आम

  1. आम की रोपण स्थिति के दौरान बेहतर परिणाम पाने के लिए उप मृदा सिंचाई के माध्यम से पौधों से 10 सेमी.नीचे पिचर को रखते हुए जो भू-स्तर से 1 फीट नीचे हो, प्लास्टिक प्लेट द्वारा कवर करते हुए तथा लागू/पौधा/दिन 1.25 लीटर जल के साथ 3 सेमी. व्यास पाईप के माध्यम से पहुँचाना चाहिए तथा गन्ना ट्रेश मल्च (1.0 किलोग्राम/बेसिन (जलाशय) के साथ मल्च किया जाना चाहिए।
  2. काली पोलीथिन फिल्म (100 माइक्रोनकि) नमी के रूपांतरण में मदद करती हा तथा पैदावार में वृद्धि के साथ जड़ वृद्धि, फूल, फल की खेती एवं न्यूनतम फलों का गिरना- रोकने में वृद्धि करती है ।
  3. खुले वृताकार तालाब जिनकी दूरी पेड़ों के आस-पास 6 फिट तथा 9 इंच की चौड़ाई हो के साथ-साथ सूखे आम के पत्ते के साथ तालाबों को मध्य एवं मल्चिंग करने के मध्य से वर्षा जल संचयन, फूल-फल बनने के दौरान मृदा में पर्याप्त आर्द्रता बनाए रखने में मदद करते हैं तथा पैदावार में वृद्धि करते हैं ।
  4. फसल अवशिष्ट मल्च के साथ-साथ ड्रिप सिंचाई जल के संचयन में मदद करती है। जल की 0.6 की मात्रा के साथ ड्रिप सिंचाई एवं मल्च पैदावार में महत्वपूर्ण वृद्धि करती है। संरक्षित सिंचाई फल प्लास्टिक विकास अवधि के दौरान आवश्यक है ।
  5. कई क्षेत्रों में उच्च तापमान दबाब के कारण, पत्तों का गिरना देखा गया है । पत्तों के गिरने को कम करने के लिए 0.2 प्रतिशत पोटेशियम सल्फेट का छिड़काव करें ।
  6. मानसून के आने में 30 दिन का विलम्ब : अगेती एवं मध्यम किस्मों में फल तैयार हो चुके होते हैं अत: फसल पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। सोल्डर ब्रोवनिंग (फलों विकृति,फटने का दाग)का आपतन एवं कटाई के पश्चात संक्रमण भी न्यूनतम होंगे। फलों की गुणवत्ता बेहतर होगी। फलों का आकर एवं गुणवत्ता में देरी से पूर्ण विकसित होने वाली किस्में जैसे चौसा, मल्लिका एवं आम्रपाली आदि को प्रभावित करेंगे । आगे तापमान बढ़ोतरी होने पर, जुलाई- सितम्बर के दौरान संबंधित मणि वर्षा सिंची एवं मल्चिंग का अनुसरण करते हुए फसल में प्रबंधन करें ।
  7. वानस्पतिक चरण पर वर्षा मे कमी : वनस्पतिक अंकुर (मौसम सुनिश्चित करते हुए संभावित फलों की शाखा के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव। इसके लिए सिंचाई एवं मल्चिंग का अनुसरण करने की आवश्यकता है।
  8. टर्मिनल सुखा: मौसम सुनिश्चित करते हुए फसल संभावना हल्की मृदा में प्रभावित होंगे, सूखे में पुनरावृति से फसल को नुकसान होता है। परन्तु सिंचाई एवं मल्चिंग का अनुसरण करना आवश्यक है।

केला

  1. केले के पुष्पण स्तर पर मृदा नमी की कमी के कारण कम गुच्छे, कम संख्या तथा ऊँगली के छोटे आकर के केले का उत्पादन होता है। पुष्पण के दौरान जल की कमी का परिणामस्वरूप छोटे आकर तथा विक्रय करने के लिए अनुपयुक्त गुच्छे तथा गुच्छे के वजन में कमी तथा अन्य वृद्धि मापदंड प्रभावित होते हैं।
  2. ड्रिप के माध्यम से सिंचाई करने से, जल की कमी के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने में मदद करती है ।
  3. पौध संरक्षण उपाय: न्यूनतम आर्द्रता के साथ उच्च तापमान फल वाली फसलों अर्थात आए,अंगूर तथा अनार में कीटों के प्रकोप जैसे माहू एवं माईटस को ख़त्म करने के लिए अनुकूल होते हैं।उपयुक्त मॉनिटरिंग एवं संस्तुत कीटनाशियों का समय से छिड़काव आपतन की उग्रता को कम करेगी। माहू के लिए कीटनाशियों जैसे थामेथोक्थम 25 डब्ल्यूजी की दर 0.205 ग्राम/लीटर या ऐस्केट 75 एसपी की दर 1.5 ग्राम/लीटर था। स्पीनोसड 45 प्रतिशत एससी की दर से 0.5 मिली /ली. थ्रिप्स पर्याक्रमण को कम करेंगी। माइटस प्रबंधन के लिए, 2.5 मिली/ली. की दर से डीकोफोल 18.5 ईसी था 0.5 मिली/लीटर की दर से फेनेपाईरोक्सिमेंट का छिड़काव करें।

यदि मानसून के आने में 15 दिन/30 दिन विलम्बन हो

  1. प्राय: केले उगने वाले सभी क्षेत्रों में, सामान्यत: सकर रोपण/टिश्यु कल्चर पौधों को मानसून की पहली बरसात के पश्चात रोपना शुरू करना चाहिए ।
  2. चुकी केले की फसल मौनसून आधारित नहीं होती है, तदनुसार रोपण मौनसून आने के आधार पर किया जा सकता है ।

सब्जी एवं प्रजनन चरण पर वर्षा में कमी

  1. सब्जी स्तर के दौरान वर्षा में कमी के परिदृश्य में, किसानों को जल संरक्षण हेतु ड्रिप सिंचाई करने की तथा फल उपयोग दक्षता को बढ़ाने के लिए रुट-जोन पर अपेक्षित जल प्रदान करने की सलाह दी जाती है ।
  2. जैसा की कमी के उपाय, 0.1 मिमी. सेलिसिलिक अम्ल (आर्द्रता के साथ जल का 140 मिग्रा/ली.) फोलायर छिड़काव 250 मिली/पौध की दर से दिया जा सकता है ।
  3. वानस्पतिक वृद्धि के दौरान कोलीनाइट (5 प्रतिशत) का फोलिअर अनुप्रयोग वाष्पोत्सर्जन होने को कम करता है ।
  4. वानस्पतिक वृद्धि स्तर के दौरान 15 दिनों के अंतराल पर चिपचिप पदार्थ के साथ-साथ ३ प्रतिशत पोलिफ्रिड(19.19.19), अर्थात जल के 1लीटर का 30 ग्रामों में पांच छिड़काव की संस्तुति की जाती है ।
  5. काले पोलीथीन के साथ या पौध सामग्री/केले के पत्ते आदि के साथ मृदा सतह की मल्चिंग जल हानि को कम करने के लिए बेसिन को चारों तरफ फैलाया जा सकता है ।
  6. पौधा एवं मल्चिंग के चारो तरफ हरी खाद फसल उगाना संस्तुत किया जाता है ।
  7. खुली सिंचाई की बजाए, उप-सतह सिंचाई की संस्तुति की जाती है ।

टर्मिनल सुखा: टर्मिनल सूखे के मामले में, उप-सतह सिंचाई के साथ केले की खेती, प्लास्टिक मल्चिंग, सैलिसाईलिंग अम्ल के साथ कमी, जल में घुलनशील उर्वरकों का छिड़काव द्वारा पत्तों को सूखे की  स्थिति पर काबू पाने के लिए मदद संस्तुत की जाती है ।

अनार

यदि मानसून के आने में 15 दिन का विलम्ब हो तथा सब्जी खेती चरण में वर्षा की कमी

  • नमी संरक्षण के साथ-साथ जैविक या अजैविक मल्चों काउपयोग तत्कालीन प्रभाव प्रचलन में लाया जाना चाहिए। जैविक पौध अपशिष्ट या प्लास्टिक मल्च (सफ़ेद/कला/पहले का मल्च) की स्थानीय उपलब्धता के आधार पर उपयोग में लाते हैं।
  • पर्याप्त नम मृदा की उपलब्धता होने पर उर्वरकों के उपयोग को न करना या प्रजनन को सिमित उपलब्ध/संचयी जल वर्षा की दक्षता उपयोग के लिए अपनाया जा सकता है ।
  • आर्द्रता की हानियों को कम करने के लिए अंत: कृषि पद्धतियों को अपनाना ।
  • संकर एवं फल अंकुर को हटाना ।
  • तालाबों में संचयी जल का संरक्षण एवं फसलों के जटिल स्तिथि में जीवन रक्षा सिंचाई के उपभोग के लिए सुनिश्चित करना ।
  • पौधों के चारों तरफ पंक्तियों के साथ मेड़ों को ऊपर उठाना ।
  • ड्रिपर के निचे पौध के रुट जोन में हाईड्रोजेल को लागू करना । 5 किलों स्वच्छ बालू/मृदा में 500 ग्राम हाईड्रोजेल को मिलाना, इस मिश्रण को 20 ग्राम/पेड़ पर डाल सकते हैं ।
  • 0.5 मिली/लीटर की दर से एबामेंकटिन 1.95 ईसी का छिड़काव करना यदि माइट वाष्पोत्सर्जन सूखे स्थिति के कारण आ जाते हैं ।

प्रजनक चरण पर वर्षा में कमी

  • पूर्ण फूल खिलने पर जिब्बरेलिक अम्ल (जीए) 10 मि.ली./ली. का छिड़काव ।
  • शाम के समय फल को रोपण करने तथा 20 दिनों के भीतर बोरिक अम्ल 2 ग्राम/ली.+0.5 मिली/ली की दर से एन –(2-क्लोरो-4-प्रीडीनाइल) फेनाइल यूरिया (सीपीपीयु) (क्लोरफेन्युराँन के लिए आम नाम)  का अगले दिन छिड़काव ।

टर्मिनल सुखा

ऊपर दर्शाए गए उपायों के अतिरिक्त फलों की संख्या को किसानों के साथ उपलब्ध निश्चित जल के आधार पर कम कर देना चाहिए। चार वर्षों से कम उम्र के पौधों में 10 दिनों के पश्चात यदि आवश्यक हो फलों की पैदावार में गिरावट के मामले में किए जा सकते हैं ।

4 वर्षो के ऊपर पौधों में 20 मि.ग्रा./ली. का1 छिड़काव किया जा सकता है ।

अमरुद

मानसून में 15 दिनों का विलम्ब है

अगेती शीतकालीन फसल प्रभावित होगी, इसलिए अनुपूरक सिंचाई और मल्चिंग करनी चाहिए ।

मानसून में 30 दिनों का विलम्ब है

वर्षाकालीन फसल फसल प्रभावित होगी (फल के आकार और गुणवत्ता में कमी), शीतकालीन फसल/पछेती शीतकालीन फसल के परिणाम प्रभावित होते हैं लेकिन फल आकार और गुणवत्ता में सुधार होगा। अनुपूरक सिंचाई और मल्चिंग करें।

वनस्पति स्तर पर वर्षा की कमी

पछेती शीतकालीन फसल अनुपूरक सिंचाई और मल्चिंग करें ।

पुनरुत्पादन स्तर पर वर्षा की कमी

मार्च-अप्रैल के दौरान होने के कारण लागू नहीं ।

अधिक वर्षा के परिणामस्वरूप बाढ़

अधिक वानस्पतिक वृद्धि के परिणामस्वरूप पुनरुत्पादन उपज मे कमी, दीर्घकालीन बाढ़ की स्थिति के परिणामस्वरूप पौधों की क्षति, कीट और फफूंद का बढ़ना, निकासी प्रणाली में सुधार, कीटों एवं रोग प्रबंधन महत्वपूर्ण है ।

टर्मिनल सुखा

फल गिरने, फल के छोटे आकर से उपज कम होना, सिंचाई और मल्चिंग करें ।

स्त्रोत: राष्ट्रीय बागवानी मिशन

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