➡ह्रदय मे यह प्रबल धारणा लेकर कि तुम परमात्मा के दूत हो, उसकी सन्तान हो, उसके उद्देश्यो की पूर्ति मे निमित्त मात्र हो, कर्मक्षेत्र मे कूद पङो।

➡जब कोई मनुष्य अपने पूर्वजो के बारे मे लज्जित होने लगे, तब समझ लो कि उसका अन्त आ गया। मै यद्यपि हिन्दू जाति का एक नगण्य घटक हूँ, तथापि मुझे अपनी जाति पर गर्व है, अपने पूर्वजो पर गर्व है। मै स्वयं को हिन्दू कहने मे गर्व का अनुभव करता हूँ। मुझे गर्व है कि मै आप लोगो का एक तुच्छ सेवक हूँ। तुम ऋषियो की सन्तान हो, तुम्हारा देशवासी कहलाने मे मै अपना गौरव मानता हूँ। तुम उन महनीय ऋषियो के वंशज हो जो संसार मे अद्वितीय रहे है।swami-vivekananda-45

➡हमारे धर्म के लिए भय यही है कि वह अब चूल्हे मे घुसना चाहता है। हममे से अधिकांश मनुष्य इस समय न तो वेदान्तिक हैँ, न पौराणिक और न तान्त्रिक। हम केवल “मत छुओ वादी” हो गए है, हमारा धर्म चूल्हे मे घुस गया है। “भात की हाण्डी” हमारा ईश्वर है और धर्म है, ‘हमें मत छुओ, हम पवित्र है।’ यदि यह भाव एक शताब्दी तक और चलता रह गया, तो हममे से हरेक का स्थान पागलखाने मे होगा।

➡शिक्षा हमारी राष्ट्रीय आवश्यकताओ के अनुरूप हो और जहाँ तक सम्भव हो सके, राष्ट्रीय पद्धति से ही दी जानी चाहिए।

➡हम चाहते है कि भारत की स्त्रियो को ऐसी शिक्षा दी जाये, जिससे वे निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्त्तव्य को भली भाँति निभा सके और संघमित्रा, लीला, अहिल्याबाई तथा मीराबाई आदि भारत की महान् देवियो द्वारा चलायी गई परम्परा को आगे बढ़ा सके एवं वीर प्रसूता बन सके। भारत की स्त्रियाँ पवित्र और त्यागमूर्ति है, क्योकि उनके पास वह बल और शक्ति है, जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा के चरणो मे सर्वस्वार्पण करने से प्राप्त होता है।

➡यदि न्यायपूर्वक कोई तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास हुआ तो हिन्दू जाति संसार की समस्त जातियो से, संसार के समस्त अन्य राष्ट्रो से नैतिकता के क्षेत्र मे बाँसो से ऊँची सिद्ध होगी।

➡यदि तुम्हारे अन्दर दूसरो के प्रति सहानुभूति नही है तो तुम चाहे संसार के सबसे बङे बुद्धिवादी दैत्य हो किन्तु तुम कुछ भी नही बन सकोगे। तुम निरे शुष्क बुद्धिवादी हो और वैसे ही सदा बने रहोगे।

➡यदि तुमने वैराग्य धारण किया है तो दृढतापूर्वक डटे रहो। यदि लङाई मे सैकड़ो गिर चुके हो, तो भी पताका को थाम लो और उसे लेकर आगे बढो। ईश्वर साक्षी है। चिन्ता मत करो कि कौन गिरता है। जो गिरने लगे वह पताका को केवल दूसरे हाथो मे थमा दे, तब यह कभी नही गिर पायेगी।

➡मै भविष्य को नही देखता, न ही उससे जानने की चिन्ता करता हूँ। किन्तु, एक दृश्य मै अपने मनश्चक्षुओ से स्पष्ट देख रहा हूँ, यह प्राचीन मातृभूमि एक बार पुनः जाग गई है और अपने सिंहासन पर आसीन है पहले से कही अधिक गौरव एवं वैभव से प्रदीप्त। शान्ति और मंगलमय स्वर मे उसकी पुनः प्रतिष्ठा की घोषणा समस्त विश्व मे करो।

➡एक लक्ष्य अपनाओ। उस लक्ष्य को अपना जीवन कार्य समझो। हर क्षण उसी का चिन्तन करो, उसी का स्वप्न देखो। उसी के सहारे जीवित रहो। मस्तिष्क, मांसपेशियाँ, नसे आदि शरीर के प्रत्येक अंग उसी विचार से ओत प्रोत हो और तब तक अन्य प्रत्येक विचार को किनारे पड़ा रहने दो। सफलता का यही राजमार्ग है, इसी मार्ग पर चलकर अब तक आध्यात्मिक महापुरूष पैदा हुए है। अन्यो को केवल बोलने वाले यन्त्र समझो।

➡यदि इस पृथ्वीतल पर कोई ऐसा देश है, जो मंगलमयी पुण्यभूमि कहलाने का अधिकारी, ऐसा देश, जहाँ संसार के समस्त जीवो को अपना कर्मफल भोगने के लिए आना ही है, ऐसा देश जहाँ ईश्वरोन्मुख प्रत्येक आत्मा को अपना अन्तिम लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पहुँचना अनिवार्य है, ऐसा देश जहाँ मानवता ने ऋजुता, उदारता, शुचिता एवं शान्ति का चरम शिखर स्पर्श किया हो तथा इस सबसे आगे बढ़कर जो देश अन्तदृष्टि एवं आध्यात्मिकता का घर हो, तो वह देश भारत ही है।

➡सर्वप्रथम मानव, प्रकृति एवं अन्तर्जगत के रहस्यो की जिज्ञासाओ के अंकुर यही उगे थे। आत्मा की अमरता, एक परमपिता परमेश्वर की सत्ता, प्रकृति और मनुष्य के भीतर ओत प्रोत एक परमात्मा के सिद्धान्त भी सर्वप्रथम यही उठे और यही धर्म तथा दर्शन के उच्चतम सिद्धान्तो ने अपने चरमशिखर स्पर्श किये। इसी भूमि से आध्यात्म एवं दर्शन की लहर पर लहर बार बार उमड़ी और समस्त संसार पर छा गई।

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