राम्य जामाता मुनि (1370-1443) को ‘मतवाल मुनि’ भी कहा जाता है। श्रीरंगम की (श्रीवैष्णव) शाखा के अध्यक्ष वेदांतदेशिक के विरोध में इस सम्प्रदाय के अंतर्गत दो और शाखाएँ प्रारम्भ हुई, जो क्रमश: ‘उत्तरी’ तथा ‘दक्षिणी’ शाखाएँ कहलाती हैं।

  • उपर्युक्त शाखाओं में से दक्षिणी शाखा या तेलंग के नेता राम्य जामाता मुनि थे।
  • राम्य जामाता मुनि के भाष्य तथा विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ पर्याप्त प्रयोग में आते हैं।
  • इस उत्तरी तथा दक्षिणी शाखाओं के नेताओं के समय से श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की शाखाओं का बढ़ता गया।
  • राम्य जामाता मुनि के रचे हुए ग्रंथ हैं- ‘तत्त्वनिरूपण’ तथा ‘उपदेशरत्नमाला’।

 

 

Source: bharatdiscovery.org

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