आनन्दवर्धन 9वीं शती ई. के उत्तरार्ध में कश्मीर निवासी संस्कृत के काव्यशास्त्री तथा ‘ध्वनि सम्प्रदाय’ के प्रवर्तक आचार्य थे। इनकी कृति ‘ध्वन्यालोक’ बहुत प्रसिद्ध है। ‘ध्वनि सम्प्रदाय’ का सम्बन्ध मुख्यत: शब्द शक्ति और अर्थविज्ञान से है। शब्द शक्ति भाषा दर्शन का विषय है और अर्थविज्ञान भाषा दर्शन का विषय होते हुए काव्य शास्त्र और सामान्यत: सौंदर्यशास्त्र के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। आनन्दवर्धन ने अर्थ का विवेचन प्रधानत: काव्य के सन्दर्भ में किया है। अनके अनुसार काव्य ध्वनि है। ध्वनि उस विशिष्ट काव्य की संज्ञा है, जिसमें शब्द और वाच्य अर्थ की अपेक्षा प्रतीयमान अर्थ का चमत्कार अधिक होता है। आनन्दवर्धन का महत्त्व प्रधानत: एक भाषा-दार्शनिक व एक सौंदर्य शास्त्री के रूप में है।

समय एवं कृतित्व

आनन्दवर्धन का समय नवीं शती ईसवी है। ये कश्मीर के महाराज अवन्तिवर्मा के आश्रित कवि थे। ये मुक्तागण, शिवस्वामी तथा रत्नाकर के समकालीन थे। अवन्तिवर्मा का समय 855 से 883 ई. तक माना जाता है। इनके पिता का नाम ‘नोण’ अथवा ‘नोणोपाध्याय’ था, जैसा कि उनके ग्रन्थ ‘ध्वन्यालोक’ में उल्लिखित है। अपने ग्रन्थ ‘देवीशतक’ में आनन्दवर्धन ने अपने को ‘नोणसुत’ कहा है। ध्वन्यालोक और देवीशतक के अतिरिक्त आनन्दवर्धन के और भी ग्रन्थ हैं, जैसे- अर्जुन चरित, सविक्रमबाण लीला, विनिश्चय टीका विवृति और तत्वालोक। इसमें विनिश्चया टीका विवृति और तत्वालोक दार्शनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु ये अब उपलब्ध नहीं हैं। इनके उपलब्ध ग्रन्थों में ‘ध्वन्यालोक’ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

आलोचक मतभेद

‘ध्वन्यालोक’ के चार उद्योत हैं। इस ग्रन्थ के दो भाग हैं, कारिका और वृत्ति। आलोचकों में इस बात को लेकर मतभेद है कि ये दोनों आनन्दवर्धन की कृतियाँ हैं अथवा दो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की। परन्तु टीकाकार अभिनवगुप्त के अनुसार दोनों ही उनकी कृतियाँ हैं। इस ग्रन्थ में आनन्दवर्धन ने ध्वनि के विरुद्ध सम्भाव्य आपत्तियों का निराकरण करके ध्वनि की स्थापना तथा व्यंजना शक्ति का विवेचन किया है एवं अमिधा से उसकी श्रेष्ठता प्रतिपादित की है। इसके पश्चात् ध्वनि के भेद, उसकी व्यापकता, अर्थात् प्रकृति प्रत्यय से लेकर महाकाव्यों तक में उसकी व्यापकता का विवेचन किया है। इसमें गुण, रीति एवं अलंकारों के साथ ध्वनि का उचित सम्बन्ध निरूपित किया है। रस का विरोधाविरोध दर्शाकर इस पर अत्यन्त बल दिया गया है। शान्त रस को परमानन्द माना गया है। अन्त में कवि की प्रतिभा शक्ति का महत्त्व बतलाया गया है।

व्यंजना शक्ति और नव्य-अर्थविज्ञान

‘ध्वनि सिद्धांत’ का सम्बन्ध मुख्यत: शब्द शक्ति और अर्थविज्ञान से है। शब्द शक्ति, भाषा दर्शन का विषय है और अर्थविज्ञान भाषा दर्शन का विषय होते हुए काव्य शास्त्र और सामान्यत: सौंदर्यशास्त्र के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक शब्द में एक व्यंजना शक्ति होती है, जो उसकी अभिधा शक्ति और लक्षणा शक्ति से भिन्न है। व्यंजना शक्ति से ही प्रत्येक शब्द का भावात्मक या व्यंग्य अर्थ ज्ञात होता है। उदाहरणार्थ ‘सुवस्ति हो गया’ को लीजिए-इस वाक्य का व्यंजना शक्ति से किसी के लिए यह अर्थ हो सकता है कि अब उसकी अपनी प्रियतमा से मिलने का अवसर आ रहा है। अमिधा और लक्षणा से ऐसा अर्थ नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि इस अर्थ का सम्बन्ध न तो प्रस्तुत वाक्य के के अमिधेय या वाच्य अर्थ से है और न उससे सम्बन्धित किसी लाक्षणिक अर्थ से। यहाँ जो अर्थ है, यह शुद्ध भावात्मक है। व्यंजना भावात्मक अर्थ को प्रकट करती है।

ध्वनि शक्ति की प्रतिष्ठापना

ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने व्यंजना अथवा ध्वनि को एक स्वतंत्र शब्दशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया है। यह शक्ति अमिधा और लक्षणा दोनों से भिन्न है। ध्वनि लक्षणा से स्वरूपत: भिन्न है, क्योंकि ध्वनि व्यतिरिक्त विषय में भी लक्षण सम्भव है तथा ध्वनि लक्षणा ये अधिक व्यापक भी है। अत: व्यंजना और लक्षणा को अभिन्न मानने में अतिव्याप्ति और अव्याप्ति दोनों ही दोष हैं। ध्वनि लक्षणा का भी आश्रय लेकर हो सकती है और अमिधा का भी। अत: व्यंजना या ध्वनि का लक्षणा से अभेद नहीं किया जा सकता है। यह अनुमान और अर्थापत्ति से भी भिन्न है, क्योंकि अनुमान का आधार व्याप्ति सम्बन्ध है और अर्थापत्ति का आधार तार्किक आपादन या अन्यथा अनुपपन्नता है, जो व्यंजना के आधार नहीं हैं। शब्द को तो अधिकांश भारतीय दार्शनिकों ने एक स्वतंत्र प्रमाण माना है, परन्तु जब व्यंजना की बात आती है तो तब वे लोग उसे शब्द शक्ति नहीं मानते। वे उसका अंतर्भाव अनुमान अथवा अर्थापत्ति में कर लेते हैं। परन्तु ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने इसका खंडन किया है। अनुमान और अर्थापत्ति दोनों से ही व्यंग्य अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता। व्यंजना शब्द भिन्न ज्ञान का कोई साधन या प्रमाण नहीं है। इसलिए अनुमान और अर्थापत्ति से वह भिन्न है, जो कि ज्ञान के प्रमाण हैं। व्यंजना का सम्बन्ध शब्द से है, किन्तु व्यंजना से प्राप्त अर्थ को तर्कत: या वस्तुत: सत्य होने की आवश्यकता नहीं है। यह असत्य होते हुए भी भावगत है। यह सहृदय अनुभवकर्ता की भावमूलक अनुभूति है। आनन्दवर्धन ने व्यंग्य अर्थ का बोध लावण्य बोध के आधार पर उपमान प्रमाण के द्वारा कराया है। यह व्यंग्य अर्थ प्रतीयमान और तात्पर्य रूप है। इसका कारण है व्यंजना। यह व्यंजना शब्द और अर्थ का एक स्वतंत्र व्यापार है। इससे युक्त बोलचाल की भाषा को व्याकरण शास्त्र में ध्वनि की संज्ञा दी गई है।

ध्वनि सिद्धांत तथा स्फोटवाद

ध्वनि सिद्धांत को व्याकरण दर्शन से प्रेरणा प्राप्त हुई है। व्याकरण दर्शन का स्फोटवाद ही ध्वनि सिद्धांत का मूल प्रेरक है। ध्वनि सिद्धांत से सम्बन्धित स्फोटवाद को समझने के लिए पतंजलि के ‘महाभाष्य’ तथा भर्तुहरि के ‘वाक्यपदीय’ के तत्सम्बन्धी मतों को जानना अपेक्षित है। अथ का प्रत्यायक ‘स्फोट’ है। यह अक्रम, निरंश, निरवयव, अविभाग, बोध-स्वभाव, शब्द-तत्व, है, जो सर्वदा बुद्धि में जन्मजात है। स्फोट की व्यंजना करने वाले उच्चारित नाद को ध्वनि कहते हैं। अत: स्फोट व्यंग्य है और ध्वनि उसकी व्यंजक। स्फोट को अनित्य कार्यक्रम मानने वाले उत्पत्तिवादियों के अनुसार संयोग अथवा विभाग से प्रथम उत्पन्न शब्द का नाम ही स्फोट है, और जो सुनाई पड़ने वाला शब्द है, वह शब्दजन्य शब्द ही ध्वनि है। आनन्दवर्धन के ध्वनिवादी व्याख्याकार अभिनवगुप्त के अनुसार ध्वनि के ये पांच अर्थ हैं- व्यंजक शब्द, व्यंजक अर्थ, क्योंकि वे दोनों उस प्रतीयमान अर्थ का व्यंजन करते हैं, व्यंग्य अर्थ, ध्वनन-व्यापार (व्यंजना व्यापार) तथा इन चारों (व्यंजक शब्द, व्यंजक अर्थ, व्यंग्य अर्थ और व्यंजना व्यापार) से युक्त वाक्य। अभिनवगुप्त के अनुसार ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने उक्त पांचों ही अर्थों में ध्वनि शब्द का प्रयोग किया है।

सारा ध्वनि सिद्धांत व्यंग्यार्थ और व्यंजना-वृत्ति पर आधारित सिद्धांत है। व्यंजना व्यापार ध्वनि सिद्धांत का प्राणतत्व है। इसी की प्रतिष्ठा करना ध्वनिवादियों का प्रधान लक्ष्य रहा है। व्यंजना व्यापार की प्रतिष्ठा करना व्यंग्याथ की ही प्रतिष्ठा करना है, क्योंकि व्यंग्यार्थ और व्यंजना व्यापार परस्पर सापेक्ष हैं।

अर्थ का विवेचन

आनन्दवर्धन ने अर्थ का विवेचन प्रधानत: काव्य के सन्दर्भ में किया है। अनके अनुसार काव्य ध्वनि है। ध्वनि उस विशिष्ट काव्य की संज्ञा है, जिसमें शब्द और वाच्य अर्थ की अपेक्षा प्रतीयमान अर्थ का चमत्कार अधिक हो।[1] अर्थ दो प्रकार का होता है, वाच्य और प्रतीयमान। वाक्य अर्थ है उपमादि रूप। प्रतीयमान अर्थ ललना के अलंकृत अंगों में, लावण्य की भांति, काव्य के अंगों में ही रहता है, परन्तु सर्वथा भिन्न होता है। प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति व्यापार से होती है। इसका विवेचन ऊपर किया जा चुका है। यह तात्पर्य रूप है, परन्तु इसका ज्ञान अनुमान एवं अर्थापत्ति दोनों में ही नहीं होता है।

वाच्य और प्रतीयमान अर्थ का सम्बन्ध आधार आधेय और ज्ञापक-ज्ञाप्य का है। वाच्यार्थ पदार्थ विषयक होता है और प्रतीयमान अर्थ भाव विषयक। वाच्य नश्वर और अनित्य है तथा प्रतीयमान शाश्वत और नित्य स्फोट है। यदि वाच्य परिअभिधेयार्थ है तो प्रतियमान अभिधा या लक्षणा पर आधारित व्यंग्यार्थ है। वाच्य यदि वाक्य प्रयोग है, तो प्रतीयमान उसका अभिप्राय। वाच्य यदि अवयव है तो प्रतीयमान उसका अवयवी। ध्वनिकार आनन्दवर्धन केवल उच्च कोटि के लक्षणकार ही नहीं थे, अपितु वे एक सहृदय एवं प्रतिभावान कवि भी थे। उनको कविता ‘कामिनी’ का बाह्यालंकरण पसन्द नहीं था। अत: उन्होंने काव्य के अन्तस्तत्व में प्रवेश करके उसके मर्म को पहचानने तथा उसके रहस्यमय मूल को खोजने का सक्षम प्रयास किया। उन्होंने काव्य के रमणीय तत्व की तुलना नारी के अंगों में रहने वाले परन्तु सर्वथा भिन्न लावण्य नामक तत्व से की है। इसी तत्व का नाम है काव्य का प्रतीयमान अर्थ, अर्थात् ध्वनि।

जिस प्रकार अतिशय अलंकृत नारी लावण्य के अभाव में हृदयावर्जक नहीं हो सकती, उसी प्रकार ध्वनि तत्व के अभाव में अलंकृत काव्य भी हृदयावर्जक नहीं हो सकता। इसलिए अपने काव्य के प्रारम्भ में ही उन्होंने ‘काव्यस्यात्मा ध्वनि’ कहा। ध्वनि ही उनके अनुसार काव्य का आत्मभूत तत्व है। यह एक नितांत क्रान्तिकारी मान्यता थी। इसका काव्य में वही स्थान है, जो स्थान स्त्रियों में लज्जा का है। काव्य में इस अतिरमणीय प्रतीयमान तत्व तक पहुँचने के लिए अलंकार प्रस्थान अत्यन्त असमर्थ है। काव्य शास्त्र में ध्वनि सिद्धांत ने अलंकार, गुण, रीति, रस और औचित्य आदि का खंडन करके श्रेष्ठ काव्य की कसौटी के रूप में व्यंजना से प्राप्त व्यंग्य अर्थ को ही महत्त्व दिया है। आधुनिक युग में इसका और साधारणीकरण किया गया और यह माना गया कि समस्त सौंदर्य शास्त्रीय अर्थ, न कि केवल काव्य, व्यंग्य है और उसके मूल में व्यंजना शक्ति है। दार्शनिक दृष्टि से इसका अर्थ हुआ कि सौंदर्यपरक अर्थ की व्याख्या आकारवाद, व्यवहारवाद और यथार्थवाद के द्वारा नहीं की जा सकती है। उसकी व्याख्या के आधार सौंदर्य बोध की परम्परा तथा उसको ग्रहण करने की प्रतिभा है।

ध्वनि-सिद्धांत का विकास

अलंकारवाद की मर्यादा का अतिक्रमण करने वाला ध्वनि सिद्धांत रुढ़िवादी अलंकारवादियों को नितान्त अप्रिय लगा। उन लोगों ने इसका प्रबल विरोध किया। आनन्दवर्धन की पूर्व परिस्थितियों पर ध्यान देने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यद्यपि भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में रस निष्पत्ति का विवेचन किया था तथापि काव्यशास्त्र का मूल चिन्तन अलंकार सूक्तियों पर केन्द्रित था। रुद्रट ने सर्वप्रथम काव्य के क्षेत्र में रस को लाकर अलंकार और रस की प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न की। ध्वनि सिद्धांत ने इस प्रतिद्वन्द्विता में अलंकार को आघात पहुँचाकर मर्माहित किया तथा रस को प्रबल समर्थन प्रदान किया। परन्तु स्वयं आनन्दवर्धन का ध्येय यह नहीं था। वे काव्य की आत्मा ध्वनि को (न केवल रस ध्वनि को) सर्वोपरी प्रतिष्ठित कर गुण, अलंकार, रीति, वृत्ति आदि सभी को उसी के अंतर्गत रखना चाहते थे। परन्तु परवर्ती विचारकों के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक साक्ष्य इसके विपरीत रहा। काव्य के क्षेत्र में अलंकार एवं रस दोनों प्रगतिशील चर्चा के विषय बने रहे।

यद्यपि आनन्दवर्धन ने ध्वनि की प्रतिष्ठा का सैद्धान्तिक विवेचन अवश्य प्रस्तुत किया तथापि उनके पश्चात् किसी अन्य आचार्य ने ध्वनि सिद्धांत को नवीन परिप्रेक्ष में विवेचित नहीं किया। इसके फलस्वरूप ध्वनि पर आधारित रस सिद्धान्त, चिन्तन के नवीनतम आयामों को प्राप्त करता रहा, परन्तु ध्वनि सिद्धांत जैसा था, प्राय: वैसा ही दुहराया जाता रहा। यद्यपि विरोधियों ने ध्वनि सिद्धांत के खंडन का अवश्य प्रयास किया, तथापि समर्थकों ने उसको उतना ही सर्वांगपूर्ण और पर्याप्त माना। उसमें तनिक भी हेर-फेर करने की आवश्यकता नहीं अनुभव की। परन्तु जब इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि आनन्दवर्धन के पश्चात् उनके ध्वनि सिद्धांत पर और प्रगांढ़ चिन्तन प्रस्तुत करने का किसी ने भी प्रयास नहीं किया तो ध्यान अनिवार्यत: ध्वनि सिद्धांत के उन्मीलन की मूल भूमिकाओं पर जाता है। इसके अतिरिक्त वे आलोचक भी हमारी दृष्टि में आते हैं, जिन्होंने आनन्दवर्धन के पश्चात् ध्वनि सिद्धांत को नि:सरिता प्रमाणित करने के लिए ग्रन्थों का प्रणयन किया। वास्तव में ध्वनि सिद्धांत के विकास का यही पक्ष है। भट्टनायक का ‘भुक्तिवाद’, कुन्तक का वक्रोक्ति-सिद्धांत, महिमभट्ट का अनुमितिवाद तथा अन्य ध्वनि विरोधी सिद्धांत प्रकारान्तर से ध्वनि सिद्धांत की प्रतिष्ठा और उसके विकास के सूचक हैं। अभिनवगुप्त की ‘लोचन’ टीका तो मात्र उसकी यथावत् व्याख्या है। इसके पश्चात् ध्वनि सिद्धांत का स्थायी सम्बन्ध रस सिद्धांत से हो गया और साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ ने ‘रसात्मक काव्यम्’ का सूत्र दे दिया।

आलोचना

ध्वनि सिद्धांत की आलोचनाओं को दो कोटियों के अंतर्गत रखा जा सकता है। एक कोटि के अंतर्गत सम्भावित आलोचनाएं आयेंगी, जिन्हें कि ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने ध्वनि स्वरूप के विवेचन के संदर्भ में पूर्वपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरी कोटि के अंतर्गत वास्तविक ध्वनि विरोधियों द्वारा प्रस्तुत आलोचनाएं होती हैं। ध्वनि विरोधियों में मुकुलभट्ट, प्रतिहारेन्दुराज, भट्टनायक, कुन्तक तथा महिमभट्ट विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ध्वनि सिद्धांत के सम्भावित पूर्वपक्षियों में प्रमुख हैं, अभाववादी, लक्षणावादी, मीमांसक एवं नैयायिक। इस प्रकार आनन्दवर्धन ने ध्वनि सिद्धांत की प्रतिष्ठा करके एक ओर तो काव्यशास्त्रीय चिन्तन का मार्ग परिवर्तित कर दिया और दूसरी ओर काव्य रचना में रस की प्रतिष्ठा की अपल नींव डाल दी।

आनन्दवर्धन की मीमांसा

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आनन्दवर्धन के तत्वमीमांसा विषयक मुख्य ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं। उनमें से एक विनिश्चय टीका विवृत्ति था, जिसका उल्लेख स्वयं आनन्दवर्धन ने अपने ध्वन्यालोक के तृतीय उद्योत के अन्त में अपनी वृत्ति के अंतर्गत इस प्रकार किया है-

‘मत्वनिर्देश्यत्वम् सर्वलक्षणविषय बौद्धानां प्रसिद्धम् विवृत्ति तत्तन्यत् परीक्षायं ग्रन्थान्तरे निश्पयिष्याम:।’

इस सम्बन्ध में ‘ग्रन्थाकार’ की व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त ने लोचन में जो लिखा उसके अनुसार विनिश्चय टीका विवत्ति धर्मकीर्ति के ग्रन्थ प्रमाणविनिश्चय के ऊपर लिखी गई धर्मोत्तर की टीका की विवृत्ति है। यह धमकीर्ति के प्रमाणविनिश्चय की टीका नहीं है, जैसा कि कुछ लोग अज्ञानत: मानते हैं। आनन्दवर्धन ने इस ग्रन्थ में बौद्धों के इस मत का खंडन किया था कि सभी लक्षण अनिर्देश्य हैं। ध्वन्यालोक में उन्होंने सिद्ध किया कि जैसे बौद्ध सभी विषय को अनिर्देश्य मानते हुए भी प्रत्यय आदि का लक्षण करते हैं, वैसे ही उन्होंने भी ध्वनि का लक्षण सफलतापूर्वक किया है, ‘बौद्धमतेन वा यथा प्रत्यक्षादिलक्षणं तथा अस्माकं ध्वनिलक्षणं भविष्यति’।[2]

शैवमत का विवेचन

तत्वालोक ग्रन्थ में अनुमानत: कश्मीर के शैवमत के तत्वों का संक्षिप्त किन्तु तर्कपूर्ण विवेचन था, जिसका विस्तृत वर्णन आनन्दवर्धन के यशस्वी टीकाकार अभिनवगुप्त ने अपने तंत्रसार में किया है। कुछ भी हो ध्वन्यालोक जैसा मौलिक ग्रन्थ आनन्दवर्धन का और कोई भी ग्रन्थ नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि आनन्दवर्धन से बौद्ध दर्शन से आरम्भ करके कश्मीरी शैव दर्शन तक प्रति की और उसके पश्चात शाक्तमत को स्वीकार कर लिया, जो ‘देवीशतक’ की रचना से निगमित होता है। आनन्द और ध्वनि सिद्धांतों की उद्भावना की प्रेरणा उनकी इन्हीं शैव-शाक्त दर्शनों से प्राप्त हुई। अपने मत को तर्कपूर्ण और संक्षिप्त शैली में अभिव्यक्त करने की प्रेरणा उन्हें धमकीर्ति से प्राप्त हुई थी। जैसेअरस्तु ने प्लेटो के दर्शन से आरम्भ करके अन्त में एक उत्तम काव्य शास्त्र की रचना की, जो प्लेटो के सिद्धांतों से श्रेष्ठतर है, वैसे ही आनन्दवर्धन ने भी बौद्ध और शैव दर्शनों से गुजरते हुए अन्त में एक ऐसे काव्य शास्त्र की रचना की जो उन दर्शनों की स्थिति से परे है।

आनन्दवर्धन ने ज्ञान का सम्बन्ध सौंदर्यमूल्य से जोड़ा। सामान्यत: अन्य भारतीय दार्शनिकों ने ज्ञान का सम्बन्ध धर्म अथवा नैतिकता या आध्यात्मिकता और भक्ति से जोड़ा है, परन्तु आनन्दवर्धन ने ज्ञान का समन्वय यूनानी दार्शनिक प्लेटो और अरस्तु की भांति इन सबकी अपेक्षा सौंदर्शबोध से किया। जहाँ अन्य लोगों ने ‘सत्यशिव’ पर अधिक बल दिया, वहीं इन्होंने ‘सत्यं सुन्दरम्’ पर अधिक बल दिया और उसकी लौकिक मर्यादा को बनाये रखा। उसमें ऐश्वर्य बोध को उतना महत्त्व नहीं दिया। आनन्दवर्धन का दार्शनिक महत्त्व विद्वानों ने तब समझा, जब क्रोचे और बोएक्वेटे जैसे नये हेगेलवादियों के सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यों के आधार पर टैगौर और श्री अरविंद आदि ने ‘सत्यं शिवम् सुन्दरम्’ को सर्वोच्च मूल्य माना। इसके पूर्व भारतीय विचारक सुन्दर का स्थान ‘सत्यं और शिव’ से अवर मानते थे। आनन्दवर्धन ने ‘सुन्दर’ को किसी भी मूल्यों से हीनतर नहीं माना। ‘सुन्दर’ की प्रतिष्ठा के साथ आनन्दवर्धन की भी दार्शनिक जगत् में प्रतिष्ठा बढ़ी, क्योंकि वही प्रथम दार्शनिक हैं, जिन्होंने ‘सुन्दर’ को सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया था।

 

 

Source: bharatdiscovery.org

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