खुर गलन रोग (फुट रोट)

यह रोग मुख्यतः दक्षिण पश्चिम मानसून के समय फाईटोफथोरा कैप्सीसी नामक कवक के द्वारा होता है। यह रोग अन्य रोगों की अपेक्षा अधिक विनाशकारी है।सामान्यत: इस रोग का प्रभाव पौधे के सभी भागों पर पड़ता है। इस रोग के लक्षण पौधे के विभिन्न भागों पर स्थान विशेष होते हैं।

लक्षण

  • पत्तियों पर एक या उससे अधिक काले रंग की चित्ती पड़ जाती हैं। जिनका बाद में आकार बढ़ जाता है। अंत में पत्ती सुख कर टूट जाती हैं।
  • जमीन के सहारे तने से नई निकली हुई पत्तियों तथा नये तने का ऊपरी भाग संक्रमन के कारण काला हो जाता है। वर्षा काल में पानी की बूंदों की बौछार पड़ने पर यह रोग पूरे पौधे की पत्तियों तथा तने पर फ़ैल जाता है ।
  • पौधे का निचला भाग संक्रमित होने पर पौधा मुरझा जाता है। तत्पश्चात पत्तियां टूटकर गिर जाती है। स्पाईक काले चित्ती युक्त अथवा चित्ती रहित होती है। पौधे की शाखाएं गांठों से टूट कर गिर जाती हैं तथा पूरा पौधा एक माह में नष्ट हो जाता है ।
  • अगर पोषक जड़ों की हानि सीमित है तब इस रोग के लक्षण बारिश के उपरान्त देर से प्रकट होते हैं।यह रोग प्राय: अक्तूबर-नवम्बर माह के बाद होता है। संक्रमित पौधे वर्षा के उपरान्त पूर्व स्थिति में आ सकते हैं तथा दो से अधिक ऋतु कालो या जड़ों के अधिकतम संक्रमण होने तक जीवित रह सकते हैं।

प्रबंधन

एकीकृत रोग प्रबंधन नीतियाँ अपनाकर इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है ।

फाइटोसेनिटेशन

  • संक्रमित पौधों को जड़ सहित खेत से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि रोगजनक की संख्या में वृद्धि न हो सके।
  • रोग रहित रोपण सामग्री का उपयोग करना चाहिए तथा पौधशाला में रोग प्रबंधन के लिए घुमित या सौरिकृत मृदा का उपयोग करना चाहिए ।

परम्परागत प्रबंधन विधियां

  • खेतों में जल भराव को कम करने के लिए पर्याप्त पानी के निकास की सुविधा प्रदान करनी चाहिए ।
  • उपचार के समय मृदा को हटाते समय काली मिर्च के पौधे की वृद्धि ऊपर की तरफ हो। यह भी अतिआवश्यक है की शाखाओं को जमीन के सहारे न बढ़ने दें ।
  • सहायक वृक्ष की अनावश्यक शाखाओं को मानसून शुरू होने से पहले काटना चाहिए,ताकि पौधे की उचित सूर्य प्रकाश मिल सके एवं अत्यधिक आर्द्रता न होने पाये। सूर्य के प्रकाश में आर्द्रता को कम करके पत्तियों के संकरण में कमी की जा सकती है।

रासायनिक प्रबंधन

  • मानसून (मई–जून) की कुछ वर्षा होने के बाद, पौधे के आधारीय भाग (45-50 से.मी. व्यास ) 5-10 लीटर 0.2 % कोप्पर ओक्सिक्लोराइड/पौधे की दर से उपचारित करना चाहिए।पौधे के ऊपरी भाग पर1% बोर्डियों मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए।इन दोनों रसायनों का छिड़काव अगस्त-सितम्बर माह के दौरान फिर से करना चाहिएयदि वर्षा अक्टूबर तक होती है तब तीसरी बार इन रसायनों का छिड़काव करना चाहिए ।
  • मानसून की कुछ वर्षा के बाद, सभी पौधों पर 5-10 लीटर 0.3 % पोटेशियम फास्फेट से प्रति पौधे की दर से मृदा को उपचारित तथा पौधे के ऊपरी भाग पर छिड़काव करना चाहिए।ये दोनों उपचार अगस्त-सितम्बर माह में भी अपनाना चाहिए। यदि मानसून या वर्षा अक्तूबर तक होती है तब तीसरी बार इस विधि को अपनाना चाहिए ।
  • मानसून की कुछ वर्षा होते ही, सभी पौधों पर 5-10 लीटर 0.125% मेटालैक्सिल –मैन्कोजिब प्रति पौधा की दर से मृदा को उपचारित तथा पौधे के ऊपरी भाग पर छिड़काव करना चाहिए ।
  • मई –जून माह में मानसून प्रारम्भ होने पर 50 ग्राम/पौधा की दर से ट्राईकोडरमा को पौधे के आधारीय भाग में चारों और डालना चाहिए। पौधे की ऊपरी भाग 0.3 % पोटेशियम फोस्फेनेट या1% बोर्डियों मिश्रण का भी छिड़काव करना चाहिए। इस उपचार प्रकिया को अगस्त–सितम्बर माह में फिर से अपनाना चाहिए ।

पोल्लु रोग (एनथ्राक्नोज)

यह रोग कोलीटोट्राकम ग्लोईओस्पोइडस नामक कवक के द्वारा होता है।रोग ग्रसित वेरी को लक्षणों के आधार पर इसको पोल्लु बीटल कीट द्वारा बाधित बेरी से अलग पहचान कर सकते हैं।यह रोग मानसून के अंत में होता है।रोग की प्रारम्भिक अवस्था के दौरान बेरी पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, बाद में ये धब्बे धीरे-धीरे बढ़ कर पूरी वेरी में फ़ैल जाते हैं।बेरी सड़ कर काली होकर सुख जाती है। यह रोगजनक पत्तियों को भी हानि पहुंचाता है।जिससे पत्तियों पर अनियमित आकार की भूरे रंग की चित्ती पड़ जाती है ।

प्रबंधन

इस रोग की 1 % बोर्डियों मिश्रण या कारबोडिजियम +मैनकोजिब (0.1%) का छिड़काव करके रोकथाम की हो सकती है ।

स्पाईक का झड़ना

कोडागु और इदुकी जैसे ऊँचे स्थानों पर पन्न्युर -1 में स्पाईक का झड़ना मुख्य समस्या के रूप में सामने आई है। जब मानसून देरी से आता है और जून-जुलाई माह में फुल और स्पाईक निकलना शुरू होती है तब यह समस्या अत्यधिक हानिकारक होती है।स्पाईक मुख्यतः द्विलिंगी पुष्पों के स्थान पर केवल मादा पुष्पों की उत्पादन करता है। परागण के अभाव तथा एन्थ्राकनोज के कारण भी अधिक स्पाईक गिर जाती हैं।

प्रबंधन

मार्च के द्वितीय सप्ताह में 1% बोर्डियो मिश्रण या कारबोडिजियम +मैनकोजिब (0.1%) का छिड़काव करके स्पाईक के झड़ने को कम कर सकते हैं।

स्टन्ट रोग

यह रोग विषाणुओ के द्वारा होता है इसका प्रकोप केरल के कन्नूर, कासरगोड,कोषिक्कोड,वयानाडू एवं इदुक्की जिलों तथा कर्नाटक के कोडगु, हासन और उत्तर कन्नडा जिलों के कुछ भागों में अंकित किया है। रोग ग्रसित पौधे के विभिन्न भागों पर छोटी गांठें प्रकट होती हैं।पत्तियां छोटी, संकुचित चमड़े की तरह ऐठी हुई झुरियों के समान हो जाती हैं। कभी-कभी पत्ती पर हरिहमिन चित्ती तथा रेखायें भी पड़ जाती हैं।धीरे-धीरे रोग ग्रसित पौधे की उपज कम होने लगती है। यह रोग दो विषाणु कुकुम्बर मोजाइक विषाणु तथा बैडनावाईरस के द्वारा होता है। मुख्यतः यह रोग विषाणु संक्रमित रोपण सामग्री के उपयोग से फैलते हैं। यह रोग एफिड तथा मिलीबग जैसे कीटों द्वारा भी फैलता है ।

प्रबंधन

इस रोग को कम करने के लिए निम्नलिखित विधिया संस्तुत की गई हैं-

  • विषाणु रहित स्वस्थ रोपण सामग्रियों का उपयोग करना चाहिए।
  • पौधों का नियमित निरिक्षण करते रहना चाहिए ।यदि संक्रमित पौधे दिखाई दे तो उसे निकल कर जलाना अथवा जमीन के अन्दर गाड़ना चाहिए
  • एफिड तथा मिलीबग जैसे कीटों को नियंत्रित करने के लिए डाईमिथेट (0.05%) का छिड़काव करना चाहिए ।

फाईलोडी रोग

यह रोग फाईटोप्लासमा के द्वारा होता है। मुख्यतः यह केरल के कोझिकोड एवं वायनाड जिले में अंकित किया गया है ।संक्रमित पौधे की स्पाईक पर विभिन्न प्रकार की विकृति हो जाती है ।संक्रमित पौधे के फूलों की कुछ कलियाँ छोटी पत्तियों जैसे आकार में परिवर्तित हो जाती हैं ।यह फाईलीडी रोग का प्रमुख लक्षण है ।अत्यधिक संक्रमित पौधे से उपज प्राप्त नहीं होती तथा पूरी स्पाईक छोटी शाखाओ में परिवर्तित हो जाती है,जिससे हरिहमिन दिखाई पड़ता है। अत: पौधा जल्दी ही सुख कर गिर जाता है। संक्रमित पौधा 2-3 वर्ष बाद उपज रहित हो जाता है। संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि यह रोग अन्य पौधों में न फ़ैल सके ।

मंद पतन रोग

मंद पतन रोग काली मिर्च की फसल को हानि पहुँचने वाले प्रमुख रोगों में से एक है। यह रोग पादप सूत्रकृमि जैसे रेडोफोलस सिमिलस तथा मेलेडोगनिटा के कारण पत्तों का पीलापन,पत्तियों का सुख कर गिरना तथा मुरझाना जैसे प्रमुख बाह्य लक्षण हैं ।रोग बाधित पौधे की जड़ों का विकास नहीं हो पता तथा अक्तूबर माह के बाद जब मृदा में आर्द्रता की कमी होती है तब पत्तों में पिलापण आ जाता है ।मई – जून माह में दक्षिण – पश्चिम मानसून के समय कुछ संक्रमित पौधों में फिर से नई पत्तियों का निर्गमन होता है ।परन्तु मानसून समाप्त होने के बाद संक्रमित पौधों की उपज कम होने लगती है ।सूत्रकृमि ग्रसित पौधे की पोषक जड़े कमजोर होने लगती है और एक सिमित अवधि के बाद पौधे पर बाह्य लक्षण दिखाई देने लगते है ।रोग बाधित पौधों की जडो में विभिन्न आकर की चित्ती तथा गांठे पड़ जाती है ।यह सूत्रकृमि या पी.कैप्सिसी अकेले अथवा दोनों मिलकर पोषक जडो को हानि पहुंचाते है ।अत : इस रोग का नियंत्रण करने के लिए कवकनाशी तथा सूत्रकृमिनाशक संयुक्त रूप से उपयोग करना चाहिए ।

प्रबंधन

  • अत्यधिक संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए ।
  • रोपण के लिए तैयार किये गये गढ़डो में रोपण के समय फोरेट (10जी )* 15 ग्राम प्रति गढ्ढा या कारवोफयुरान (3जी )* 50 ग्राम प्रति गढ्डे से उपचारित करना चाहिए ।(* केरल में प्रतिबंधित ) ।
  • सूत्रकृमि रहित रोपण सामग्री, घुमित अथवा सौरीकृत पोटिंग मिश्रण का उपयोग रोपण करने के लिए करना चाहिए ।
  • मानसून के आरम्भ होते ही मई- जून तथा सितम्बर- अक्तूबर में फोरेट (10 जी )* 100 ग्राम प्रति बेल को दर बेल को दर से पौधे के आधारीय भाग की मृदा को उपचारित करना चाहिए।इसके अतिरिक्त पोप्पर ओकेसिकलोराइड (0.2 %) या पोरोशियम फोस्फोनेट (0.3%) या मेटालेकसिल –मैनकोजिब (0.125%)से भी उपचारित करना चाहिए (*केरल में प्रतिबंधित ) ।

वह क्षेत्र जहाँ जड़ गाँठ सूत्रकृमि पौधों को हनी पहुंचता है,वहां सूत्रकृमि प्रीतरोधक प्रजाति पौरणमी को खेती के लिए उपयोग करना चाहिए ।पोकोनिया क्लैमाईडोस्पोरिया या ट्राईकोडरमा ह्र्जियानम जैसे जैव नियंत्रण कारको को 50 ग्राम / पौधा की दर वर्ष में डो बार (अप्रैल –मई और सितम्बर –अक्तूबर ) से उपचारित करना चाहिए ।इस कवक की मात्रा 108 सीएफयु /ग्राम होना चाहिए ।सूत्रकृमि नाशक रसायनों का उपयोग करते समय बहुत सावधानीपूर्वक पौधों के आधारीय भाग की मिट्टी को हटाते है ताकि जडो को हानि न पहुचे ।उपचार के तुरंत बाद जडो को मिट्टी से ढक देना चाहिए ।उपचार के समय मृदा में आवश्यक आर्दता होना चाहिए ।सूत्रकृमि सुरक्षा उपायों को रोग की प्रारंभिक आवस्था में अपनाना चाहिए ।

काली मिर्च की फसल को हानि पहुँचाने वाले कीट एवं प्रबंधन

पोल्लु बीटल

पोल्लु बुटाल (लंका रामकृष्णनाइ ) काली मिर्च की फसल को हानि पहुचाने वाला प्रमुख कीट है ।मलयालम में पोल्लु का अर्थ है खोखला ।यह कीट मैदानी भागों तथा 300 मीटर तक ऊंचाई वालो क्षेत्रो में काली मिर्च की फसल को अधिक हानि पहुंचाते है ।इसका उयास्क लगभग 2.5 मी. मी. x 1.5 मि. मि. आकार का होते है ।पूर्ण विकसित सुंडी कृमि सफेद रंग की लगभग 5 मि. लंबी होती है ।इस कीट की व्यस्क बीटल, पौधे की नरम पत्तियों तथा स्पाईक को खाकर हानि पहुंचाती है ।मादा नई स्पाईक तथा बेरी पर अंडे देती है ।इसकी सुंडी बेरी में छेद करके उसके तन्तुओ को खाती है ।अत: कीट बाधित स्पाईक काली होकर सड़ जाती है ।इसके द्वारा बाधित बेरी भी काले रंग में बदल जाती है तथा दबाने से टूट जाती है ।बागों में छ्यादार जगहों तथा सितम्बर –अक्तूबर के समय इस कीट का प्रकोप अधिक होता है ।

प्रबंधन

छाया को पौधों पर कम करने से इस कीट का प्रभाव कम हो जाता है ।इस कीट का नियत्रण करने के लिए जून –जुलाई रथ सितम्बर –अक्तूबर में 0.05% क्वानलफोस अथवा 0.06% निमगोल्ड (नीम आधारित कीटनाशक ) का छिड़काव अगस्त –सितम्बर तथा अक्तूबर माह में अधिक प्रभावी होता है ।पत्तियों के आंतरिक हिस्सो तथा स्पाईक पर अच्छी तरह छिड़काव करना चाहिए जहाँ मुख्यतः वयस्क कीट छिपे होते है ।

शिखर तना बेधक

शिखर तना बेधक (साईडिया हेमिडोक्सा ) काली मिर्च की पैदावार करने वाले सभी क्षेत्रों में नये पौधों को गभीर हानि पहुचाने वाला कीट है ।इसका वयस्क 10-15 मि.मि. आकार का छोटा सा पतंगा होता है ।इसके अग्र पंख तेज लाल एवं पीले तथा पश्च पंख भूरे रंग के होते है ।पूर्ण विकसित लार्वा 12-15 मि.मि. लम्बे भूरे –हरे रंग के होते है ।इसका लार्वा नई शाखाओ में छेड़ करके उसकी आंतरिक कोशों को खता है ।जिससे शाखाये काली पड़कर सुख जाती है ।जब यह कीट नई शाखाओ पर आक्रमण करता है तब इसका असर पौधे की वृद्धि पर पड़ता है ।यह कीट जुलाई से अक्तूबर के मध्य (जब अनेक नई शाखाये पौधे पर होती है ) अधिक हानि पहुंचता है ।

प्रबंधन

इस कीट को नियंत्रण करने के लिए नई शाखाओ पर 0.05% क्वानफोस का छिड़काव जुलाई से अक्तूबर के मध्य एक माह के अन्तराल पर करना चाहिए ।

लीफ गाल थ्रिप्स

लीफ गाल थ्रिप्स (लिओथ्रिप्स करनाई )कीट अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर नये पौधों को तथा मैदानी क्षेत्रो में पौधशाला के अन्दर अधिक हानि पहुंचता है ।इसके वयस्क काले रंग के 2.5 – 3.0 मि.मि. लम्बे होते है इसका लार्वा तथा प्यूपा कृमि सफेद रंग के होते है ।थ्रिप्स पत्ती किनारे को अन्दर की तरफ मोरकर उसमे गांठे बनाती है ।जिसमे पत्ती की सिकुडी हुई आकृति बन जाती है ।अत्यधिक हानि होने पर पौधे की वृद्धि पर असर पड़ता है ।

प्रबंधन

खेत तथा पौधशाला में इसको नियंत्रण के लिए डाईमिथेट (0.05%) का छिड़काव करना चाहिए ।

शल्क कीट

काली मिर्च की फसल को विभिन्न प्रकार के शल्क कीट हानि पहुंचाते है ।

मसल शल्क की मादा 1 मि.मि. लम्बी गहरे भूरे रंग की तथा कोकोनट शल्क की मादा 1 मि.मि. व्यास की गोलाकर पीले भूरे रंग की होती है ।शल्क कीट गतिरोध होते है ।यह पौधों के किसी भी भाग पर स्थाई रूप से चिपक कर पौधों का रस चूस लेते है ।जिससे पौधे की नई पत्तियों तथा बेरी (फल) में पपड़ी पड़ जाती है ।जिससे पौधे में पीलापन आ जाता है तथा पौधा मुरझा जाता है । इनकी अत्यधिक वाधा होने पर पौधा सुख जाता है ।इसका प्रकोप मानसून के पश्चात ग्रीष्मकाल में अधिक होता है ।

प्रबंधन

अत्यधिक बाधित शाखाओ को कटकर नष्ट कर देना चाहिए ।इन कीटो को नियंत्रण करने के लिए बेरी की तुड़ाई के बाद 0.1% डाइमिथोट का छिड़काव तथा इसकी समस्या का पूर्णत: समाधान के लिए दोबारा 21 दिनों के उपरांत फिर से छिड़काव करना चाहिए ।इस कीट की प्रारंभिक अवस्था में ही प्रबंधन विधियों द्वरा नियंत्रण करना चाहिए। पौधशाला में 0.3% नीम ओयल या नीमगोल्ड (0.3%) या मछली गंधराल तेल (3%) का छिड़काव करके इन कीटो को नियंत्रण किया जा सकता है ।

अप्रधान कीट एवं प्रबंधन

पत्तियों को हानि पहुँचने वाला कीट, साईनिगीय स्पिसिस नये पौधे की पतियों तथा स्पाईक को हनी पहुंचता है ।इसके नियंत्रण करने के लिए 0.05%क्वानलफोस का छिड़काव करना चाहिए ।

मिलीबग, गाल मिडजस तथा एफिड्स कीट विशेषकर पौधशाला में नई शाखाओ को हानि पहूँचाते है ।इन कीटों का नियंत्रण करने के लिए 0.05% डाईमिथोट का छिड़काव करना चाहिए ।

जडो को हानि पहुँचाने वाली मिलीबग को 0.075% क्लोरोपाईरिफोस से मृदा उपचारित करने से नियंत्रण किया जा सकता है ।फाईटोफथोरा तथा सूत्रकृमियों के नियंत्रण के लिए किये गए उपचार इसको नियंत्रण के लिए भी पर्याप्त होते है ।

काली मिर्च की जैविक खेती

परिवर्तन योजना

प्रमाणित जैविक उत्पादन के लिए फसलो को कम से कम 18 महीने तक जैविक प्रबंधन के अधीन रखना चाहिए ।नए रोपण किये गये पौधों से तृतीय वर्ष में कलि मिर्च की प्रथम उपज प्राप्त होना प्रारम्भ हो जाती है ।इसे हम जैविक उत्पादन के रूप में विक्री क्र सकते है ।पहले से ही स्थापित पुराने पौधों को जैबिक उत्पादन में परिवर्तन करने के लिए 36 माह की अवधि का परिवर्तन काल आवश्यक है ।अगर जैविक खेत या क्षेत्र जहा खेती की जा रही है उस क्षेत के इतिहास के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है कि भूमि पर पहले कभी किसी रसायनों का प्रयोग नही किया गया है तो परिवर्तन काल के समय को कम कर सकते है ।यह आवश्यक है की पुरे फार्म में जैविक उत्पादन की विधि अपनाई जाये ।लेकिन ज्यादा बड़े क्षेत्रों के लिए ऐसी योजना बनाए की परिवर्तन योजना क्रमानुसार हो ।

अगर काली मिर्च की खेती एकल फसल के रूप में की गई है उस स्थिति में पूरी फसल को जैविक उत्पादन के लिए परिवर्तन कर सकते है ।परन्तु अगर काली मिर्च की फसल मिश्रित फसल के रुप में उगाई गई है , तब यह अतिआवश्यक है की सभी फसलों को जैविक उत्पादन विधि के अधीन रखना चाहिए ।काली मिर्च की फसल कृषि बागवानी तथा सिलबी – बग्वानी पद्धति का एक उत्तम घटक है ।

जब काली मिर्च को नारियल, सुपारी , कोफ़ी तथा रबड़ इत्यादि फसलों के साथ अंत : फसल के रूप में खेती कर रहे है तब फार्म की अनुपयोगी वस्तुओ को पुन : चक्रण करके उपयोग क्र सकते है ।हरी खाद फसलों के साथ इसकी अंत: फसल खेती भी कर सकते है ।जिससे इसमें शक्ति युक्त पोषक तत्वों का उत्पादन हो ।जैविक उत्पादन के खेत को आसपास के अजैविक खेतों से दूषित होने से बचाने के लिए उचित माध्यम अपनाना चाहिए ।जैविक खेतो को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए ।बहव्दर ढलान वाले स्थानों पर बराबर के खेतो से पानी और रसायनों के आगमन को रोकने के लिए पर्याप्त उपाय करना चाहिए ।छोटे-छोटे क्षेत्रो में काली मिर्च की खेती करने वाले निकटतम खेतों को एक बाह्य परिधि की आवश्यकता होती है ।

जैविक प्रबंधन विधियाँ

जैविक उत्पादन के लिए ऐसी परम्परागत को अपनाते है जो स्थानीय मिट्टी और जलवायु की स्थिति में प्रतिरोधक या कीटो , सूत्रकृमियों तथा रोगों से बचाव करने में समर्थ होती है ।क्योंकि जैविक खेती में कोई क्रत्रिम रासायनिक उर्वरकों , कीटनाशको या कवकनाशको का उपयोग नहीं करते है ।अत: उर्वरकों की कमी को पूरा करने के लिए फार्म की सभी फसलों के अवशेष, हरी घास , हरी पत्तियों, गोबर तथा मुर्गी लीद आदि को कम्पोस्ट के रूप में उपयोग करके मृदा की उर्वरता उच्च स्तर की बनाते है ।

पौधे की आयु के अनुसार एफ. वाई. एम. 5-10 कि. ग्राम/ पौधा के साथ-साथ केचुआ खाद या पत्तियों के कम्पोस्ट (5-10 कि.ग्राम/पौधा) को डालते है ।मृदा परीक्षण के आधार पर, फोसफोरस आयर पोटेशियम की न्यूनतम पूर्ति करने के लिए पर्याप्त मात्रा में चुना ,राक फोस्फेट और राख का उपयोग करते है ।इसके अतिरक्त ओयल केक जैसे नीम केक (1 कि.ग्राम/पौधा) कम्पोस्ट कोयर पीठ (2.5 कि.ग्राम/पौधा) या कम्पोस्ट कोफो का पल्प (पोटेशियम की अत्यधि मात्रा), अजोस्पाईरियलम तथा फोसफेट सोलुबिलाईसिंग जीवाणु का उपयोग उर्वरता और उत्पादकता में वृद्धि करते है ।पोषक तत्वों के आभाव में फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है ।मानकता सीमा या संगठनों के प्रमाण के आधार पर पोषक ततो के स्रोत खनिज/ रसायनों को मृदय पतियों पर उपयोग करते है ।

जैविक खेती की प्रमुख निति के अनुसार कीटों , सूत्रकृमियों और रोगों का प्रबंधन जैव कीटनाशक, जैव नियंत्रण कारक , कर्षण और फाईटोसेनिटरी उपायों का उपयोग करके करते है ।नीम गोल्ड (0.06%) को 21 दिनों के अंतराल पर जुलाई – अक्तूबर के मध्य में छिड़काव करने से पोल्लु बीटल कीट को नियंत्रण किया जा सकता है ।शल्क कीटों को नियंत्रण करने के लिए अत्यधिक बाधित शाखाओ को उखाड़ कर नष्ट क्र देना तथा नीम गोल्ड (0.6%) या मछली के तेल गन्धराल (3%) का छिड़काव करना चाहिए ।

जैव नियंत्रण कारको जैसे, ट्राईकोडरमा या प्युडोमोनस को मिट्टी में उचित वाहक मिडिया जैसे कोयार्पिथ कम्पोस्ट, सुखा हुआ गोबर या नीम केक के साथ उपचारित करने से कवक द्वारा उत्पान्न रोगों को नियंत्रण किया जा सकता है ।अन्य रोगों को नियंत्रण करने के लिए 1 % बोर्डियों मिश्रण तथा प्रीटी वर्ष 8 कि.ग्राम /हेक्टेयर की दर से कोप्पर का छिड़काव करना चाहिए ।जैव कारक जैसे, पोकोनिया क्लामाईडोस्पोरिया को नीम केक के साथ उपयोग करने से सूत्रकृमियों तथा मंद पतन रोग को नियंत्रण किया जा सकता है ।

प्रमाणीकरण

प्रमानिकरण तथा लेबलिंग एक स्वत्रंत निकाय द्वारा करनी चाहिए जो उत्पादक की गुणवता की पूर्णत: जिम्मेदारी ले ।भारत सरकार ने छोटे और सिमित उत्पादन करने वाले किसानो के लिए स्वदेशी प्रमाणित प्रणाली बनाई है ।जिसके अंतर्गत एपीडा द्वारा गठित प्रमाणित एजेंसिया बैध जैविक प्रमाण पत्र जारी करती है ।इन प्रमाणित एजेंसियों द्वारा निरिक्षको की नियुक्ति की जाती है ।जो खेतो पर जाकर निरीक्षण करके विवरण को रजिस्टर में लिखने के साथ-साथ कृषक खेत का मानचित्र , केट का इतिहास , तुड़ाई , भंडारण , कीट नियंत्रण , गतिविधियों , उपकरणों की सफाई टाटा लेबलिंग का पूरा व्यौरा रखता है ।इन अभिलेखों की आवश्यकता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए होती है ।विशेषकर , जब परंपरागत तथा जैविक दोनों प्रकार से खेती करते है ।भौगोलिक निकटता वाले एक ही वर्ग के लीग जो उत्पादन और प्रक्रिया को एक क्रम में करते है ।उनके लिए वर्ग प्रमाण पत्र हासिल करने का भी प्रावधान है

तुड़ाई एवं फसलोत्तर प्रबंधन

तुड़ाई

काली मिर्च पुष्पण के 6-8 माह उपरांत पक कर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है ।मैदानी क्षेत्रो में तुड़ाई नवम्बर –जानवरी तथा पहाड़ी क्षेत्रो में जनवरी –मार्च में करते है ।जब पुरो स्पाईक में एक या डो बेरी नारंगी रंग की हो जाये तब स्पाईक को पौधों से हाथों से तोड़ कर बैग में रखते है ।बेरी स्पाईक से अलग करके 7-10 दिनों के लिए सूर्य के प्रकाश में सुखाते है ।सामान्यत: स्पाईक की तुड़ाई बॉस की एक सीढी की सहायता से की जाती है ।अगर बेरी ज्यादा पाक कर खुद व खुद जमीन पर गिर जाती है ।जिससे अधि हानि होती ।अगर बेरी अपने आप टूट कर जमीन पर गिरे तब उन्हें अच्छी तरह साफ करके रखना चाहिए ।काली मिर्च का उपयोग अलग-अलग कार्यों के लिए किया जाता है ।अत: इसकी तुड़ाई का समय तालिका -3 में दिया गया है ।

तलिका 3 : विभिन्न प्रकार के उत्पादकों के लिए काली मिर्च की तुड़ाई का समय

तुड़ाई

उत्पादन तुड़ाई का समय
कैंद पेपर 4-5 माह
निर्जलीकृत हरी काली मिर्च परिपक्व होने से 10 -15 दिन पूर्व

 

ओलिओसरिन एवं एसनशियल ओयल परिपक्व होने से 15-20 दिन पूर्व

 

काली मिर्च स्पाईक में 1-2 बेरी पीले से लाल रंग की हो जाये
पेप्पर चूर्ण (पाउडर ) पूर्ण परिपक्व (स्टार्च साहित )

 

सफेद काली मिर्च पूर्ण परिपक्व

फलोत्तर प्रक्रिया

काली मिर्च की बेरी को तोड़ने के पश्चात विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाये जैसे , थ्रेसिंग, उबालना, सुखाना, सफाई , ग्रेडिंग तथा पैकिंग होती है ।काली मिर्च की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए इन प्रक्रियाओ को करते समय काफी सावधानी वर्तनी चाहिए ।किसी भी प्रक्रिया में अगर कोई कमी रह जाएगी तब काली मिर्च की गुणवत्ता पर काफी फर्क पड़ता है ।इससे कृषक को हानि होती है ।

थ्रेसिंग

सामान्यत : परम्परागत विधि द्वारा काली मिर्च की बेरियों को स्पाईक से मनुष्य अपने पैरो से कुचलकर अलग करते है ।यह विधि अन्शोधित, धीमी तथा अस्वस्थकार है ।इस प्रक्रिया द्वारा बेरी के साथ – साथ बाहरी पदार्थ, मिट्टी तथा गंदगी की भी आने की सम्भावना होती है ।जबकि वर्तमान में बेरी को स्पाईक से अलग करने के लिए 50 कि. ग्राम / घंटा से 2500 की. ग्राम / घंटा की क्षमता वाले थ्रेसर उपलब्ध है ।लेबर की कमी के कारण मुख्यतः इस प्रकिया के लिए यांत्रिक थ्रेसर को परम्परागत विधि की तुलना में प्रोत्साहित किया जाता है ।

उबालना / पकाना

काली मिर्च की गुणवत्ता को अच्छी करने के लिए वर्तन में रखे हुए उबल पानी में बेरियों को एक मिनट तक डूबाकर निकल लेते है ।इस प्रकिया के अन्य और भी लाभ है ।

  • सुखने के पश्चात बेरियो का रंग एक समान होता है ।
  • ग्राम पानी में दुवाने से बेरियों में अगर सूक्ष्म जीवों की समस्या होती है ।इस प्रक्रिया के बाद उनकी मात्रा कम होती है ।
  • बेरी सूखने में 3-4 दिन लेती है जबकि परम्परागत विधि द्वारा सूखने में 5-6 किन का समय लेती है ।
  • इस प्रकिया से बाहरी तत्वों एवं गंदगी को बेरी से अलग क्र सकते है ।

सुखाना

बेरी की तुड़ाई के समय उसमे 65-70 % तक जल की मात्रा उपलब्ध होती है ।बेरी को सुखाने के बाद उसमे जल की मात्रा को 10 % तक करना होता है ।कलोरेफिल की उपलब्धता के कारण परिपक्व बेरी का रंग हरा होता है ।सुखाने के समय, फिनोलेस एंजाइम के उत्प्रेरक प्रभाव के कारण वातावरणीय आक्सीजन द्वारा एंजाइम और फिनोलिक योगिकों का ऑक्सीकरण के कारण हरी काली मिर्च का रंग कला हो जाता है ।

परम्परागत प्रकिया में काली मिर्च की बेरी को सूर्य के प्रकाश में सुखाते है ।टूटी हुई बेरी को फर्श पर बिखेर कर 3-5 दिनों तक सूर्य के प्रकाश में सुखाकर जल की मात्रा को 10% तक करते है ।अगर बेरी में जल की मात्रा 12 जो मनुष्यों के लिए हानिकारक होती है ।अच्छी गुणवता वाली काली मिर्च प्राप्त करने के लिए बेरियों को सूखे , साफ़ सुथरे फर्श /बास की चटाई / प्लास्टिक शीट पर सूर्य के प्रकाश में 4-6 दिनों तक सुखाते है ।प्रजातियों अथवा कल्टीवरों के आधार पर लगभग औसतन 33 -37% सुखी उपज प्राप्त होती है ।काली मिर्च को सुखाने के लिए विभिन्न संस्थाओ द्वारा विकसित विभिन्न क्षमता वाले यांत्रिक ड्रायर भी उपलब्ध है जो बिजली और आग की सहायता से चलते है ।

सफाई एवं ग्रेडिंग

सुखी हुई काली मिर्च में स्पाईकों के टुकड़े, कंकर – पत्थर एवं मिट्टी का कण आदि भी होते है ।सफाई एवं ग्रेडिंग वह प्रकिया है जिसे अपनाकर हम उपज को अच्छा बना कर अधिक लाभ अर्जित क्र सकते है ।

सामान्यत: सफाई के लिए उपज को सूप की सहायता से फटककर तथा हाथों द्वारा मिलाबट को हटकर अलग करते है ।सफाई एवं ग्रेडिंग के लिए यांत्रिक उपकरण भी उपलब्ध है ।इस यंत्र में पंखा पीछे के भाग में सीधी दिशा में लगा होता है ।जिसकी हवा से इसके अन्दर, मौजूद गन्दगी, अपरिपक्व बेरी तथा अनवाशयक सिरों से ढनढल उडकर दूर ही जाते है ।

काली मिर्च की ग्रेडिंग के लिए विभिन्न प्रकार की छ्न्नीयों का उपयोग भी किया जाता है ।काली मिर्च के आकर के अनुसार उनकी निम्न ग्रेडिंग कर सकते है (तलिका 4)।

काली मिर्च की ग्रेडिंग

तालिका 4 : काली मिर्च की ग्रेडिंग`

ग्रेडिंग

आकार

तेली चेरी ग्रेवलड एक्स्ट्रा बोल्ड

4.2 मि.मि.

तेली चेरी ग्रेवलड

4.6 मि.मि.

मलबार ग्रेवलड

एम डी ग्रेड 1 तथा 2

मलबार अनग्रेवलड

ए यू जी ग्रेड 1 तथा 2

सफेद काली मिर्च (पेप्पर)

सफेद काली मिर्च तैयार करने की लिए आम तौर पर पूर्णत: परिपक्व लाल बेरियों को 7-8 दिनों तक पानी में भिगोंकर नरम किया जाता है ।जिसके बाद इसके बाहरी आवरण को आसानी से निकाल कर बेरी को धोकर सुखाकर उसमे जल की मात्रा 12 % तक बनाये रखते है ।सफेद काली मिर्च को परिपक्व हरी काली मिर्च तथा सामान्य काली मिर्च से भी किण्वन विधि द्वारा तैयार किया जा सकता है ।

पैकिंग

जैविक खेती द्वारा उत्पादित काली मिर्च को लेबल करके अलग पैकिंग करना चाहिए ।व्यवसायिक दृष्टि से बिभिन्न प्रकार की काली मिर्च को मिलकर पैकिंग करना लाभदायक नहीं है ।पैकिंग के लिए वातावरण हितौषी सामग्री जैसे साफ़ तट के बैग या मजबूत कागज के लिफाफे का उपयोग करना चाहिए ।प्लास्टिक बैगों का कम से कम मात्रा में उपयोग करना चाहिए ।पुन: चक्रित उपयोगी सामग्री का यथासम्भव उपयोग करना चाहिए ।

भंडारण

काली मिर्च प्रक्रितक आद्रताग्राही होने के कारण यह हवा से आद्रता का शोधन करती है ।मानसून के समय जब आद्रता अधिक होती है ।तब इसमे फूंफन्दी तथा कीटों की समस्या हो सकती है ।इसलिए भंडारण से पहले यह सुनिश्चित करले की इसकी बेरी में 10% से कम मात्रा में जल उपलब्ध है ग्रेडिंग के अनुसार काली मिर्च को अलग-अलग भंडारण करना चाहिए ।भंडारण के लिए बहु परत वाला कागज का लिफाफा अथवा मजबूत प्लास्टिक से बना हुआ बैग या जुट के बैगों का भी उपयोग क्र सकते है ।इन बैगो को फर्श पर मजबूत प्लास्टिक शीट बिछाकर बांस की चटाई पर रखते है ।

स्त्रोत:भारतीय मसाला फसल अनुसंधान संस्थान(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) कोझीकोड,केरल

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