अदरक (जिंजीबर ओफिशनेल रोस्क) (कुल:जिंजिबिरेंसिया) का प्रकन्द मुख्यतः मसाले के रूप में उपयोग किया जाता है। भारत अदरक उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है। वर्ष 2010-11 में देश में 149.1 हजार हेक्टर क्षेत्रफल से 701.9 हजार टन अदरक का उत्पादन हुआ। भारत के अधिकांश राज्यों में अदरक की खेती की जाती है। जिन में केरल और मेघालय प्रमुख राज्य हैं ।

खेती योग्य जलवायु एवं मिट्टी

अदरक की खेती गर्म और नमीयुक्त जलवायु में अच्छी तरह की जा सकती है। इस की खेती समुद्र तट से 1500 मीटर तक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में की जा सकती है। अदरक की खेती वर्षा आधारित और सिंचाई करके भी की जा सकती है। इस फसल की सफल खेती के लिए बुआई से अंकुरण तक मध्यम वर्षा, वृद्धि तक अधिक वर्षा और खुदाई से लगभग 1 महिना पहले शुष्क वातावरण अति आवश्यक है। इसकी खेती बालुई,चिकनी,लाल या लेटेराइट मिट्टी में उत्तम होती है। एक ही खेत में अदरक की फसल को लगातार नहीं बोना चाहिए।

प्रजातियाँ

भारत में अदरक की खेती के लिए विभिन्न क्षेत्रों के स्थानीय कल्टीवर्सो जैसे, मारन, कुरुप्पमपाडी, एरनाड, वारनाडू, हिमाचल और नदिया आदि का उपयोग करते हैं। स्थानीय कल्टीवर्स में रयो-डी-जिनेरियो बहुत लोकप्रिय कल्टिवर है। अदरक की उत्कृष्ट प्रजातियां और उनकी प्रमुख विशेषताएं तालिका 1 और 2 में दी गई हैं ।

मौसम

भारत के पश्चिम तट में अदरक की बुआई करने के लिए उत्तम समय मई महीने का प्रथम पखवाड़ा एवं मानसून से पहले की वर्षा होती है। सिंचाई आधारित दशा में फरवरी के मध्य या मार्च के प्रारम्भ में इसकी बुआई की जा सकती है। बुआई से पहले मिट्टी की ऊपरी सतह पर सूखे पत्तों को जलाते हैं जिसके खेत में पहले से मौजूद रोगों में कमी आती है फलस्वरूप उपज अधिक होती है ।

उन्नत प्रजातियाँ और उनके विशिष्ट गुण

तालिका 1:अदरक की उन्नत प्रजातियाँ और उनके विशिष्ट गुण

क्र.

सं.

 

प्रजाति

फ्रेश

उपज (/हे)

फसल अवधि(दिन) शुष्क उपज (%) रेशा(%) ओलि ओरिसिन (%) एसन शियल ओयल(%)
1 आई आई एस आर वरदा 22.6 200 20.7 4.5 6.7 1.8
2 सुप्रभा 16.6 229 20.5 4.4 8.9 1.9
3 सुरुची 11.6 218 23.5 3.8 10.0 2.0
4 सुरभी 17.5 225 23.5 4.0 10.2 2.1
5 हिमगिरी 13.5 230 20.6 6.4 4.3 1.6
6 आई आई एस आर महिमा 23.2 200 23.0 3.2 4.5 1.7
7 आई आई एस आर रजाता 22.4 200 19.0 4.0 6.3 2.3

बीज के स्रोत

क्रम संख्या 1,3 और 7 :आई आई एस आर प्रायोगिक क्षेत्र, पेरुवन्नामुषि जिला- कोषिक्कोड ,673 528 – केरल)

क्रम संख्या 2.3 और 4 :उच्च तुंगता अनुसंधान क्षेत्र, उड़ीसा कृषि एवं तकनिकी विश्वविधालय,पोट्टांगी, 764 039, उड़ीसा ।

क्रम संख्या 5 : वाई एस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉर्टिकल्चरएंड फोरेस्ट्री, नैनी – सोलन, 173 230 , हिमाचल प्रदेश ।

खेती हेतू भूमि की तैयारी

मानसून से पहले वर्षा होने के बाद भूमि को चार या पांच बार अच्छी तरह जोतना चाहिए । लगभग एक मीटर चौड़ी, 15 सें मीटर ऊँची और सुविधानुसार लम्बाई की बडों को तैयार करते हैं । दो बडों के बीच लगभग 50 सें मीटर दूरी होनी चाहिए। सिंचाई आधारित फसल के लिए 40 से. मीटर उठी हुई बेड बनाना चाहिए। जिन क्षेत्रों प्रकन्द गलन रोग तथा सूत्रकृमियों की समस्या है वहां पारदर्शी प्लास्टिक शीट जो 40 दिनों तक बडों पर फैला कर मृदा का सौरीकरण करते हैं।

स्थानीय कल्टीवर्सो के विशिष्ट गुण

तालिका 2 : अदरक के स्थानीय कल्टीवर्सों के विशिष्ट गुण

कल्टिवर औसत उपज(/हे) परिपक्वता (दिन) शुष्क उपज(%) रेशा (%) ओलि ओरिसिन(%) एसनशियल ओयल(%)
चीनी 9.5 200 21.0 3.4 7.0 1.9
असम 11.7 210 18.0 5.8 7.9 2.2
हिमाचल 7.2 200 20.0 6.1 10.0 1.9
नादिया 28.5 200 22.1 3.8 5.3 0.5
रियोडीजिनेरियों 17.6 190 20.0 5.6 10.5 2.3

बुआई

अदरक का बीज प्रकन्द होता है। अच्छी तरह परिरक्षित प्रकन्द को 2.5-5.0 से. मीटर लम्बाई के 20-25 ग्राम के टुकड़े करके बीज बनाया जाता है। बीजों की दर खेती के लिए अपनाये गए तरीके के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग होती है। केरल में बीजों की दर 1500 -1800 कि. ग्राम/ हेक्टेयर होती है।बीज प्रकन्द को 30 मिनट तक 0.3%(3ग्राम/लीटर पानी) मैनकोजेब से उपचारित करने के पश्चात 3-4 घंटे छायादार जगह में सुखाकर 20-25 से.मीटर की दूरी पर बोते हैं । पंक्तियों की आपस में बीच की दूरी 20-25 से.मीटर रखना चाहिए। बीज प्रकन्द के टुकड़ों को हल्के गढ्डे खोदकर उसमें रखकर तत्पश्चात् खाद (एफ वाई एम) तथा मिट्टी डालकर समान्तर करना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

बुआई के समय 25-30 टन/हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह अपघटित गोबर खाद या कम्पोस्ट को बडों के ऊपर बिखेर कर अथवा बुआई के समय बड़ों में छोटे गढ्डे करके उसमें डाल देना चाहिए। बुआई के समय 2 टन/ हेक्टेयर की दर से नीम केक का उपयोग करने से प्रकांड गलन रोग तथा सूत्रकृमियों का प्रभाव कम होता है जिससे उपज बढ़ जाती है ।

भारतीय मसाला फसल अनुसन्धान संस्थान,कोझिकोड

अदरक के लिए संस्तुत उर्वरकों की मात्र 75 कि. ग्राम नाइट्रोजन, 50 कि.ग्राम पि2 ओ5और 50 कि.ग्राम के2ओ /हेक्टेयर है । इन उर्वरकों को विघटित मात्रा में डालना चाहिए (तलिक3)। प्रत्येक बार उर्वरक डालने के बाद उसके ऊपर मिट्टी डालना चाहिए। जिंक की कमी वाली मिट्टी 6 कि.ग्राम जिंक/हेक्टेयर (30 कि.ग्राम जिंक सल्फेट/हेक्टेयर ) डालने से अच्छी उपज प्राप्त होती है।

खेती के लिए उर्वरकों का विवरण

तालिका 3: अदरक की खेती के लिए उर्वरकों का विवरण (प्रति हेक्टेयर)

उर्वरक आधारीय उपयोग 40 दिन पश्चात् 90 दिन पश्चात्

 

नाइट्रोजन 37.5 कि.ग्राम 37.5 कि.ग्राम
पि5 5 50 कि. ग्राम
के2 2.5 कि.ग्राम 2.5 कि.ग्राम 2.5 कि.ग्राम
कम्पोस्ट /गोबर खाद 25-30 टन
नीम केक 2 टन

झपनी

मिट्टी के बहाव को भरी वर्षा से बचाने के लिए बडों के ऊपर हरे पत्तों अथवा खेतों के अन्य अवशेषों की झापनी करना चाहिए । इससे मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है और फसल काल के बाकी समय आद्रता बनी रहती है। बुआई के समय 10-12 टन/हेक्टेयर की दर से हरे पत्तों से झापनी करना चाहिए। बुआई से 40 और 90 दिनों के बाद घासपात निकलने और उर्वरक डालने के तुरंत बाद 7.5 टन/ हेक्टेयर की दर से दोबारा झपनी करनी चाहिए ।

घासपात

उर्वरक डालने और झपनी करने पहले घासपात को निकल देना चाहिए। घासपात को घनत्व के आधार पर 2-3 बार निकलना चाहिए। पानी के उपयुक्त निकास के लिए नाली बनाना चाहिए ताकि खेतों में पानी जमा ने हो सके । बुआई से 40 और 90 दिनों के बाद घासपात निकलने तथा उर्वरकों के डालने के बाद यदि प्रकन्द खुले हुए दिखाई देने लगें तो उनके ऊपर मिट्टी डालकर ढ़क देना चाहिए ताकि वह अच्छी तरह वृद्धि कर सके ।

मिश्रित फसल और फसल चक्र

अदरक की टेपियोका, रागी, पौडी जिंजल्ली, सब्जियों आदि फसलों के साथ फसल चक्र के रूप में खेती कर सकते हैं । कर्नाटक में नारियल, सुपारी, काफी और संतरों के साथ अन्त: फसल के रूप में अदरक की खेती की जा सकती है। टमाटर, आलू, मिर्च,बैंगन और मूंगफली आदि के साथ अदरक की खेती नहीं करना चाहिए। क्योंकि इन फसलों के पौधे म्लानी रोग के कारक रालस्टोनिया सोलानसीरम के परपोषी होते हैं ।

फसल संरक्षण

रोग

मृदु विगलन

मृदु विगलन अदरक का सबसे अधिक हानिकारक रोग हैं जिसके कारण सभी रोगबाधित पौधे नष्ट हो जाते हैं । यह रोग पाईथीयम अफानिडरमाटम के द्वारा होता है। पी.वेक्सान्स और पी.माइरिओटाइलम के द्वारा भी यह रोग होता हैं । दक्षिण पश्चिम मानसून के समय मिट्टी में नमी के कारण इसका प्रभाव अधिक होता है। इसका प्रभाव सर्वप्रथम आभासी तने के निचले भाग में होता है और फिर यह ऊपर की तरफ फैल जाता है। संक्रमित तने का निचला भाग पानी को सोख कर प्रकन्द तक पहुंचाता है जिससे यह रोग प्रकन्द में भी लग जाता है। बाद में यह रोग जड़ में भी फ़ैल जाता है। इसके बाह्रा लक्षणों में पत्तियों के अग्र भाग में पीलापन आ जाता है और यह धीरे-धीरे पूरी पत्ति पर फ़ैल जाता है। रोग की प्रारंभिक अवस्था में पत्तों का मध्य भाग हरा रहता है जबकि अगले भाग में पीलापन आ जाता है। यह पीलापन पौधे की सारी पत्तियों पर फ़ैल जाता है जिसके कारण पतियों सूख कर गिरने लगती हैं। इस रोग का नियंत्रण करने के लिए भंडारण के समय तथा बुआई से पहले बीज प्रकन्द को 0.3% मैन्कोजेब से 30 मिनट तक उपचार करना चाहिए । खेत में पानी का उपुक्त निकास होना चाहिए। खेत में पानी जमा होने के कारण इस रोग की समस्या और बढ़ जाती है। पानी के निकास के लिए नाली बना कर पानी का निकास अच्छी तरह करना चाहिए । ट्राईकोडरमा हरजियानम के साथ नीम केक 1 कि.ग्राम/बेड की दर से डालने पर इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। रोग ग्रसित पौधे को निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए और उसके चारों तरफ 0.3% मैन्कोजेब डालना चाहिए ताकि यह रोग और अधिक न फैले ।

जीवाणु म्लानी

यह रोग रालस्टोनिया सोलानसिरम बयोवाग -3 द्वारा दक्षिण पश्चिम मानसून के समय मिट्टी एवं बीज दारा उत्पन्न होता है। इसके लक्षण सर्वप्रथम आभासी तने के निचले हिस्से पर दिखाई पड़ते हैं और यह ऊपर की और बढ़ने लगते हैं। सबसे पहले निचली पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं बाद में धीरे-धीरे ऊपर वाली पत्तियां भी पीली पड़ जाती हैं। रोग बाधित तने के संवहनी (वास्कुलर) तंतु में गहरे रंग की लाइन पैड जाती हैं और प्रकन्द को दबाने पर उस में से दूध जैसे पदार्थ का स्राव होने लगता हैं । अत: अंत में प्रकन्द गल जाता है।

मृदु विगलन प्रबंध के लिए अपनाई गयी नियंत्रण विधियों को जीवाणु मल्नी के लिए भी उपयोग कर सकते हैं। बुआई के लिए प्रकन्दों को 30 मिनट तक स्ट्रेप्टो साईक्लिन(200 पीपीएम) से उचारित करके छायादार जगह में सुखा कर उपयोग करना चाहिए । इस रोग से बचाव के लिए 1%बोर्डियों मिश्रण या 0.2% कोप्पर ओक्सिक्लोराइड का बेडों पर छिड़काव करना चाहिए ।

पर्ण चित्ती रोग

पर्ण चित्ती रोग फाईलोस्टिक्टा जिंजीबरी के द्वारा होता हैं । यह रोग जुलाई से अक्तूबर के मध्य होता है। इस रोग की शुरुआत पत्तों पर सूखे पानी के धब्बे के रूप में होती है जो बाद में सफेद धब्बे के रूप में हो जाता है । जिसके चरों और गहरे भूरे रंग के किनारे होते हैं। यह धब्बे निरंतर बढ़ता रहता है। इस धब्बे पर पानी की बूंद पड़ने से यह रोग और भी प्रभावी हो जाता है। इस रोग का प्रभाव पौधे की वृद्धि पर पड़ता है। इस रोग का नियंत्रण करने के लिए 1%बोर्डियों मिश्रण या मैन्कोजेब (0.2%) का छिड़काव करना चाहिए ।

सूत्रकृमि

अदरक को हानि पहुंचाने वाले प्रमुख सूत्रकृमि जड़ गांठ(मेलोयिडोगाइन स्पीसीस), बोरोयंग (रेडोफोलस सिमिलस) तथा जड़ बिक्षित सूत्रकृमि(प्राटाइलेन्कस स्पीसीस) है । सूत्रकृमि ग्रसित पौधे के बाह्रा लक्षणों में पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, पौधा बौना रह जाता है,पौधा दुर्बल होकर सुख जाता है। जड़ विक्षित सूत्रकृमि ग्रसित जड़ में विक्षित निशान पड़ जाते हैं। जड़ गाँठ सूत्रकृमि ग्रसित पौधे की जड़ों में गांठे पड़ जाती हैं जिससे पौधे में जड़ गाँठ रोग हो जाता हैं । सूत्रकृमियों की उपस्थिति में प्रकांड गलन रोग बढ़ता है । इसको नियंत्रण करने के लिए प्रकन्द को गरम पानी से (50० से.) 10 मिनट तक उपचार करते हैं । सूत्रकृमि प्रतिरोधक प्रजाति जैसे आई आई एस आर महिमा का उपयोग करना चाहिए। बुआई के समय बेडों पर पौकोनिया क्लामिडोस्पेरिया (20 ग्राम /बेड 10 6 cfuग्राम) का छिड़काव करके सूत्रकृमियों की समस्या का समाधान किया जा सकता है।

कीट

तना बेधक

तना बेधक (कोनोगिथस पंक्तटफेरालिस) अदरक को हानि पहुंचाने वाला प्रमुख कीट हैं। इसका लार्वा तने को बेधकर उसकी आंतरिक कोशों को खा लेता है। इसके द्वारा भेदित तने के छिद्र से फ्रास निकलता है। पौधे की ऊपरी भाग की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं इसका वयस्क मध्यम आकार का होता है जिसमें 20 मि. मोटर शलभ युक्त नारंगी पीले रंग के पंख होंते हैं जिस पर सूक्ष्म काले चत्ती के निशान होते हैं । इसका लार्वा हलके भूरे रंग का होता हैं। इनका प्रभाव सितम्बर से अक्टूबर के बीच अधिक होता है ।

तना बेधक को 21 दिनों के अन्तराल पर जुलाई से अक्तूबर के मध्य 0.1% मैलथियोन का छिड़काव करके नियंत्रण किया जा सकता है जब कीट ग्रसित पौधे पर प्रत्यक्ष लक्षण दिखाई दें तब छिड़काव करना ज्यादा प्रभावी होता है।

राइजोम शल्क

राइजोम शल्क (अस्पिडियल्ला हरट्टी) खेत के अन्दर तथा भण्डारण में प्रकंदों को हानि पहुंचाते हैं। इसकी वयस्क मादा गोलबनाकर (लगभग1 मि.मीटर) हल्के भूरे रंग की होती है। यह प्रकन्द का सार चूस लेता है।जिससे प्रकन्द सुखकर मुरझा जाते हैं परिणामस्वरूप अंकुरण में समस्या आती है। इसकी रोकथाम के लिए प्रकन्द को भंडारण के समय और बुआई से पहले 0.075% क्विनालफोस से 20-30 मिनट तक उपचारित करते हैं। कीट ग्रसित प्रकन्द को भंडारण न करके उसे नष्ट कर देना चाहिए ।

लघु कीट

पत्ती लपेटकर के लार्वा (उदासपोस झोसल ) पत्तों को भेदकर काटते हैं तथा उसको खा लेते हैं । इसके वयस्क मध्यम आकर की तितली होती है जिसके सफेद चित्ती युक्त भूरे काले रंग के पंख होते हैं इसके लार्वा गहरे रंग का होता हैं । जब इस कीट का प्रकोप अधिक हो तब कार्बरिल (0.1%) या डाईमिथोट (0.05%) का छिड़काव करके इसका नियत्रण किया जा सकता है।

जड़ बेधक मुख्यतः नरम प्रकन्द, जड़े और आभासी तने के निचले हिस्से को खाते हैं जिसके कारण पत्तियों में पिलापन आ जाता है और पौधा सूखने लगता है । इस कीट का नियंत्रण करने के लिए क्लोरीपाईरिफोस (0.075%)का मिट्टी में छिड़काव करते है।

जैविक खेती

परिवर्तन काल

प्रमाणित जैविक उत्पादन के लिए फसलों को कम 18 महीने जैविक प्रबंधन के अधीन रखना चाहिए, जहाँ अदरक की दूसरी फसल को हम जैविक खेती के रूप में व्यय कर सकते हैं। अगर इस क्षेत्र के इतिहास के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं जैसे इस भूमि पर रसायनों का उपयोग नहीं किया गया है तो परिवर्तन काल को कम कर सकते हैं । यह जरूरी है कि पूरे फार्म में जैविक उत्पादन की विधि अपनाई गई हो लेकिन ज्यादा बड़े क्षेत्रों के लिए ऐसी योजना बनाए कि परिवर्तन योजना क्रमबद्ध हो ।

अदरक की फसल कृषि–बागवानी–सिलवी पद्धति का एक उत्तम घटक माना जाताहै। जब अदरक की नारियल,सुपारी,आम,ल्यूसियाना,रबड़,आदि के साथ खेती करते हैं तब फार्म की अनुपयोगी वस्तुओं का पुन: उपयोग कर सकते हैं । सब्जी फसलों या अन्य के साथ इसकी खेती करना चाहिए जिससे इस में शक्ति युक्त पोषक तत्व बनते हैं जो कीटों या रोगों से लड़ने में सहायक होते हैं। यदि मिश्रित फसल की खेती कर रहें हैं तो ये जरूरी है कि सारी फसलों का उत्पादन जैविक विधि के अनुसार हो।

जैविक उत्पादन के खेत को आसपास के अजैविक खेतों से दूषित होने से बचाने के लिए उचित विधि अपनाना चाहिए जो फसलें अलग से बोई जा रही हैं उनको जैविक फसलों की श्रेणी में नहीं रख सकते। बहावदार जमींन में बराबर के खेतों से पानी और रसायनों के आगमन को रोकने के लिए पर्याप्त उपाय करना चाहिए। मिट्टी को पानी से पर्याप्त सुरक्षा देने के लिए गढ्डे को खेत के बीच-बीच में बनाते हैं जिस से पानी का बहाव कम हो जाता है। निचली स्तर की भूमि में गहरे और बड़े गढ्डे खोद कर जल भराव से बचना चाहिए ।

प्रबंधन पद्धतियाँ

जैविक उत्पादन के लिए ऐसी परम्परागत प्रजातियों को अपनाते हैं जो स्थानीय मिट्टी और जलवायु की स्थिति में प्रतिरोधक या कीटों, सूत्रकृमियों और रोगों से बचाव करने में समर्थ हों । क्योंकि जैविक खेती में कोई कृत्रिम रासायनिक उर्वरक, कीटनाशकों या कवक नाशकों का उपयोग नहीं करते हैं। इसलिए उर्वरकों की कमी को पूरा करने के लिए फार्म की अन्य फसलों के अवशेष, हरी घास, हरी पत्तिया, गोबर, मुर्गी लीद आदि को कम्पोस्ट के रूप में तथा वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करके मृदा की उर्वरता उच्च स्तर तक बनाते हैं। एफ.वाई.एम. 40 टन/हेक्टेयर और वर्मी कम्पोस्ट 5-10 टन/हेक्टेयर का उपयोग करते हैं तथा 12-15 टन/हेक्टेयर की दर से 45 दिनों के अन्तराल पर छपनी करते हैं। मृदा परीक्षण के आधार पर फासफ़ोरस और पोटेशियम की न्यूनतम पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में चूना,रॉक फासफेट और राख डालकर पूरा करते हैं । सूक्ष्म तत्वों के अभाव में फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है। मानकता सीमा या संगठनों के प्रमाण पर सूक्ष्म तत्वों के स्रोत खनिज या रसायनों को मृदा या पत्तियों पर उपयोग कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त ओयल केक जैसे नीम केक (2 टन/हेक्टेयर) कम्पोस्ट किये कोयारपिथ (5 टन/हेक्टेयर) और अजोस्पिरिल्लम का कल्चर्स और फोसफेट सोलुबिलाइसिंग का उपयोग करके उत्पादकता में वृद्धि करते हैं ।

जैविक खेती की प्रमुख नीति के अनुसार कीटों और रोगों का प्रबन्धन जैव कीटनाशी, जैविकनियंत्रण कारकों एवं फाईटोसेनेट्री का उपयोग करके करते हैं । नीम गोल्ड या नीम तेल (0.5%) का 21 दिनों के अन्तराल पर सितम्बर से अक्तूबर के बीच को जुलाई से अक्तूबर के मध्य पौधों पर छिड़कने से तना बेधक को नियंत्रित किया जा सकता है ।

स्वस्थ प्रकन्द का चयन,मृदा सौरीकरण, बीज उपचार और जैव नियंत्रण कारकों जैसे, ट्राईकोडरमा या प्स्युडोमोनास को मिट्टी में उचित वाहक मिडिया जैसे कोयारपिथ कम्पोस्ट, सुखा हुआ गोबर या नीम केक को बुआई केक समय अथवा नियमित अन्तराल पर डालने से प्रकन्द गलन रोग की रोकथाम की जा सकती है। अन्य रोगों का नियंत्रण करने के लिए प्रति वर्ष 8 कि.ग्राम /हेक्टेयर की दर से कोपर का छिड़काव करते हैं। जैव कारकों जैसे पोकोंनिया क्लामाईडोस्पोरिया के साथ नीम केक के डालने से सूत्रकृमियों का नियंत्रण कर सकते हैं ।

प्रमाणीकरण

जैविक खेती के अंतगर्त जैविक घटकों की आवश्यकता गुणवत्ता को भैतिक और जैविक प्रक्रियाओं द्वारा बनाए रखते है । इन प्रक्रियाओं में उपयोग होने वाले सारेे घटक और कारक प्रमाणित और कृषि आधारित उत्पादित होना चाहिए । अगर प्रमाणित और कृषि आधारित उत्पादित घटक पर्याप्त मात्रा और उच्च गुणवत्ता में उपलब्ध न हों तो विकल्प के रूप से प्रमाणित अजैविक सामग्रियों का उपयोग कर सकते हैं ।

जैविक खेती उत्पादकों की जैविक स्थिति का विवरण लेविल पर स्पष्ट अंकित करना चाहिए । बिना सूचना लेबिल के जैविक और अजैविक उत्पादकों को एक साथ भंडारण और ढुलाई नहीं करना चाहिए ।

प्रमाणिकता और लैबलिग एक स्वतंत्र निकाय द्वारा करानी चाहिए जो उत्पादक की गुणवत्ता की पूर्णत: जिम्मेदारी ले । भारत सरकार में छोटे और सीमित उत्पादन करने वाले किसानों के लिए देशी प्रमाणित प्रणाली बनाई है। जिस के अंतगर्त एपीडा और मसाला बोर्ड द्वारा गठित प्रमाणित एजेंसियां जो वैध जैविक प्रमाण पत्र जारी करती हैं। इन प्रमाणित एजेंसियों द्वारा निरीक्षकों की नियुक्ति की जाती है जो खेतों पर जाकर निरिक्षण करता है और विवरणों (अभिलेखों ) को रजिस्टर में लिख कर रखता है। इन अभिलेखों की आवश्यकता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए होती है। विशेषकर जब परंपरागत और जैविक दोनों प्रकार की फसल की खेती करते हैं। भौगोलिक निकटता वाले लोग जो उत्पादन और प्रकिया को एक ही विधि करते है उनके लिए सामूहिक प्रमाण पत्र कार्यक्रम भी उपलब्ध हैं ।

खुदाई

बुआई के आठ महीने बाद जब पत्ते पीले रंग के हो जाये और धीरे-धीरे सूखने लगे तब फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। पौधों को सावधानीपूर्वक फावड़े या कुदाल की सहायता से उखड़ कर प्रकंदों को जड़ और मिट्टी से अलग कर लेते हैं । अदरक को सब्जी के रूप में उपयोग करने के लिए उसे छठवें महीने में ही खुदाई करके निकाल लेना चाहिए । प्रकन्दों को अच्छी तरह धो कर सूर्य के प्रकाश में कम से कम एक दिन सुखा कर उपयोग करना चाहिए ।

सुखा हुआ अदरक प्राप्त करने के लिए बुआई से आठ महीने बाद खुदाई करते हैं प्रकंदों को 6-7 घंटे तक पानी में डूबोकर उसको अच्छी तरह साफ़ करते हैं । पानी से निकाल कर उसको बांस की लकड़ी (जिसका एक भाग नुकीला होता हैं ) से बाहरी भाग को साफ करते हैं । अत्यधिक साफ करने से तेलों के कोशों को हानि पहुंचाते हैं। अत: प्रकन्द को सावधानी पूर्वक साफ़ करना चाहिए। छिले हुए प्रकन्द को धोने के बाद एक सप्ताह तक सूर्य के प्रकाश में सुखा लेते हैं।अदरक की उपज ,प्रजाति एवं क्षेत्र आधारित होती हैं जहाँ पर फसल उगाई जाती है।

नमकिला अदरक दूसरों की अपेक्षा कम रेशे वाली होती है । नरम प्रकंदों को अच्छी तरह साफ़ करके 1% सिट्रिक एसिड तथा 30% नमक के घोल में डूबा कर रख देते हैं । चौदह दिन बादयह उपयोग के लिए तैयार हो जाती है। इसका भंडारण ठंडी जगह पर करना चाहिए ।

भण्डारण

अच्छा बीज करने के लिए प्रकन्द को छायादार जगहों पर बने गढ़ड़ों में भण्डारण करते हैं। जब फसल 6-8 महीने की हरी अवस्था में हो तो खेत में स्वस्थ्य पौधों का चयन कर लेते हैं। बीज प्रकन्द को 0.075% क्विनाल्फोस तथा 0.3% मैन्कोजेब के घोल में 30 मिनट उपचार करके छायादार जगह में सुखा लेते हैं। बीज प्रकंदों को सुविधानुसार गढ्डे बनाकर भंडारण करते हैं। इन गढ्डे की दीवारे को गोबर से लेप देते हैं। गढ्डों में एक परत प्रकन्द फिर 2 से.मीटर रेत /बुरादा की परत में रखते हैं। पर्याप्त वायु मिलने के लिए गढ्डों के अन्दर पर्याप्त जगह छोड़ देते हैं। इन गढ्डोंं को लकड़ी के तख्ते से ढक देते हैं। इन तख्तों को हवादार बनाने के लिए इनमें एक या दो छेद करते हैं।बीज प्रकन्द को लगभग 21 दिनों के अन्तराल पर देखना चाहिए मुझाये या रोग बाधित प्रकन्द को निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए। प्रकंदों को मैदान के छायादार जगह में भी गढ्डे बनाकर भण्डारण किया जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में किसान गलाईकोसमिस पेंटाफ़ाइला (पेनल ) की पत्तियों का उपयोग अदरक के बीज प्रकंदों के भंडारण के लिए करते हैं ।

स्त्रोत:भारतीय मसाला फसल अनुसंधान संस्थान(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) कोझीकोड,केरल

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