उत्पादन

काली मिर्च पाईपर नाइग्रम कुल पाईपरासिया एक बहुवर्षीय आरोही बेल है जिसके फल (वेरी) का मसाला तथा औषधि के रूप में उपयोग किया जाताहै।भारत विश्व में काली मिर्च का उत्पादक उपभोक्ता एवं निर्यातक देशों में प्रमुख है।भारत ने वर्षे 2012-2013 में अनेक देशों को लगभग15,363टन लगभग 63,810 लाख रूपये काली मिर्च का निर्यात किया।काली मिर्च की खेती मुख्त: केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडू राज्यों में होती है। जबकि महराष्ट्र,उत्तर-पूर्व राज्यों तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप में इसकी खेती आंशिक रूप से होती है। वर्ष 2012–13 में लगभग 201381 हेक्टेयर क्षेत्रफल में इसकी खेती की गयी जिससे लगभग 55 हजार टन काली मिर्च का उत्पादन हुआ ।

खेती योग्य जलवायु एवं मिट्टी

काली मिर्च की खेती पर्याप्त वर्षा तथा आर्द्रता वाले आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है।पश्चिम घाट के उपपर्वतीय क्षेत्र , गरम और आर्द्र जलवायु इसकी खेती के लिए उत्तम है।इसकी खेती 20 डिग्री उत्तर और दक्षिण अक्षांश के दरमियान समुंद्र तट से 1500 मीटर तक की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी फसल न्यूनतम 10.0c तथा उच्चतम 40.0c तापमान को सहन कर सकती है। जबकि इसकी खेती के लिए 23-320c के बीच औसत तापमान 280c) तापमान अधिक उपयुक्त है ।

काली मिर्च के पौधों की वृद्धि के लिए 125-200 से.मी. वार्षिक वर्षा आदर्श मानी जाती है। काली मिर्च की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। परन्तु लाल लैटराइट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। जबकि मृदा का पी.एच.मान 5.5 से 6.5 के बीच अनुकूल होता है ।

भारत में काली मिर्च की खेती करने वाले पश्चिम तटीय क्षेत्र जैसे,समुद्र तट के समीप भूमि, रोपण फसल के अनुपात में काली मिर्च को व्यापक स्तर पर उगाया जाता है, समुद्र तट से लगभग 800-1500 मीटर उचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र, काफी, इलायची तथा चाय की फसल के साथ इसकी खेती अत:फसल के रूप में करते हैं ।

प्रजातियाँ एवं कल्टीवर्स

काली मिर्च के अधिकतर कल्टीवर्स द्विलिंगी (मादा तथा नर पुष्प एक ही डाली में) होते हैं।जबकि नर तथा मादा पौधों के बीच में पूर्णत: भिन्ता पायी जाती है।भारत में काली मिर्च के 75 से अधिक कल्टीवरों की खेती की जा रही है।केरल में सभी कल्टीवरों में करिमुन्डा सबसे अधिक लोकप्रिय है।कोट्टनाडन(दक्षिण केरल),नरायकोडी(मध्यकेरल),ऐपिरियन(वयनाडु),नीलमुंडी(इडूक्की), कुतिरवल्ली तथा बालनकोट्टा कल्टीवरों से एकांतर वर्ष में उपज प्राप्त होती है।गुणवत्ता की दृष्टि से कुट्टनाडन में ओलिओरसिन (17.8%) की अधिक मात्रा तत्पश्चात एम्पियरियन में (15.7%) होती है ।

काली मिर्च की सतह उन्नत प्रजातियाँ खेती के लिए विमोचन की गई है।जिनका वर्णन तालिका -1 में किया गया है ।

पन्न्युर -1, पन्न्युर-3 और पन्न्युर-8, पन्न्युर `अनुसन्धान केन्द्र (केरल कृषि विश्वविधयालय) द्वारा विकसित संकर प्रजातियाँ हैं। जबकि आईआईएसआर–गिरिमुंडा तथा आईआईएसआर–मलबार एक्सल, भा.कृ.अनु.प.- भारतीय मसाला फसल अनुसन्धान संस्थान, कोषिक्कोड (केरल) द्वारा विकसित दो संकर प्रजातियाँ हैं।

प्रवर्द्धन

काली मिर्च के पौधों को तीन प्रकार से विकसित किया जा सकता है।(1) लम्बे इंटर नोड युक्त तना जिसमें अपस्थानिक जड़े होती है जो सहायक वृक्षों से चिपकी रह सकती है।(2) भुस्तरीय प्ररोह जो बेल के निचले भाग से उदभव होकर जमीन के सहारे फैली रहती है।इनमें जड़ों युक्त लंबे इन्टर नोड होते हैं।(3) फल युक्त पार्श्व शाखाएं।रोपण के लिए रोपण सामग्री मुख्यतः आरोही प्ररोह से तैयार की जाती है जबकि इसके उत्पादन में सीमान्त प्ररोह का भी उपयोग करते है। बुश काली मिर्च को विकसित करने के लिए पार्श्व शाखाओं का उपयोग किया जाता है।काली मिर्च की वेरी में भी अंकुरण क्षमता होती है।परन्तु आम तौर पर इसका उपयोग रोपण के लिए नहीं करते क्योंकि यह अनुवांशिक रूप से एक समान नहीं होती ।

रोपण सामग्रियों का उत्पादन

परम्परागत विधि

उच्च उपज वाली स्वस्थ पौधे के प्ररोह के निचले भाग को मिट्टी में दबाकर लकड़ी के शेयर रखतें हैं तथा जड़ निकलने तक छोड़ देते हैं।फरवरी तथा मार्च के महीने में इसकी 2-3 नोडों को काटकर अलग करके प्रत्येक को नर्सरी वेड़ों या पोटिंग मिश्रण (मृदा,बालू तथा खाद को 1:1:1 के अनुपात) युक्त पोलीथीन बैगों में रोपण करते हैं।रोपित पौधों को पर्याप्त छाया में रखकर नियमित सिंचाई करना चाहिए।मई-जून माह में पौधे खेतों में रोपण करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

संशोधन प्रवर्धन विधि

श्रीलंका में काली मिर्च की रोपण सामग्रियों को उत्पादन करने के लिए एक उत्तम विधि को विकसित किया गया।इस विधि द्वारा जल्दी और आसानी से काली मिर्च की रोपण सामग्रियों का उत्पादन किया जा सकता है।भारत में कुछ संशोधन के साथ इस प्रवर्धन विधि को अपनाया गया। इस विधि में 45 से.मी.गहराई तथा 30 से.मी.चौड़े एवं सुविधानुसार लम्बे गढ्डे बनाये जाते हैं।इन गढ्डों में मृदा,रेत तथा खाद को 1:1:1 के अनुपात से भर देते हैं।बांस को दो भागों में विभाजित करके इसके आधे हिस्से (जिसकी लम्बाई लगभग 1.25-1.50 मीटर तथा 8-10 से.मी.व्यास ) को 30 से. मीटर के अन्तराल पर 450 कोण पर रखते हैं।बांस के ऊपरी हिस्से को किसी मजबूत वस्तु के सहारे रखकर उसके खोखले भाग में रूटिंग मीडियम भरकर प्रत्येक विकसित नोड को रूटिंग मीडियम में नारियल की पत्ती की मध्य शिरा की सहायता से दबाते हैं।

जब बेल ऊपर की तरफ बढ़ने लगे तब पौधों की ऊपर वाली तीन नोडों को काट कर सौरिकृत पोटिंग मिश्रण युक्त पोलीथीन बैगों में रोपण करते हैं।रोपण के समय ट्राईकोडरमा को 1ग्राम तथा वीएएम 100 सीसी/ कि.ग्राम को प्रति बैग दर से डालते हैं।पौलिथिन बैगों को ठंडे तथा आर्द्रता वाले स्थान पर खेतों में रोपण होने तक रखते हैं।इस विधि द्वारा पौधों का तीव्र गति से विकास (1:4),अच्छी तरह विकसित जड़ें, खेतों में पौधों की अच्छी विकसित जड़ें, खेतों में पौधों की अच्छी तरह स्थापना तथा पौधे की तेजी की से वृद्धि होती है ।

ट्रेंच विधि

खेत में उगाये गये काली मिर्च के पौधे के आरोही प्ररोहों की एक नोड से काली मिर्च की रोपण सामग्री तैयार करने के लिए एक सरल, सस्ती और उत्तम विधि को इस संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। ठंडे और छायादार स्थान में 2.0 मी.x 1.0 मी.x 0.5 मी. आकार का गढ्डा खोद लेते हैं। खेत में उगाये गए पौधे को पत्तों सहित 8-10 से.मी. लम्बे एक नोड को रेत, मिट्टी नारियल जटा और गोबर की खाद को समान अनुपात में पौलिथिन बैग (200 गेज का 25 से.मी.x15 से.मी. आकार ) में रोपण करते हैं।नोड को इस तरह रोपण करते हैं कि उसकी पत्तियों को मिश्रण के ऊपर रहना चाहिए।इन बैगों को गढ़डों में रखने के बाद गढ़डों को एक पौलिथिन शीट से ढक देते हैं।इन पौलिथिन शीटों के कोने पर वजन रखकर उसको दबाते हैं ताकि वह हवा में स्थिर रहे।पौधे युक्त बैगों में दिन में चार-पांच बार सिंचाई करना चाहिए तथा गढ़डों को सिंचाई के तुरंत बाद पौलिथिन शीट से पुन: ढक देना चाहिए।पौधे युक्त पोलीथीन बैगों में कॉपर ओक्सिक्लोराइड (2 ग्राम /लीटर ) को 2-3 बार डालना चाहिए ।

लगभग एक महीने बाद पौधों में नये प्ररोह निकलने शुरू हो जाते है।रोपण के 2 महीने बाद पौधों को गढ़डों से बहर निकाल कर छायादार जगहों में रखकर दिन में दो बार सिंचाई करना चाहिए।यह पौधे भागभग 2 से 2 ½ महीने बाद खेतों में रोपण करने के लिए तैयार हो जाते हैं।इस विधि द्वारा उत्पादित रोपण सामग्रियों में 80-85% पौधे खेतों में सफलतापूर्वक स्थापित होते हैं।

सर्पेन्टाइन विधि

काली मिर्च की रोपण सामग्रियों के उत्पादन के लिए यह विधि सबसे सस्ती एवं प्रभावशाली विधि है।पौधशाला में 500 ग्राम सौरिकृत पोंटिंग मिश्रण को पौलिथिन बैग में भर कर उसमें मूल युक्त पौधों को मातृ पौधे की हैसियत से रोपण करते हैं।इन पौधे के बढ़ने के साथ-साथ उसमें कुछ नोड निकल आती हैं।इन नोडों को अन्य पोंडिंग मिश्रण युक्त पौलिथिन बैग (20 x 10 से.मी. आकार) में नारियल पत्तों की मध्य शिरा की सहायता से दबा कर रखें तथा यह सुनिश्चित कर लें कि नोड अच्छी तरह पोंडिंग मिश्रण में दबी है। इसी तरह इस प्रक्रिया को आगे जारी रखते हैं।तीन महीने बाद रोपित किये मातृ पौधे से प्रथम 10 से 12 नोड वाले पौधे रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।इन नोडों को काटकर अलग करके उन्हें पौलिथिन बैगों में रोपण करते हैं। रोग रहित रोपण सामग्री के उत्पादन के लिए पौलिथिन बैग में जैवनियंत्रण कारक तथा सौरी कृत पोटिंग मिश्रण अर्थात मृदा, ग्रेनाइट पाउडर और खाद को 2:1:1 के अनुपात में भरते हैं।इन पौधों में एक सप्ताह के अन्दर नयी पत्तियां निकलना शुरु हो जाती हैं।ये पौधे लगभग 2-3 माह बाद खेतों में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।इन पौधों में रोजाना सिंचाई करना चाहिए।इस विधि द्वारा प्रतिवर्ष प्रत्येक मातृ पौधे से लगभग 60 पौधे प्राप्त किये जा सकते हैं।

मृदा रहित पोंटिग मिश्रण

नारियल जटा, केचुआ खाद (75:25 के अनुपात) तथा ट्राइकोडरमा आधारित टालक पाउडर (107 सीएफयू प्रति किलो ग्राम 1)10 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से मिला कर मृदा रहित पोडिंग मिश्रण बनाते हैं।इस मिश्रण को प्लग ट्रे में भरकर पौधों का रोपण करते हैं।परंपरागत प्रवर्धन विधि की अपेक्षा पलग ट्रे द्वारा उत्पादित रोपण सामग्री उत्तम होती है।

प्लग ट्रे प्रर्वधन विधि एक तरह संशोधन सरपेन्टाइन विधि है।नारियल जटा तथा केचुआ खाद (75:25 के अनुपात ) की सहायता से सुविधानुसार लम्बी,1.5 मीटर चौरी तथा 10 से.मी ऊँची बेड बनाते हैं।इनमें पौधे की वृद्धि होने देते हैं तथा प्रत्येक नोड को रुटेड मीडियम में दबाते हैं।लगभग 45-60 दिनों पश्चात 15-20 नोड को काट कर अलग –अलग मृदा रहित पोटिंग मिश्रण युक्त प्लग ट्रे(7.5 x 7.5 x 10 से.मी. के आकर ) के अलग अलग खानों में रोपन करते हैं।इन प्लग ट्रे को आर्द्रता अनियन्त्रित ग्रीन हॉउस (27+-20 c) में रखते हैं।45- 60 दिनों बाद जब पौधों में 4-5 पत्तियां निकल आएं तब इन पौधों को मजबूती प्रदान करने के लिए प्राकृतिक हवादार ग्रीन हॉउस में स्थानान्तरण करते हैं।120-150 दिनों के बाद स्वस्थ काली मिर्च के पौधे खेतो में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।

पौधशाला में काली मिर्च के पौधों को हानि पहुँचाने वाले रोग एवं प्रबंधन

फाइटोफथोरा रोग

पौधशाला में काली मिर्च पौधों के पत्तों, तना तथा जड़ों में फाइटोफथोरा प्रकोप देखा जा सकता है।इसके संक्रमण से पत्तों पर काले रंग की चित्ती के निशान पड़ जाते हैं।यह निशान धीरे-धीरे बढ़ कर पूरी पत्ती पर फ़ैल जाता है।इस रोग के कारण पत्ती सड़ कर गिर जाती हैं।इसके संक्रमण से तने पर काले रंग का निशान पड़ जाता है। जिस कारण तने में अंगमारी हो जाती है। इस रोग का प्रभाव जड़ों पर भी पड़ता है जिस कारण जड़ें सड़ जाती हैं।

प्रबंधन

इस रोग की रोकथाम के लिए बोर्डियों मिश्रण (1 %) का छिड़काव तथा कोप्पर ओक्सिक्लोराइड (0.2%) से मासिक अन्तराल पर पौधों के आधारीय भाग की मृदा को उपचारित करना चाहिए इसके अतिरिक्त मैटालेक्सिल –मैन्कोजिव (0.125%)या 0 3 % पोटेशियम फास्फोनेट का भी उपयोग करके इस रोग की रोकथाम कर सकते हैं।इस रोग के समाधान के लिए सौरिकृत पोटिंग मिश्रण तथा जैव नियंत्रण कारकों जैसे वीएएम100 सीसी/कि.ग्राम की दर से तथा ट्राईकोडरमा 1 ग्राम/कि.ग्राम मृदा की दर से पोडिंग मिश्रण में मिला कर पौलिथिन बैगों में भरना चाहिए।जैव नियंत्रण कारक मुख्यतः पौधे की जड़ों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।अत: पौधे के ऊपरी भाग में रसायनों का छिड़काव करके रोगों से बचाव करना चाहिए।अगर बोर्डियों मिश्रण से मृदा को उपचारित कर रहे हैं तब इसके अतिरिक्त मैटालैक्सिल–मैनकोजिब (0.125 %) तथा पोतेश्यम फोस्फोनेट (0.3%) (जो की ट्राईकोडरमा के साथ अनुकूल है) का उपयोग करना चाहिए ।

एन्थ्राकनोज रोग

यह रोग कोलोटोट्राइकम ग्लोयोस्पोरोयाड्स नामक कवक के द्वारा होता है।यह कवक पत्तों को हानि पहुंचाता है।इसके संक्रमण से पत्तों पर भूरे-पीले से काले–भूरे रंग की अनियमित चित्तियाँ पड़ जाती हैं।

प्रबंधन

इस रोग का नियंत्रण करने के लिए 1% बोर्डियों मिश्रण या कारबेन्डाजिम (0.1%)का छिड़काव करना चाहिए ।

पर्ण चित्ती रोग

यह रोग राइजोक्टोनिया सोलानी नामक कवक के द्वारा होता है।इसका प्रकोप पौधशाला में अप्रैल–मई के महीने में गर्म और आर्द्र वातावरण में ज्यादा होता है। यह कवक पत्ते तथा तने दोनों को हानि पहुंचाता है।इसके संक्रमन से पत्तियों पर गहरे भूरे रंग की चित्ती तथा माईसीलिया थ्रेड्स पड़ जाती हैं।यह चित्तियां एक पत्ती से दूसरी पत्ती पर फ़ैल जाती हैं।इस रोग के कारण तने पर काले रंग के निशान पड़ जाते हैं जो ऊपर या नीचे की ओर फ़ैलते हैं।इस रोग के कारण पौधा सूख कर गिर जाता है ।

प्रबंधन

इस रोग को बोर्डियों मिश्रण (1%) का छिड़काव करके रोका जा सकता है ।

मूल म्लानी रोग

यह रोग मुख्यतः जून–सितम्बर के महीने में स्केलेरोटियम रोलफसी नामक कवक के द्वारा होता है।इसके संक्रमन से गहरे भूरे रंग की चित्तियां पत्तियों तथा तने पर पड़ जाती हैं।पत्तियों के अग्र भागपर सफेद माईसिलियम भी देखा जा सकता है ।

प्रबंधन

इस रोग के कारण तना खोखला हो जाता है। पत्तियां सुख कर गिरने लगती हैं। इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में इसको फाइटो सैनिटरी द्वारा रोका जा सकता है।रोग युक्त पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए।पौधों पर बोर्डियों मिश्रण (1%) या कार्बेन्डाजिम (0.2%) का छिड़काव करने से इस रोग का नियंत्रण किया जा सकता है ।

विषाणु रोग

पौधशाला में काली मिर्च के पौधों पर वैन क्लियरिंग, मोसाईक, पीले दाग और पत्तो का आकार में छोटा होना विषाणु संक्रमन के मुख्य लक्षण है।विषाणु संक्रमित रोपण सामग्रियों का उपयोग करने से यह संक्रमण पौधों में आ जाता है। अत: रोग रहित रोपण सामग्री का उपयोग करना चाहिए।इनका संक्रमन कीटों जैसे, एफिड तथा मिलीबग द्वारा भी होता है।

प्रबंधन

पौधेशाला की नियमित देखभाल और निरिक्षण करना चाहिए।अगर संक्रमित पौधा दिखे तो उसे तुरन्त उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।कीटों द्वारा विषाणु संक्रमण की रोकथाम के लिए कीटनाशक रसायनों जैसे, डाइमिथेट (0.05%)का छिड़काव करना चाहिए ।

पौधशाला में काली मिर्च को हानि पहुंचाने वाले सूत्रकृमि

काली मिर्च के पौधों को पौधशाला में दो प्रमुख सूत्रकृमि जड़ गाँठ सूत्र कृमि (मेलेडोगाइन स्पिसिस ) तथा बरोयंग सूत्रकृमि (रेडोफोलस सिमिलस ) हानि पहुंचाते हैं।यह सूत्रकृमि मुख्यतः जड़ों को हानि पहुंचाते हैं,जिससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है।पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं।सूत्रकृमि ग्रसित रोपण सामग्री को खेत में रोपण करने पर उसकी स्थापना की संभावना कम रहती है।पौधशाला में रोपण सामग्रियों के उत्पादन के समय सूत्रकृमि का प्रकोप अधिक होता है ।

प्रबंधन

इसकी रोकथाम के लिए पोटिंग मिश्रण को सौरिकरण करके उसमे पोकोनिया क्लैडोस्पोरिया या ट्राईकोडरमा हरजियानम 1-2 ग्राम /कि. ग्राम (106 cfu /ग्राम) की दर से डालना चाहिए।पौलिथिन बैग में पौधों के तीन ओर 2-3 से.मी गहरे गड्ढे करके उसमें फोरेट (10जी)* से ग्राम/पौधा अथवा कारवोफयुरान (3 जी)* से 3 ग्राम प्रति पौधे की दर से उपचारित करना चाहिए।इसके अतिरिक्त 0.1% कर्वोसलफान (25 EC) को 50 मी.ली./ पौधे की दर से उपचारित करके सुत्रकृमियो की रोकथाम की जा सकती है।यह अतिआवश्यक है कि सूत्रकृमि नाशक से उपचारित करने के बाद मृदा में आवश्यक आद्रता बनाये रखने के लिए इसकी इसकी संचाई करना आवश्यक है।अगर पौधशाला में पौधों को लम्बे समय तक रखते हैं, तब 45 दिनों के अन्तराल पर उपरोक्त निमेटीसाईड (सूत्रकृमिनाशक) का उपयोग करना चाहिए।(* केरल में प्रतिबंधित)

रोपण

जगह का चयन

अगर काली मिर्च की खेती ढलान वाली भूमि में की जा रही है, तब ढलान दक्षिणी की तरफ न हो और कुछ हिस्सा उत्तर तथा कुछ हिस्सा पूर्व होना चाहिए ताकि सूर्य की गर्मी का प्रभाव सीधे बेलों पर न पड़ें और पौधे सूखने से बचाया जा सके ।

सहायक वृक्षों का रोपण

मई-जून के महीने में मानसून की पहली वर्षा होते ही 50 से.मी. लम्बे x50 से.मी. चौड़े x 50 से.मी.ऊँचें गढ़डों में गाय का गोबर और मृदा को समान अनुपात में भरकर उसमे इरिथ्रिना स्पिसिस या गरोगा पिन्नटा या गिरिविलिया रोबस्टा (सिल्वर ओक ) या एलियन्थस मलावारिका (माटी) को सहायक वृक्ष के रूप में रोपण करते है।सहायक वृक्षों के तने को मार्च/ अप्रैल में काट कर छायादार जगह में रखते हैं। इन तनों में मई माह में अंकुरण शुरू हो जाता है।तब इन्हें रोपण कर सकते हैं।रोपण के समय इनकी आपस में बीच की दूरी 3 मीटर होनी चाहिए।एक हेक्टेयर में लगभग 1110 सहायक वृक्षों का रोपण कर सकते हैं।3 वर्ष बाद जब सहायक वृक्ष की ऊंचाई पर्याप्त हो जाये तब काली मिर्च के पौधों का रोपण कर सकते हैं।रोपण के समय अगर ई.इंडिका और जी. पिन्नता को सहयक वृक्ष के रूप में उपयोग कर रहे हैं तब सूत्रकृमियों तथा तना एवं जड़ भेदक की रोकथाम के लिए फोरेट (10 जी )* को 30 ग्राम की दर से वर्ष में दो बार (मई–जून तथा सितम्बर –अक्तूबर में )उपयोग करना चाहिए।(*केरल में प्रतिबंधित)

काली मिर्च के पौधों का रोपण

मानसून शुरू होते ही सहायक वृक्ष के सहारे उत्तर दिशा में 50 से.मी. गहरे गढ्डे खोद लेते हैं।इन गढ्डों की आपस में दूरी 30 से.मी. होनी चाहिए।इन गढ़डों में मृदा तथा खाद को 5 कि.ग्राम/ गढ्डे की दर से भरना चाहिए।रोपण के समय नीम केक (1 कि. ग्राम), ट्राईकोडरमा हरजियानम (50 ग्राम) तथा 150 रोक फासफेट प्रति गढ्डा की दर से डालना चाहिए।वर्षा होते ही 2-3 काली मिर्च के पौधे को गढ्डे में अलग अलग स्थान पर रोपण करते हैं।अच्छी स्थापना के लिए कम से कम पौधे की एक नोड जमीन में मिट्टी के अन्दर दबी रहना आवश्यक है ।

कर्षण क्रियाएं

पौधे की लम्बाई में वृद्धि होने पर इनको सहायक वृक्ष से बांध कर रखना चाहिए।अत्यधिक गर्मी से पौधों को बचाने के लिए कृत्रिम छाया प्रदान करनी चाहिए।सहायक वृक्ष की अनावश्यक शाखाओ को काट देना चाहिए ताकि पौधे को पर्याप्त प्रकाश मिल सके।उत्तर पूर्व मानसून के बाद हरी पत्तियों या जैविक संसाधन से झपनी करनी चाहिए।पौधे की जडो को हानि से बचाने के लिए पौधे या उसके आस पास ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए ।

रोपण के द्वितीय वर्ष में भी प्रथम वर्ष की भांति सारी क्रियाए पुन: अपनाना चाहिए।परन्तु चौथी साल में बड़ी सावधानी पूर्वक सहायक वृक्ष की शाखाओं को काटना चाहिए क्योंकि पौधे की वृद्धि के लिए सहायक वृक्ष का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है।प्राय: जून और सितम्बर माह में सहायक वृक्षों की शाखाओ को काटना चाहिए।क्योंकि अधिक छाया में पौधों में पुष्पण और फल के समय कीटों का प्रकोप अधिक होता है।रोपण के चौथे वर्ष के उपरांत दो गढ्डे बनाना चाहिए।जिसमे एक गढ्डा मई- जून में तथा दूसरा दक्षिण – पश्चिम मानसून के बाद अक्तूबर- नवम्बर में बनाना चाहिए।वर्षा काल में पश्चिम तटीय क्षेत्रों में मृदा का भूक्षरण रोकनी चाहिए।ग्रीष्म काल में जैविक झापनी करना लाभदायक है ।

खाद और उर्वरक

काली मिर्च के पौधे की अच्छी वृद्धि के लिए खाद और उर्वरक को पर्याप्त मात्रा डालना चाहिए।गोबर या कम्पोस्ट के रूप में जैविक खाद को 10 कि. ग्राम / पौधा तथा नीम केक को 1 कि. ग्राम पौधा की दर से मई माह में डालना चाहिए।अधिक अम्लीय मृदा में एक वर्ष के अंतराल पर 500 ग्राम / पौधा की दर से चुना या डोलामाइट का उपयोग अप्रैल – मई महीने में कर सकते हैं।तीन वर्ष अथवा उसके उपरांत ऊर्वरक की संस्तुत मात्रा निम्न प्रकार है ।

  • एन.पी.के. 50:50:150 ग्राम/पौधा/वर्ष (सामान्य )
  • एन.पी.के. 50:50:200 ग्राम/पौधा/वर्ष (केरल के पन्नियुर और कन्नूर जिलों के लिए)
  • एन.पी.के. 50:50:270 ग्राम/पौधा/वर्ष ( केरल के कोषिक्कोड जिले के लिए)

उपरोक्त मात्रा का एक तिहाई भाग प्रथम वर्ष तथा दो तिहाई भाग द्वितीय वर्ष में डालना चाहिए।तीन वर्ष तथा उसके उपरांत उपरोक्त मात्रा का दो बार,प्रथम मई –जून माह में तथा दूसरी बार अगस्त-सितबर में करना चाहिए।मृदा में उर्वरकता की आवश्यकतानुसार उर्वरकों की मात्रा संस्तुत की गयी है।जिनका वर्णन तालिका 2 में किया गया है।उर्वरकों को पौधे के 30 से.मी. की दूरी पर डालकर उसको मिट्टी द्वारा ढक देते हैं।काली मिर्च के पौधों की जड़ों को उर्वरकों से दूर रखना चाहिए।जब जैव उर्वरकों जैसे, अजोस्पिरिल्लस (50 ग्राम/ पौधा) का उपयोग करते हैं, तब नाइट्रोजन को संस्तुत मात्रा से आधी डालना चाहिये।मृदा में जिंक या मैग्नेशियम की कमी होने पर क्रमशः जिंक सल्फेट (0.25%) वर्ष में दो बार मई –जून तथा सितम्बर –अक्तूबर माह में पत्तों पर छिड़काव तथा मैग्नीशियम सल्फेट को 200 ग्राम/ पौधा की दर से मृदा उपचारित करना चाहिए।अधिक उपज के लिए काली मिर्च विशेष सूक्ष्म पोषक मिश्रण को 5 ग्राम /लीटर की दर पुष्पण आरम्भ होने पर तत्पश्चात महीने के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए ।

बुश काली मिर्च

बुश के रूप में उगने वाली पार्श्व शाखाओ को बुश काली मिर्च कहते हैं।बुश काली मिर्च को गमलों या खेतों में उगाया जा सकता है।इसका सबसे बड़ा फायदा यह है की इसकी उपज वर्ष में हर समय प्राप्त की जा सकती है।रोपण के तीन वर्ष बाद उपज प्राप्त होना प्रारम्भ हो जाती है।एक पौधे से लगभग एक कि.ग्राम काली मिर्च प्रति वर्ष प्राप्त होती है।

ग्रीष्म काल सिंचाई

ग्रीष्म काल (मार्च के द्वितीय पखवाड़े के बीच) में 15 दिन के अन्तराल पर काली मिर्च के पौधों की सिंचाई करने पर अंसचिंत पौधों की तुलना में 90-100% तक अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।15 वर्ष से अधिक आयु वाले पौधों के आधारीय भाग 50 लीटर पानी /पौधा की सिंचाई संस्तुत की गयी है जबकि 11-15 वर्ष तक की आयु वाले पौधों के लिए 30 लीटर पानी /पौधा की सिंचाई संस्तुत की गयी है।सिंचाई वाले पौधों में जुलाई माह में स्पाइक 79% तक निकल आती है।जबकि इसी वर्षा आधारित पौधों में केवल 60% तक स्पाईक निकलती है और यह निकलने में सितम्बर माह तक का समय लेती है।इसके साथ-साथ स्पाईक की लम्बाई भी सिंचाई वाले पौधों में असिंचित पौधों की तुलना में अधिक होती है।

तालिका 2 : मृदा परीक्षण के आधार पर लक्षित उपज के लिए उर्वरकों की संस्तुत मात्रा

उर्वरक

मात्रा (कि.ग्राम हेक्टेयर )

लक्षित उपज के लिए संस्तुत उर्वरक मात्रा (कि.ग्राम /हे.)

3 टन / हेक्टेयर

6 टन हेक्टेयर

नाइट्रोजन

<150

50

100

150-200

25

80

250-400

10

55

>400

20

फोस्फोरस(P2O2 )

<10

40

80

10-30

30

70

30-50

10

55

>50

30

पोटोशियम (k2O)

110 -300

125

275

300-500

80

250

>500

35

110

स्त्रोत:भारतीय मसाला फसल अनुसंधान संस्थान(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) कोझीकोड,केरल

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