और संयोगिता का विवाह इसी आधार पर हुआ था।

8.पैशाच विवाह –
सोती हुई, मदहोश, उन्मत्त, मदिरापान की हुई अथवा मार्ग मे जाती हुई कन्या को जब व्यक्ति कामयुक्त होकर अपनाता है। तब वह विवाह पैशाच विवाह कहलाता है।
स्मृतियो ने इस विवाह की कटु निन्दा की है, याज्ञवल्क्य ने भी छल और कपट पर आधारित बताया है। शास्त्रकारो ने इस विवाह प्रथा को उत्तम नही माना परन्तु विवाह प्रकारो मे इसे ग्रहण कर लिया। कुछ धर्मशास्त्रकार जैसे आपस्तम्ब और वशिष्ठ आदि ने अपने धर्मसूत्रो मे इस विवाह प्रकार को स्थान नही दिया है। ऐसा लगता है कि वे ऐसे विवाह के बिल्कुल विरुद्ध थे।
वस्तुत: यह विवाह प्रणाली आदिकालीन है। यह सही है कि ऐसे विवाह का सम्बन्ध असभ्य और असंस्कृत जातियो से अधिक था, किन्तु बाद मे शक्तिशाली और पराक्रमी जातियो ने इसे प्रोत्साहन दिया।

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