साँझ की लालिमा

पार्ट 1- सितार की झनकार

भइया ओ मेरे प्यारे रचित भइया
उठो वर्ना थोड़ी देर में बाबू जी पानीपत की युद्ध शुरू कर देंगे
आरती अपने भाई रचित को उठा रही थी।
रचित ने अंगड़ाई लेते हुए कहा-
“आरती की बच्ची सुबह सुबह
ये पानीपत का युद्ध कैसा ??
आरती – भाई बाबू जी के कमरे के बाथरूम का नल ख़राब हो गया है तो सुबह सुबह पानी की बर्बादी पर लंबा चौड़ा लेक्चर चालू है और तुम्हे ऑफिस नहीं जाना है क्या ??
आरती ने मासूमियत से मुस्कुराते हुए कहा।
रचित- अरे बाप रे म मैं तेरा कोई काम नहीं करने वाला हूँ आरती की बच्ची तू जब ऐसी मासूम शक्ल बनती है तो मेरी ज़िन्दगी में तूफ़ान लाती है।
आरती- ऐसा ?? शक्ल देखी है अपनी ? 31 साल के हो गए हो
अब तो मेरी सहेलिया भी अंकल बोलने लगी है वो तो मेरा इमेज ऐसा है की के लोग अभी भी तुमको वैल्यू देते है”
आरती ने होठो को गोल करके लगभग रचित को चिढ़ाने के अंदाज़ में बोला।
रचित- बस बस कम बता जानता हूँ तुझे और तेरी चुड़ैल सहेलियों को जिनकी तू बॉस बनी फिरती है।
आरती- अव्व्व्व्व् भाई तुम वर्ल्ड के बेस्ट भाई हो
शाम को 7 बजे एक मुशायरे का प्रोग्राम है जिसमे मुझे भी अपनी कविता सुनाने का इनविटेशन मिला है-आरती सब कुछ एक साँस में बोल गई और रचित का मुँह जैसे खुला रह गया
आरती- भाई ओ भाई तुम मुझे घर से पिक कर लोगे न ?? अपनी कार से ? बोलो न ?
रचित- अ हाँ पर मैं वहां रुकुंगा नहीं  क्योंकि तेरे अलावे भी कई पकाऊ होंगे ………
स्वरचित बाबू रचित के पिता थे किसी ज़माने में बनारस में बड़ा रसूख था खुद के कपड़ो की कई फैक्ट्रीया थी उनकी दो संतान रचित और आरती थी और पत्नी के स्वर्गवास के बाद वो काम पर धयान नहीं दे पाये तो काम धंधे में भारी नुकसान हो गया हालांकि अब उनके बेटे ने बखूबी काम और दफ्तर संभाल लिया है तो आर्थिक स्थिति पटरी पर आ गई किन्तु रचित 31वसंत देख चूका है और अब पिता और बहन बस इतना चाहती है की रचित की शादी हो जाए ।
शाम 6 बजे रचित अपनी ऑफिस से लिए निकला ही था
आरती को पिक करने के लिए तभी …
धड़ाम ……….
रचित – हे महादेव लगता है किसी ने मेरी कार ठोक दी पीछे से।
रचित गुस्से में बहार निकलता है- “अरे देख के स्कूटी नहीं चला सकती टेल लाइट तोड़ दी
मुझे अपनी बहन को पिक करना है ।
लड़की ने हेलमेट उतारा और बड़ी विनम्रता से कहा
“मुझे माफ़ कर दीजिये” उसकी आवाज़ में सितार सी झनक थी
जो 31साल के रचित को निःशब्द करने के लिए काफी थे।
रचित-अ अ ठीक है ठीक है कहते हुए कार में बैठ कर चुप -चाप चला गया|

पार्ट 2-मुशायरा

“भइया भइया जल्दी चलो कहा देर लगा दी” आरती ने रचित से पूछा
रचित- वो किसी ने पीछे से कार ठोक दी मेरी,खैर तुम बैठो मैं तुमको 20min में पहुचता हूँ।
आरती- भाई अब चल ही रहे हो तो मेरी भी कविता सुन लेना
रचित-देखते है
आरती-प्लीज भाई दूसरा परफॉर्मेंस मेरा ही है एक किसी को झेल लेना।
रचित आरती के जिद पर अंदर तो चला जाता है सभ्य श्रोताओ के बीच में खुद को असहज महसूस कर रहा था …….

तभी स्टेज़ से एक आवाज़ सुनाई
पड़ती है-
दोस्तों मैं कविता वर्मा एक प्रेम रस की कविता सुनाने जा रही हूँ जो शास्वत प्रेम को प्रदर्शित करता है
रचित-अरे य ये तो वही है जिसने मेरी कार ठोकी थी- रचित अपने बाजू में बैठे व्यक्ति से जोर से बोल पड़ा, पास बैठे श्रोता ने रचित को यु देखा जैसे ज़ज़ किसी मुजरिम को देखता है।

“प्रेम की गलियों में
मैं खोई रहती हूँ
तेरे ही स्वप्न देखने को
मैं सोई रहती हूँ
आ मेरे महबूब तू आ
बस अब तो
मिलन की आस में
मैं जिन्दा रहती हूँ”
कविता इस कविता को रचित सुन रहा था या कहीं गुम हो गया था ये तो वही जानता था,पर कविता खत्म होते ही रचित बेक स्टेज की तरफ तेजी से भागा।

अ अ अ सुनिए कविता जी रचित ने आवाज़ दी।
“आप” कविता इसके पहले कुछ बोल पाती रचित बोल पड़ा
हां वही जिसकी आपने 1घंटे पहले कार ठोक दी थी पर आपकी कविता सूंदर थी अति सुन्दर पर आप से ज्यादा नहीं

“इन नैनो से सुन्दर तो आपकी कविता नहीं,
इन अधरों से जो अल्फ़ाज़ निकले उससे खूबसूरत तो कोई अल्फ़ाज़ नहीं”
कविता की कविता
कविता से तो सुन्दर नहीं”

अ अ नजाने क्या क्या बोल रहा
हूँ क कुछ समझ में नहीं आ रहा है ।
तभी कविता और रचित दोनों चौक पड़े एक आवाज़ से
“भइया” तुमने फिर मेरी कविता नहीं सुनी ”
अ अरे आप मेरी दोस्त कविता को जानते है ??
कविता-नहीं आरती हम आज ही मिले है वो दरअसल मैंने इनकी कार की टेल लाइट तोड़ दी थी
और अभी मेरी कविता की प्रसंशा कर रहे थे तो ये है तुम्हारे भाई ” कविता ने नज़र अचानक झुका ली इस बात का एहसास होते ही रचित ने कविता से ज्यादा उसकी तारीफ की थी।

उस रात रचित करवटें बदलता रहा और कविता के ख़यालो में डूबा रचित मुस्कुराता रहा ……

पार्ट 3- हाल-ए-दिल

सुबह 8 बजे -“आरती चल मैं तुझे तेरे कॉलेज छोड़ देता हूँ”
आरती-अरे वाह भाई क्या बात है आज तो दिल खुश कर दिया”

BHU आर्ट एंड कल्चर कैम्पस
“आरती वो कविता जो कल मिली थी वो तेरे ही साथ पढ़ती है न ??
आरती- हां पर क्यों ??
रचित – अ कुछ नहीं तुम चलो..
पर रचित की नज़रें तो कविता को ढूंढ रही थी
काफी देर तक इंतज़ार के बाद
वो नज़र आ ही गई ….
“स्कूटी में कोई प्रॉब्लम है तो मैं ठीक करने की कोशिश करूँ ?
रचित ने कविता के पास जा कर कहा ”

अ आप व वो आप यहाँ कैसे
कविता भी कल रात की अपनी तारीफ का मतलब खूब समझ रही थी और शायद वो खुद भी
रचित के प्रति एक खिंचाव सा महसूस कर रही थी इसीलिए उसकी जबान लड़खड़ा रही थी।
खैर रचित ने स्पार्क प्लक को चैक किया और कविता की स्कूटी स्टार्ट हो गई।
कविता -थैंक यू सो मच रचित जी अ अ सॉरी जाना होगा
रचित- स सुनिए अगर मैं ये कहूँ
की मैं आपसे ही मिलने आया था
कविता-तो मैं कहूँगी क्यों ??
कविता ने जान बूझकर अपने होठो को दबाते हुए ये सवाल पूछा …..

व वो मैं सोच रहा था आपके अगले मुशायरे का इनविटेशन कार्ड कैसे मुझे मिलेगा आपके पास तो मेरा नंबर ही नहीं है-रचित का दिल ज़ोरो से धड़क रहा था..
कविता- पर आरती के पास तो मेरा नंबर है ही
“अ हाँ आरती के पास तो नंबर है पर व वो एक्चुली हाआह्ह् कविता ओफ्फ्फ तुम समझो न”
रचित की लडखडाती जुबान पर कविता ने ऊँगली रख दी
शाहह्ह्ह्ह्ह् “बुद्धू”

” घर शहर देश सब पराया सा लगता है
बस हर पल मुझे टी तेरा ही चेहरा दिखता है
बन गई हूँ मीरा तेरे प्यार में
तू भी बन कृष्ण
और
या तो मिल जा
या तार दे इस संसार से”
कल शाम 7 बजे गंगा किनारे
इंतज़ार करुँगी ……..
कहती हुई कविता ने स्कूटी स्टार्ट की और रचित के आँखों से ओझल हो गई ।

रचित को यकीन नहीं हो रहा था
आज जो कुछ भी कविता ने उससे कहा…
रचित खुद को जवान मशसूस कर रहा रहा जैसे वो सिर्फ 20-21साल का हो ..

अगली शाम-
“ऊहू उहू  क्या बात है भइया कब से देखे जा रही हूँ आईने में बाल संवार रहे हो ?? किधर जा रहे हो ?
रचित- कुछ नहीं बस गंगा किनारे जा रहा हूँ काशी विश्वनाथ के पास वाले घाट पर ???

रचित ने कंघी हवा ने उछाली और आरती पर दे मारी और मुस्कुराते हुए निकल पड़ा….

पार्ट 4- गंगा की लहरें

रचित- मिलने को तो हम कहीं भी मिल सकते थे पर तुमने गंगा किनारे क्यों बुलाया
कविता- रचित जी गंगा भले की मैली क्यों न हो गई हो,पर जब भी पवित्रता की बात होगी तो गंगा का ही नाम आता है …
आओ मेरे साथ थोड़ी दूर चलते है इस भीड़ से,
कभी शाम में नाव पर बैठे हो ?
रचित चुप-चाप साँझ की लालिमा को देख रहा था और कभी कविता की आँखे …..

“चलो न ” कविता ने जैसे नींद से जगाया”
अ हाँ हाँ चलो-रचित ने जवाब दिया।
नाँव पर कविता और रचित धीरे धीरे घाट से दूर जा रहे थे,कविता रचित के करीब बैठ जाती है और कहती है

“रचित हम इतनी जल्दी क़रीब आ गए, मैं नहीं जानती कौन सी काशिस थी जो मुझे तुम्हारी ओर खिचती गयी कविता ने दबी दबी आवाज़ में कहा।

रचित कविता को अपनी बाँहो में भर लेता है।
ओह रचित ई लव यू…
कविता रचित की बाहों में सिमटती जाती उधर साँझ की लालिमा अब सिंदूरी हो चली थी।
रचित और कविता अब लगभग हर दूसरे तीसरे दिन मिलने लगे थे प्यार परवान चढ़ रहा था ।
रचित को प्यार ने पहले से जिम्मेदार हो गया था अपने व्यापार को नई उचाईयो पर ले जा रहा है और स्वरचित बाबू का पुराना रसुख भी लौटने लगा था बनारस की गलियो में।
शाख़ से वक़्त के लम्हे टूटते गए और एक और गंगा किनारे कविता और रचित को मिलते आरती ने देख लिया –
आरती- भाई और तुम कविता ये सब क्या है और कब से ऐसा चल रहा है ??
रचित- देखो आरती व वो
कविता- आरती वो मुशायरे वाली रात से ही हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते है-कविता बीच में ही बोल पड़ी।
आरती- हम्म्म्म्म सोचा मेरा भाई रिच है बेचारा सीधा साधा है तो चलो बनाते है बेवकूफ इसको(आरती ने कठोर लहज़े में कविता से कहा)
रचित- आरती तुम गलत समझ रही हो कविता तो मेरी ज़िन्दगी में प्रेरणा बन कर आई……
रचित कुछ बोल पाता इससे पहले आरती बोल पड़ी गुस्से से कविता की ओर देखा और कहा-
मुझसे ये रिश्ता छुपाया,दोस्ती के नाम पर जो गद्दारी की उसकी सज़ा मिलेगी और ……….
और इसकी सजा ये है की ये मेरी अब दोस्त नहीं रह सकती बल्कि अब मेरी भाभी बनेगी…..
ईईईईव्व्व्व्व कॉम ऑन बेबी गिव में अ हग ………..
कविता और रचित एक साथ हँस पड़े , हा हा हा हा
पगली एक पल को मेरी जान ही ले ली थी तूने, रचित ने कहा ।
कविता की आँखों में ख़ुशी के आँशु थे…
ओ माय बेबी रोते नहीं चलो भइया की तरफ से मैं पापा और तेरी भी फॅमिली से बात कर लुंगी ईईईए अब तो गले लग जाओ मेरी भाभी ।
नाउ पार्टी टाइम एंड भइया ई ऍम सो हैप्पी फॉर यू …….

पार्ट 5- ख्वाब और हक़ीक़त

जल्दी ही स्वरचित बाबू और कविता के माता पिता मिलकर शादी की डेट्स फाइनल कर देते है,
रचित – रचित सुनो तो …
कविता प्यार से रचित की तरफ देखकर बोलती है
“ऐसा लगता है जैसे हसीं ख्वाब हो तुम
तुम्हे पाने की जिसे हर कोई ख्वाइश रखे वो गगन का सितारा हो तुम
जिसे हर पल गुनगुना चाहती हूँ
कविता की वो कविता हो तुम….

शाहह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्
अचानक रचित कविता को अपनी बाहों में खीच लेता है
शोर न करो और मेरी धड़कनो को सुनो।
कविता की पलकें बंद दी और होठ थरथरा रहे थे……
रचित ऐसा लग रहा है जैसे मेरा हलक सुख रहा हो-कविता ने धीमी आवाज़ में कहा ।
रचित बाँहों में सिमटी कविता बेतहाशा चूम रहा था,
रचित काश ये लम्हा युही रुक जाए कविता ने रचित को ऐसे गले लगाया की जैसे वो उसे सदियो बाद मिला हो , तभी
दरवाज़े पर दस्तक हुई
भाआईईई ऑप्प्स्स्स सॉरी सॉरी
आप दोनों रोमांस चालू रखिये
मैं बाद में आती हूँ।
कविता-अरी सुन तो आरती हम बस बाते कर रहे थे तू कुछ बता रही थी….
हां वो बात ये थी की आप दोनों की शादी की डेट फिक्स हो गई है 17नवम्बर को तो…….
तो क्या ??? रचित ने झल्ला कर पूछा
तो कल मैं और कविता शादी की शौपिंग करेंगे और तुम जाओगे ऑफिस और 20 दिन कविता से नो मिलना जुलना …….आरती ने कहा

कविता आज बहुत खुश थी रात भर अपने आने वाले कल के बारे में सोचती रही और मुस्कुराती रही ।
अगले दिन दोपहर –
फ़ोन तो उठा लो मेरी जान
“हॅलो हॅलो कविता ?? कविता ??
र रचित प्लीज गंगा घाट के किनारे आओ आआह्ह्ह्ह मैं और और …..(फोन डिसकनेक्ट)
रचित बदहवास सा अपने कार की और भागता है और करीब 10 मिनिट बाद ही गंगा की घाट पर होता है पर आज भीड़ नदी के किनारे थी जो कुछ और ही कहानी कह रही थी…….
“भइया” अचानक खून से सनी आरती रचित से लिपट जाती है
भइया सब खत्म हो गया सब खत्म हो गया।
आरती की हालात देख कर रचित का कालेज कॉप गया…..
“आरती आरती होश में आओ क्या हुआ ?? त तुम इस हाल में और क कविता कहाँ है ??
भइया मैं और कविता शौपिंग कर रहे थे तभी कुछ गुंडे हमारे पीछे लग गए कविता ने सोचा गंगा किनारे भीड़ होगी तो हम बच जाएंगे भइया उन्होंने मुझे पकड़ लिया मेरे सर पर रॉड से मारा पर तभी कविता सामने से आ गई और मुझे बचा कर उनको मुझसे दूर ले गई फिर वो उस नाव में गंगा में भागी गुंडे उसके पीछे थे फिर कविता को पकड़ने की कोशिस में नाकामयाब होने पर उसकी नाँव डुबो दी और और सबके सामने
कविता ………….
आरती सिसक रही थी ।
सर हमे आपकी बहन का बयान लेना है हम यूपी पुलिस से है
रचित ने देखा एक सब इंस्पेक्टर 3 कांस्टेबल के साथ खड़ा था
रचित के जबड़े क्रोध के भीच गए थे “क्या कर लोग उनका ?
मेरी बहन ने बयां अगर दे भी दिया तो ?? किसी नेता की पैदाइश ये गुंडे इसका क्या कर लोगे तुम ?? सारे आम बनारस के गंगा के घाट पर जब ये सब हुआ था तब भी तुम थे ?? क्या कर लिया तुमने ? मेरी बहन का बलात्कार होने का इंतज़ार कर रहे थे ?? ये इतने सारे नपुंसक लोग क्या कर रहे थे ?? इंतज़ार कर रहे थे ?? की मेरी होने वाली बीवी मर जाए तो हम रिपोर्ट लिखवाये ?? और तब पोलिस अपना काम करेगी ??
क्या करोगे बयां लेकर ??
रचित “आरती पर अपना सूट डालता है और कार में बिठाता है
और घर की तरफ निकल पड़ता है…..
वहां खड़े तमाम लोग आपस में बातें कर रहे थे…..
अजी भाई सरेआम गुंडागर्दी है अब तो
बहुत गलत हुआ लड़कियो के साथ….
फिर किसी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा-अरे रामखेलवन जी तब पोलिसे तमाशा देखिगी तो आम जनता बहु बेटियो का क्या होगा।

पार्ट 6- साँझ की लालिमा

तुम मर नहीं सकती कविता तुम डूब नहीं सकती पुलिस को तुम्हारी लाश नहीं मिली है
तुम तो खुद को गंगा की बेटी कहती हो फिर माँ गंगा गंगा फिर तुम्हारे साथ ऐसा कैसे कर सकती है ?? रचित के मन में हज़ार तरह के विचार आ रहे थे।
रचित ने फैसला किया वो वहां जाएगा जहाँ कविता की नाँव डूबी थी रचित अपनी बहन आरती के पास जाता है…..
“आरती मेरी बहन मैंने अपने मोबाइल नेटवर्क से GPS को तुम्हारे नेटवर्क से कनेक्ट किया है तुम इंस्पेक्टर के पास जाओ और देखो क्या मदद मिल सकती है,मुझे यकीन है की कविता ज़िंदा है मैं उसे ढूढ़ने जा रहा हूँ…रचित की आवाज़ में विश्वास था ।
आरती -ठीक है भइया मैं अभी निकलती हूँ….
थोड़ी देर में रचित गंगा में अपनी नाव को उस जगह ले जाता था जहाँ कविता की नाँव डूबी थी और खुद पानी में उतर जाता है फिर खुद को लहरों के सहारे छोड़ देता है कुछ ही घंटो की मशक्कत के बाद खुद को एक किनारे पर पाता है …..
अरे बुधिया देख तो तनिक आज फिर कोई किनारे आया है लगता है ये भी डूब रहा था -रचित ने देखा दूर से कोई आ रहा था ये कहते हुए उसने जान बुझ कर आँखे बंद रखी ।
अरे बुधिया देखे तो ज़िंदा है भी की नाही ??
बुधिया- एकर सोने के चेन देख कर तो लगता है कोई बड़का बाबू है ई ?? का कहते हो रामभरोसे ??
“हां कल रात को एक परी जइसन लड़की भी बेचारी आई थी पर बेचारी को मंत्री
हरिलाल यादव के गुंडे उठा कर ले गए का जाने ऊ पापी का करेगा ऊके साथ …..
रचित ने जानबूझ कर होश में आने का धीरे धीरे नाटक किया
अरे बुधिया देख एको होश आ रहा है …
उधर आरती इन्सपेक्टर से मिलती है और सारी बाते बताती है …
बोलिये इंसपेक्टर त्रिपाठी अब क्या करेंगे और कैसे मदद करेंगे हमारी ? आरती की आँखे भर आई थी …
इस्पेक्टर त्रिपाठी- जो आप पर दो दिन से गुज़र रही है समझ सकता हूँ और मैं वादा करता हूँ अपनी जान देकर भी आपके भाई और भाभी को वापस लाऊंगा ….
आपकी टीम के साथ मैं भी चलूंगी शायद मदद कर सकु ??
आरती ने जिद की
त्रिपाठी-ठीक है आरती जी ….
पर मैं कोई टीम लेकर नहीं जाऊँगा क्योंकि अगर कुछ कार्यवाही की जरुरत पड़ी तो मैं ऊपर से कोई दबाव नहीं चाहता
हम पहले रचित के पास पहुचेगे
और त्रिपाठी फिर आरती के साथ रचित की तलाश में निकल पड़ा ……
उधर रचित को बुधिया और रामभरोसे अच्छे इंसान लगे उसने अपनी और कविता की पूरी कहानी समझाई…
रामभरोसे-रचित बाबू हम आपको नेता जी के फार्म हॉउस कहाँ है बता सकते है पर लड़ने की ताक़त हम गरीब गाँव वालों में नहीं है गाँव की बहु बेटियो को अगवा करना उसका बलात्कार करना ये तो रोज़ का तमाशा है इस राक्षस का हमारी खुद की बेटी लक्ष्मी का इज़्ज़त ई लोग नाश दिया और हमारी पत्नी को ज़िंदा जला दिए ,
रचित के चेहरा गुस्से के लाल हुआ जा रहा था
“तुम गाँव वाले इतने बुजदिल कैसे हो सकते हो ” खैर क्या मुझे तुम कुछ हथियार दे सकते हो ?
बुधिया-रचित बाबू मेरे पास तीर और धनुष और हम आपका साथ देंगे ….
तीर धनुष ?? अरे उनकी बंदूको के आगे तीर धनुष से क्या होगा ? रचित ने पूछा ?
बाबूजी हम गांव वालो तीर धनुष भी पक्षीयो के शिकार के लिए ही रखते है ये तीर ज़हरीले है बिना आवाज़ किये ये किसी की जान के सकते है ….बुधिया ने कहा
ए रामखेलावन तुम गाँव वालो को जाकर बुलाओ और बताओ की शहरी बाबू जी भी हमारी मदद को तैयार है और हम जब तक इनके साथ और मंत्री के घर पर जाते है देखो साँझ का पहर होने को है रात से पहले हमको आज लड़ाई लड़नी ही होगी …

हरिलाल यादव का फॉर्म हाउस किसी किले से कम न था बुधिया ने सटीक निशाना लागते हुए अपने तीरो से पहले गेट पर के दोनों प्रहरी को बेहोश कर दिया।
फिर रचित और बुढ़िया मंत्री के घर के अंदर थे …
बुधिया अंदर से काफी शोर आ रहा है गाने बजाने का
ये अच्छा है की मंत्री अपने गुंडों के साथ अंदर ही है …
उधर इंसपेक्टर त्रिपाठी को भी पता चल जाता है जीपीएस से की रचित मंत्री हरिलाल यादव के घर पर है …आरती हमे जल्दी करना होगा रचित लोकेट हो गया है -त्रिपाठी ने कहा।
उधर रचित ने खिड़की से देखा तो दंग रह गया कई लडकिया खड़ी ही तो विदेशी लोग उन्हें खरीदने आये आखिर उसकी नज़र कविता पर पड़ी जो डरी सहमी चुप चाप खड़ी थी उसकी हिरणी जैसी आँखों में आँशु थे और मदद की आस थी ….
रचित -बुधिया जब मैं उस पुलिस वाले से पूछने जाऊं तब तुम इसको अपनी तीर से बेहोश करना इसकी बन्दूक हमें लेनी होगी,बुधिया ने इशारे में ही हां कर दिया …
रचित जैसे ही पुलिस का पास जा कर बात करने जाता है एक तीर पुलिस को उसके गर्दन पर जा लगती है .. रचित उसका हैंडगन और गोलिया अपने पास रख लेता है और दरवाज़े पर गोली मार कर सीधा अंदर जाता है…
“बस बस मंत्री जी हो गया खत्म आपका ये घिनोना खेल अगर इधर उधर हरकत की तो सीधा गोली मारूँगा बुधिया इनके गुंडों की बंदूके ले ले और गांव बहार फेक और गाँव वालो को बुला जल्दी ….
कविता रचित को देख कर उससे लिपट जाती है …
“मुझे पता था रचित तुम मुझे ढूंढते हुए जरूर आओगे …
कविता की इस अनजानी गलती से हरिलाल यादव के गुंडों को मौका मिल जाता है और रचित के हाथ से बन्दुक गिर जाता है …
हरिलाल यादव – का रे साला तू हमरी 20साल की राजनीति खत्म करेगा ई सब लड़की को छुड़ाएगा अपनी प्रेमिका को बचा कर ले जाएगा गोलों मार दो ससुरे को …
कविता और रचित सामने आने वाली मौत को देख सकते थे अब और गोली भी चली पर सुराख़ उस गुंडे के सर पर था ये गोली इस्पेक्टर त्रिपाठी ने चलाई थी|
त्रिपाठी-मंत्री जी के घर पर खुद सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस बन्दुक लिए जब लड़कियो की दलाली कर रहा हो तो उसके सर में गोली मार ही देनी चाहिए और मंत्री जी अब अगर हिले तो अलगी गोली आपके सर के अंदर होगी,रचित तुम लड़कियो को लेकर बहार जाओ , आरती तुम भी अब अपने भैया भाभी के साथ बहार जाओ फिर त्रिपाठी ने एक एक बाद एक कई गोलिया चलाई तो मंत्री के चेले कुछ देर में धूल चाट रहे थे …
गाँव वाले भी अंदर आ चुके थे मंत्री हरिलाल का खेल खत्म हो चूका था …
हम हम सरेंडर को तैयार है इंस्पेक्टर हम ई गाँव वालो से बचा लो …
रचित- इस्पेक्टर तुम कानून के अंदर रह कर ही काम करो और इसको सज़ा भारत का संविधान देगा ….
त्रिपाठी ने हल्की सी मुस्कान के साथ रचित की ओर देखा और सिगरेट सुलगा लिया …
“आरती जी आपको क्या लगता है मुझ जैसे ईमानदार और देशभक्त इंसान को क्या करना चाहिए ?? त्रिपाठी ने बोलना जारी रखा एस पी साहेब जिसकी खुद रखवाली कर रहे थे ?? ई साला फिर छुट जाएगा पर गाँव वाले अगर इसको मार देंगे तो अज्ञात भीड़ पर केस बनेगा ?? आप लोग चलिए कानून का आज सही इस्तमाल मैं करता हूँ..
और त्रिपाठी कविता रचित आरती बहार आ गए गाँव वालों के मारो मारो के शोर में मंत्री की चीख धीरे धीरे हलकी होती गई|

कविता- रचित देखो न साँझ की लालिमा ढल चुकी है और अब कल से एक नया सवेरा होगा
रचित ने कविता को बाहों में भर लिया और दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूम रहे थे, इस्पेक्टर त्रिपाठी और आरती इस मिलन को देख रहे थे और फिर झुकी झुकी नज़रो से एक दूसरे को देख रहे थे जो आरती और त्रिपाठी के नए रिश्ते की कहानी की शुरुआत थी ।
                       समाप्त
अभिषेक तिवारी

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