स्वामी विद्यानंद जी महाराज (जन्म- 26 दिसम्बर, 1935, वृन्दावन (उत्तर प्रदेश) प्रसिद्ध संत-महात्माओं में से एक हैं। इन पर स्वामी श्री केशवानन्द जी महाराज की विशेष कृपा थी। ये स्वभाव से अत्यन्त सरल और कर्मशील माने जाते हैं।

परिचय

विद्यानंद जी महाराज का जन्म 24 दिसम्बर, 1935 में उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध धार्मिक नगरी मथुरा के वृन्दावन नगर में हुआ था। इनके पिता का नाम विश्म्भर दयाल तथा माता रामप्यारी देवी थीं। बाल्यकाल में शिक्षा दीक्षा से ओत-प्रोत होकर स्वामी नित्यानंद जी महाराज द्वारा इनका यज्ञोपवीत संस्कार कराया गया। इसके अनंतर उन्हें शिक्षा ग्रहण कराकर ‘मां’ का पूर्ण अधिकार सौंप दिया गया।

‘सन्त हृदय नवनीत समाना’ गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामायण’ में संतों का वर्णन करते समय उनके हृदय एवं उनके स्वभाव का वर्णन किया है कि संतों का हृदय मक्खन के समान कोमल होता है। योगीराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी जी के सुयोग्य शिष्य श्री केशवानंद ब्रह्मचारी जी ने स्वामी रामतीर्थ जी महाराज से गेरूआ वस्त्र तथा ब्रह्मचर्य दीक्षा ग्रहण कर कठोर साधना को प्राप्त किया। लाहिड़ी जी द्वारा योग क्रिया का अभ्यास कर हिमालय में समाधि द्वारा साधना की प्राप्ति तथा विभिन्न क्रियायोगों का अभ्यास किया। हिमालय में उन्होंने अनेक साधु-संतों के दर्शन किये। वहां पर उन्हें ‘कात्यायनी मां’ ने आदेश दिया। वृन्दावन में आकर आपनी योगशक्ति द्वारा उस अज्ञात स्थान को प्राप्त किया, जहां आजकात्यायनी देवी विराजमान हैं।

स्वामी केशवानन्द जी महाराज ने सत्यानंद जी को अपना शिष्य बनाया, परन्तु वह अधिक दिनों तक नहीं रह पाये और मां के चरणों में लीन हो गये। उस समय स्वामी नित्यानंद जी महाराज विद्यमान थे। उन्होंने भी स्वामी केशवानंद जी महाराज से दीक्षा ग्रहण की। स्वामी नित्यानंद जी महाराज मां की सेवा अनन्य भक्ति से किया करते थे। स्वामी श्री केशवाननद जी महाराज के परम भक्त श्री विश्म्भर दयाल जी और उनकी पत्नी श्रीमती रामप्यारी देवी जी, जो प्रतिदिन महाराज जी के दर्शन करने आया करते थे, ‘मां’ की भक्ति के साथ-साथ गुरु महाराज स्वामी श्री केशवानंद जी के भी कृपा पात्र हो गये। श्री विश्म्भर दयाल जी के छह पुत्र थे, इन छह पुत्रों पर महाराज का आशीर्वाद सदा विद्यमान रहा। परन्तु चतुर्थ पुत्र पर उनकी कृपा दृष्टि अत्यधिक रही और ‘विधुभूषण’ नामक यह बालक आज स्वामी विद्यानंद जी महाराज के नाम से जाने जाते हैं।

व्यक्तित्व

‘मां’ का दायित्व सन् 1954 अक्षय तृतीया को एवं सम्पूर्ण आश्रम का दायित्व जब इनको सौंप दिया गया, ये दत्तचित्त होकर मां की पूजा अर्चना करते रहे। ये स्वभाव से अत्यन्त सरल और कर्मशील माने जाते हैं। बालकों के साथ बालक हो जाना, यह उनका स्वभाव है। पण्डितों और विद्वानों का आदर करना एवं सम्माननीय लोगों का सम्मान करना इनका स्वभाव है। कैसा भी व्यक्ति क्यों ना आये, वह इनके स्वभाव से नतमस्तक होकर जाता है। आख़िर क्यों ना हो जिस पर गुरु कृपा एवं ‘मां’ की कृपा सदा विद्यमान है। आपके सरल स्वभाव को देखकर सभी लोग मन्त्रमुग्ध हो जाते हैं। आपके सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आता है, वह उनके वात्सल्यमय व्यवहार को पाकर गदगद हो जाता है। यही अलौकिक स्थान का महत्त्व, गुरु महाराज की कृपा तथा ‘मां’ की कृपा का फल है। श्री श्री कात्यायनी पीठ का नाम सम्पूर्ण देश विदेश में व्याप्त हो रहा है। जो व्यक्ति एक बार ‘मां’ के दर्शन कर महाराज जी से आशीर्वाद ग्रहण करता है उसकी सभी मनोकामनाएं निश्चित ही पूर्ण होती हैं।

 

 

 

Source: bharatdiscovery.org

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