यमराज या यम भारतीय पौराणिक कथाओं में मृत्यु के देवता को कहा गया है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से भगवान सूर्य केपुत्र यमराज, श्राद्धदेव मनु और पुत्री यमुना हुईं। यमराज परम भागवत, द्वादश भागवताचार्यों में हैं। यमराज जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। दक्षिण दिशा के इन लोकपाल की संयमनीपुरी समस्त प्राणियों के लिये, जो अशुभकर्मा है, बड़ी भयप्रद है। दीपावली से पूर्व दिन यमदीप देकर तथा दूसरे पर्वो पर यमराज की आराधना करके मनुष्य उनकी कृपा का सम्पादन करता है। ये निर्णेता हम से सदा शुभकर्म की आशा करते हैं। दण्ड के द्वारा जीव को शुद्ध करना ही इनके लोक का मुख्य कार्य है।

 

भगवन यमराज
भगवन यमराज

 

अन्य नाम

यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुभ्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त- इन चतुर्दश नामों से इन महिषवाहन दण्डधर की आराधना होती है। इन्हीं नामों से इनका तर्पण किया जाता है।

वेदों में उल्लेख

वेदों ने उनका वर्णन मरने वाले पहले व्यक्ति के रूप में किया है, जिन्होंने नश्वरता के मार्ग को अंकित किया, जिस पर तब से सभी लोग चलते आ रहे हैं। वह दक्षिण दिशा (मृत्यु का क्षेत्र) के संरक्षक हैं तथा धरती के नीचे दक्षिण में स्थित मृतकों के विश्राम-स्थल के स्वामी हैं। वेदों में यम को दिवंगत पूर्वजों के प्रसन्नचित्त राजा के रूप में वर्णित किया गया है, न कि पापों का दंड देने वाले के रूप में।

दक्षिण-द्वार से प्रवेश करने वाले पापियों को वह तप्त लौहद्वार तथा पूय, शोणित एवं क्रूर पशुओं से पूर्ण वैतरणी नदी पार करने पर प्राप्त होते हैं। द्वार से भीतर आने पर वे अत्यन्त विस्तीर्ण सरोवरों के समान नेत्रवाले, धूम्रवर्ण, प्रलय-मेघ के समान गर्जन करने वाले, ज्वालामय रोमधारी, बड़े तीक्ष्ण प्रज्वलित दन्तयुक्त, सँडसी-जैसे नखों वाले, चर्मवस्त्रधारी, कुटिल-भृकुटि भयंकरतम वेश में यमराज को देखते हैं। वहाँ मूर्तिमान व्याधियाँ, घोरतर पशु तथा यमदूत उपस्थित मिलते हैं।

पौराणिक संदर्भ

पौराणिक कथाओं में उन्हें धर्मराज के रूप से जाना जाने लगा, जो मृतक के अच्छे और बुरे कर्मों को तौलते हैं तथा उनके प्रतिफलों को निर्धारित करते हैं। उन्हें लाल वस्त्रों में सज्जित, हरे वर्ण और रक्ताभ आँखों वाले राजसी स्वरूप में वर्णित किया गया है। वह खोपड़ी से अलंकृत गदा और एक पाश धारण करते हैं तथा भैंसे पर सवारी करते हैं। चार आँखों वाले दो कुत्ते उनके यमलोक के प्रवेशद्वार की रक्षा करते हैं तथा कौए और कबूतर उनके संदेशवाहक हैं। तिब्बत, जापान और चीन की बौद्ध पौराणिक कथाओं में भी यम का वर्णन है। इनमें भी यम की इसी तरह मृतक लोक के संरक्षक की, लेकिन कम महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

चार द्वारों, सात तोरणों तथा पुष्पोदका, वैवस्वती आदि सुरम्य नदियों से पूर्ण अपनी पुरी में पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर के द्वार से प्रविष्ट होने वाले पुण्यात्मा पुरुषों को यमराजशंख, चक्र, गदा, पद्मधारी, चतुर्भुज, नीलाभ भगवान विष्णु के रूप में अपने महाप्रासाद में रत्नासन पर दर्शन देते हैं।

 

 

Source: bharatdiscovery.org

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