बहुउपयोगी जिंस

जौ रबी ऋतु में उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण फसल है। देश के अनेक राज्यों जैसे उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात एवं जम्मू व कश्मीर में जौ की फसल उगायी जाती है। जौ की फसल अनेक उद्देश्यों जैसे दाने, पशु आहार, चारा तथा अनेक औद्यौगिक उपयोग (शराब,बेकरी,पेपर,फाइबर पेपर, फाइबर बोर्ड इत्यादि) के लिए उगायी जाती है। जौ के दाने में 10.6 प्रतिशत प्रोटीन 64 प्रतिशत कार्बोहाइडे्रट तथा 2.1 प्रतिशत वसा होती है। इसके 100 ग्राम दानों में 50 मिलीग्राम कैल्शियम, 6 मिलीग्राम आयरन, 31 मिलीग्राम विटामिन बी.1 तथा 0.10 मिलीग्राम विटामिन बी.2 व नियासीन की भी अच्छी मात्रा होती है। देश में जौ का उत्पादन लगभग 16 लाख टन होता है एवं इसकी फसल लगभग 8 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में प्रतिवर्ष उगायी जाती है तथा औसत उपज 20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर के लगभग है।
राजस्थान राज्य में जौ का उत्पादन लगभग 6.20 लाख टन होता है तथा इसकी खेती लगभग 2.25 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में प्रति वर्ष की जाती हैं लेकिन औसत उपज 27.50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर के लगभग है जो क्षेत्र में इसकी उत्पादन क्षमता से काफी कम है। जौ की खेती अधिकतर बारानी क्षेत्र मेंए कम उर्वरा शक्ति वाली भूमियों में क्षारीय एवं लवणीय भूमियों में तथा पछेती बुवाई की परिस्थितियों में की जाती है। लेकिन उन्नत विधियों द्वारा जौ की खेती करने से औसत उपज अधिक प्राप्त की जा सकती है।

जौ की उन्नतिशील प्रजातियाँ

द्दिल्कायुक्त छः धारीय प्रजातियाँ  मैदानी क्षेत्र

क्र.सं.

प्रजातियॉ

अधिसूचना की तिथि

उत्पादकता (कु०/हेक्टेयर)

पकने की अवधि

(दिनों में)

विषेश विवरण

१. ज्योति (के०५७२/१०) २५-२८ १२०-१२५ (विलम्ब से) सिंचित दशा विलम्ब से बुवाई हेतु कण्डुवा एवं स्टइप अवरोधी। मैदानी क्षेत्र हेतु उपयुक्त।
२. आजाद (के० १२५) २८-३२ ११०-११५ असिंचित दशा तथा ऊसरीली भूमि चारा तथा दाना के लियें उपयुक्त कण्डुआ एवं स्ट्राइप अवरोधी मैदानी क्षेत्र हेतु।
३. के०-१४१ ३०-३२ १२०-१२५ असिंचित दशा चारा एवं दाना के लिये उपयुक्त नीलाभ कण्डुआ एवं स्ट्राइप अवरोधी। मैदानी क्षेत्र हेतु।
४. हरितमा (के०-५६०) ३०-३५ ११०-११५ असिंचित दशा के लिये उपयुक्त समस्त रोगो के लिये अवरोधी समस्त उत्तर प्रदेश हेतु।
५. प्रीती (के० ४०९) ४०-४२ १०५-११२ सिंचित दशा हेतु जौ की प्रमुख बीमारियों के प्रति अवरोधी। समस्त उत्तर प्रदेश हेतु।
६. जागृति (के० २८७) ४२-४५ १२५-१३० सिंचित दशा में कण्डुआ एवं स्ट्राइप अवरोधी। उ०प्र०का मैदानी क्षेत्र हेतु।
७. लखन (के० २२६) ३०-३२ १२५-१३० अंसिचित दशा के लिए उपयुक्त नीलाभ कण्डुआ एवं स्ट्राइप अवरोधी मैदानी क्षेत्र हेतु।
८. मंजुला(के० ३२९) २८-३० ११०-११५ पद्देती बुवाई हेतु नीलाभ कण्डुआ अवरोधी उ०प्र० का समस्त मैदानी क्षेत्र हेतु।
९. आर०एस०-६ २५-३० सिंचित

२०-२२ असिंचित

१२०-१२५

११०-११५

सिंचित असिंचित तथा विलम्ब से बुवाई हेतु कण्डुआ तथा स्ट्राइप आशिंक अवरोधी। बुन्देलखण्ड क्षेत्र हेतु।
१०. नरेन्द्र जौ १ (एन०डी०बी० -२०९) ९२ (ई.) ०२.०२.०१ २५-३०
सिचित
११०-११५ समस्याग्रस्त ऊसर भूमि के लिए उपयुक्त जौ की प्रमुख बीमारियों के लिए अवरोधी
११. नरेन्द्र जौ २

(एन०डी०बी० -९४०)

९२ (ई.) ०२.०२.०१ ४०-४५
सिचित
समय से
११०-११५ सिंचित समय से बुवाई के हेतु जौ की प्रमुख बीमारियों के लिए अवरोधी
१२. नरेन्द्र जौ ३ (एन०डी०बी०-१०२०) ९३७ (ई.) ०४.०९.०२ २५-३० ११०-११५ समस्याग्रस्त ऊसर भूमि के लिये उपयुक्त कण्डुआ के लिए अवरोधी
१३. आर०डी०-२५५२ ३०-४० १२०-१२५ लवणीय भूमियों के लिये उपयुक्त
१४. के० ६०३ ३०-३५ १२०-१२२ असिंचित दशा के लिए उपयुक्त समस्त रोगो के लिये अवरोधी।
१५. एन०डी०बी०-११७३ एस. ओं. १२ ई० ०४.०२.०५ ३५-४५ ११५-१२० सिंचित असिंचित समस्याग्रस्त एवं ऊसर क्षेत्रों हेतु उपयुक्त।
द्दिंलका रहित प्रजातियॉ मैदानी क्षेत्र

 

१. (के० ११४९) गीतांजली २५-२७ ९५-१०० असिंचित दशा हेतु गेरूई कण्डुआ, स्ट्राइप एवं नेट ब्लाच अवरोधी। समस्त उ०प्र० हेतु।
२. नरेन्द्र जौ-५ (एन० डी० बी० ९४३)
(उपासना)
१७-१८-२००८ एस० ओं० (IV) २०.०१.२००९ ३५-४५ ११५-१२० सिंचित समय से बुवाई पर्णीय झुलसा धारीदार रोग, गेरुई रोग, नेट ब्लाच अवरोधी मृदा में स्नातोश्जंक एवं अच्छी उपज |
माल्ट हेतु प्रजातियॉ
१. प्रगति (के० ५०८) द्दः धारीय ३५-४० १०५-११० स्ट्रीप कण्डुआ पीली गेरूई अवरोधी।
२. ऋतम्भरा (के० ५५१) (द्दः धारीय) ४०-४५ १२०-१२५ सिंचित दशा में माल्ट व बीयर के लिये उपयुक्त गेरूई कण्डुआ एवं हेलमेन्थीस्पोरियम बीमारियॉ के लिये अवरोधी। समस्त उ०प्र० हेतु।
३. डी.डब्लू.आर.-२८ ४०-४५ १३०-१३५ सिंचित क्षेत्रों हेतु।
४. डी.एल.-८८ (द्दः धारीय) ४०-४२ १२०-१२५ सिंचित पदैती बुवाई हेतु। समस्त उ०प्र हेतु।
५. रेखा (बी०सी०यू० ७३) (दो धारीय) ४०-४२ १२०-१२५ सिंचित पूर्ण अवरोधी। समस्त उ०प्र० हेतु।

बीज एवं उसका उपचार

अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जहाँ तक संम्भव हो सके, बीज, राष्ट्रीय बीज निगमए राज्य बीज निगमए भारतीय राज्य फार्म निगमए अनुसंन्धान संस्थानों एवं कृषि विश्वविद्यालयों से खरीदना चाहिये। बहुत से कीड़ों एवं बीमारियों के प्रकोप को रोकने के लिए बीज का उपचारित होना बहुत आवश्यक है। कंडुआ व स्मट रोग की रोकथाम के लिए बीज को वीटावैक्स या मैन्कोजैब 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिये। दीमक की रोकथाम के लिए 100 कि.ग्रा. बीज को क्लोरोपाइरीफोस (20 ईसी) की 150 मिलीलीटर या फोरमेंथियोन (25 ईसी) की 250 मिलीलीटर द्वारा बीज को उपचारित करके बुवाई करनी चाहिये।

भूमि एवं उसकी तैयारी

जौ की खेती अनेक प्रकार की भूमियों जैसे बलुईए बलुई दोमट या दोमट भूमि में की जा सकती है। लेकिन दोमट भूमि जौ की खेती के लिए सर्वोत्तम होती है। क्षारीय एवं लवणीय भूमियों में सहनशील किस्मों की बुवाई करनी चाहिये। भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिये।

जौ की अधिक पैदाकर प्राप्त करने के लिए भूमि की अच्छी प्रकार से तैयारी करनी चाहिये। खेत में खरपतवार नहीं रहने चाहिये तथा अच्छी प्रकार से जुताई करके मिट्‌टी भुरभुरी बना देनी चाहिये। खेत में पाटा लगाकर भूमि समतल एवं ढेलों रहित कर देनी चाहिये। खरीफ फसल की कटाई के पश्चात्‌ डिस्क हैरो से जुताई करनी चाहिये। इसके बाद दो क्रोस जुताई हैरो से करके पाटा लगा देना चाहिये। अन्तिम जुताई से पहले खेत में 25 कि.ग्रा.एन्डोसल्फॅान (4 प्रतिशत) या क्यूंनालफॉस (1.5 प्रतिशत) या मिथाइल पैराथियोन (2 प्रतिशत) चूर्ण को समान रूप से भुरकना चाहिये।

बीज एवं उसकी बुवाई

जौ के लिए समय पर बुवाई करने से 100 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। यदि बुवाई देरी से की गई है तो बीज की मात्रा में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर देनी चाहिये। जौ की बुवाई का उचित समय नवम्बर के प्रथम सप्ताह से आखिरी सप्ताह तक होता है लेकिन देरी होने पर बुवाई मध्य दिसम्बर तक की जा सकती है। बुवाई पलेवा करके ही करनी चाहिये तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 22.5 से.मी. एवं देरी से बुवाई की स्थिति में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 से.मी. रखनी चाहिये।

बोने का समय:

  • असिंचित : सभी क्षेत्रों में २० अक्तूबर से १० नवम्बर तक
  • सिंचित समय में : 25 नवम्बर तक
  • बिलम्ब से :  दिसम्बर के दूसरे पखवारे तक

बीज की मात्रा बुवाई की विधि:

  • असिंचित :  100 किग्रा. प्रति हेक्टेयर
  • सिंचित   :   75 किग्रा. प्रति हेक्टेयर
  • पछेती बुवाई  :  100 किग्रा. प्रति हेक्टेयर

बुवाई की बिधि:
बीज हल के पीछे कुंदो में २३ सेमी. की दूरी  पर ५-६ सेमी. गहरा  बोयें | असिंचित दशा में बुवाई ६-८  सेमी. गहराई में करें जिससे जमाव के लिए पर्याप्त नमी मिल सके |

खाद एवं उर्वरकों की मात्रा

जौ की सिंचित फसल के लिए 60 कि.ग्रा.नाइट्रोजन एवं 40 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। असिंचित क्षेत्रों के लिए 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 40 कि.ग्रा. फॅास्फोरस प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है। खेत की तैयारी के समय 5 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद डालकर अच्छी प्रकार से मिट्‌टी में मिला देनी चाहिये। सिंचित क्षेत्रों के लिए फास्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा एवं नाइट्रोजन की आधी मात्रा डीएपी या यूरिया व सिंगल सुपर फॅास्फेट के द्वारा बुवाई के समय पंक्तियों में देनी चाहिये। 40 कि.ग्रा. फॅास्फोरस व 15.6 कि.ग्रा. नाइट्रोजन देने के लिए 87 कि.ग्रा. डीएपी तथा शेष 14.4 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की मात्रा देने हेतु 31 कि.ग्रा.यूरिया को मिलाकर बुवाई के समय देना चाहिये। असिंचिंत क्षेत्रों के लिए सम्पूर्ण फॅास्फोरस (40 कि.ग्रा.) व नाइट्रोजन (40 कि.ग्रा.) की आपूर्ति हेतु 87 कि.ग्रा. डीएपी में 53 कि.ग्रा. यूरिया मिलाकर प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के समय पंक्तियों में देनी चाहिये। सिंचित क्षेत्रों के लिए शेष 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की मात्रा 65 कि.ग्रा. यूरिया के द्वारा प्रथम सिंचाई के साथ देनी चाहिये ।

सिंचाई

जौ की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 4-5 सिंचाई पर्याप्त होती है। प्रथम सिंचाई बुवाई के 25-30 दिन बाद करनी चाहिये। इस समय पौधों की जड़ों का विकास होता है। दूसरी सिंचाई 40-45 दिन पश्चात्‌ देने से फुटान अच्छी प्रकार होता है। इसके पश्चात्‌ तीसरी सिंचाई फूल आने पर एवं चौथी सिंचाई दाना दूधिया अवस्था में आने पर करनी चाहिये।

खरपतवार नियंत्रण

जौ की फसल के पौधों के साथ अनेक प्रकार के खरपतवार जैसे बथुआ खरतुआ फ्लेरिस माइनर हिरणखुरी मौरवा, प्याजी, दूब इत्यादि उगते हैं तथा नमी पोषक तत्व प्रकाश एवं स्थान के लिए फसल के पौधों के साथ प्रतिस्पर्धा कर उनकी वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करते हैं एवं फसल उत्पादन कम करते हैं फसल के पौधों की अच्छी बढ़कर के लिए फसल प्रथम 30-40 दिनों तक खरपतवार मुक्त रहनी आवश्यक है। जौ की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए फसल की बुवाई के दो दिन पश्चात्‌ तक पेन्डीमैथालीन नामक खरपतवार नाशी कीे 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिये। इसके बाद जब फसल 30-40 दिनों की हो जाये तो 2, 4-डी 72 ईसी खरपतवार नाशी की एक लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिये। यदि खेत में गुल्ली डन्डा (फ्लेरिस माइनर) का अधिक प्रकोप दिखाई दे तो प्रथम सिंचाई के बाद आईसोप्रोटूरोन 75 प्रतिशत की 1.25 कि.ग्रा. मात्रा का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव करना चाहिये।

कीटों एवं बीमारियों की रोकथाम

जौ की फसल मे अनेक प्रकार के कीट एवं बीमारियों का प्रकोप होता है। जिसके कारण फसल में काफी नुकसान होता हैं। अतः उपज की हानि को रोकने के लिए उचित समय पर कीटों एवं बीमारियों का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है।

दीमक

दीमक फसल के पौधों की जड़ें काट देती है जिसके कारण फसल के पौधें सूख जाते है एवं फसल को काफी नुकसान होता है। दीमक के प्रभावी नियंत्रण के लिए खेत की तैयारी के समय अन्तिम जुताई पर एन्डोसल्फॅान, क्यूनाल फॅास या मिथाइल पैराथियोन की 25 कि.ग्रा. चूर्ण की मात्रा को भूमि में अच्छी प्रकार मिला देनी चाहिये। बीज को बुवाई के समय क्लोरोपाइरीफोस की 150 मिलीलीटर मात्रा से 100 कि.ग्रा. बीज उपचारित करके प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई करनी चाहिये। यदि खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप हो जाये तो क्लोरोपाइरीफोस 20 ईसी की चार लीटर या एन्डोसल्फान 35 ईसी की 2.50 लीटर मात्रा को सिंचाई के पानी के साथ खेत में देनी चाहिये।

फली बीटल और फील्ड क्रिकेटस

फली बीटल तथा फिल्ड क्रिकेटस पौधों को काटकर नुकसान पहुँचाते है। इन कीटों से प्रभावित खेतों में मिथाइल पैराथियोन 2 प्रतिशत की 25 कि.ग्रा. मात्रा को सुबह या शाम के समय खेत में समान रूप से भुरकाव करना चाहिये।

मोयला, माहू या एफिड

माहू या एफिड का प्रकोप फसल में फूल आने के बाद दाना बनते समय अधिक होता हैं इसके प्रकोप के कारण फसल उपज काफी प्रभावित होती है तथा दाने की गुणवत्ता में कमी आ जाती है एफिड के नियंत्रण हेतु रौगोर की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी या इमीडाक्लोप्रिड की 750 मिलीलीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये। यदि आवश्यक हो तो दूसरा छिड़काव प्रथम छिड़काव के 15 दिनों बाद करना चाहिये।

मोल्या रोग (सिस्ट नेमाटोड)

इस रोग के प्रकोप के कारण पौधों की जड़ों में गाँठें बन जाती हैं तथा रोग से ग्रसित पौधों की ऊँचाई कम रह जाती है एवं पौधें पीले पड़ जाते हैं। इस रोग के कारण पौधों में फुटान कम होता है तथा बालियाँ कम बनती हैं इसके नियंत्रण के लिए रोगरोधी किस्में जैसे आरडी 2052ए आरडी 2035ए आरडी 2592 की बुवाई करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त जौ की फसल एक खेत में लगातार नहीं बोनी चाहियें। मोल्या रोग से ग्रसित खेत में चनाए सरसोंए मैथीए प्याज इत्यादि फसलें फसल चक्र में सम्मिलित
करनी चाहिये। गर्मियों में खेत की जुताई करनी चाहिये। मोल्या रोग से प्रभावित खेत में बुवाई से पहले 30 कि.ग्रा. कार्बोफ्यूरोन 30 प्रतिशत कण प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में उर कर बुवाई करनी चाहिये।

अनावृत्त कडुंवा रोग एवं पत्ती कडु़ंवा रोग

यह रोग बहुत गंभीर होता है, व इसके कारण बालियों में दानों के स्थान पर काला पाउडर भर जाता है। रोग दिखाई देते ही रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिये क्योंकि अनावृत्त कंडुवा से ग्रसित पौधे की बालियां काली पड़ जाती है तथा इस रोग के रोगाणु हवा के साथ सम्पूर्ण खेत में फैल जाते है। कडुं़वा रोग की रोकथाम के लिए बीज को उपचारित करके बुवाई करनी चाहिये। अनावृंत कंड़ुवा के लिए वीटावैक्स या बाविस्टीन या मैन्कोजेब की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलो बीज को उपचारित करके बुवाई करने पर कडुंवा रोग से बचाव किया जा सकता है।

झुलसा एवं पत्ती धब्बा रोग

इन दोनों बीमारियों के कारण पत्तियों पर पीले एवं भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं ये बीमारियां बहुत तेजी से फैलती है तथा फसल को काफी नुकसान पहँुचाती है। इस रोग की रोगथाम के लिए रोगरोधी किस्मों को बुवाई के लिए काम में लेना चाहिये तथा जनवरी के प्रथम सप्ताह से 15 दिनों के अन्तर पर 2 कि.ग्रा. मैन्कोजेब या 3 कि.ग्रा. कापर ऑक्सीक्लोराइड या जिनेब की 2.50 कि.ग्रा. मात्रा को 500 लीटर लीटर पानी में घोल बनाकर 3 से 4 छिड़काव करने चाहिये।

रोली रोग

इस रोग के कारण फसल की पत्तियों पर पीले या भूरे या लाल भूरे तथा काले रंग के फफोले बन जाते है। इस रोग के कारण पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है तथा बालियों में दाने कम बनते है एवं सिकुड़े हुए होते है। रोग के लक्षण दिखाई देने पर गन्धक के चूर्ण की 25 कि.ग्रा. मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से सुबह या शाम भुरकाव करना चाहिये। प्रकोप अधिक होने पर 15 दिनों के अन्तर पर पुनः भुरकाव करना चाहिये। रोली की रोकथाम के लिए ट्राइड्रेमार्फ 80 प्रतिशत (कैलेक्सीन) या मैन्कोजेब की 750 मिलीलीटर मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है।

चूहा नियंत्रण

खेत में चूहों का प्रकोप फसल की विभिन्न अवस्थाओं पर होता है। दाना बनते समय चूहें फसल को काटकर सबसे अधिक नुकसान पहँुचाते है। फसल को नुकसान से बचाने के लिए चूहों के बिल में एक भाग जिंक फास्फाइड को 47 भाग आटा और दो भाग तिल या मूंगफली के तेल में मिलाकर विषैला चुग्गा तैयार करके प्रत्येक बिल में लगभग 6 ग्राम चुग्गा रखना चाहिये तथा मरे हुए चूहों को मिट्‌टी में गाड़ देना चाहिये। चूहों के बिल में विषैला चुग्गा डालकर खिलाने से पहले चूहों को बिना झिझक किये चुग्गा खाने की आदत डालनी चाहिये। इसके लिए पहले सादा चुग्गा बिल में डालना चाहियेए जिससे कि वे विषैला चुग्गा खाने में संकोच न करें। विषैला चुग्गा बच्चों एवं जानवरों की पहुँच से दूर रखना चाहिये।

फसल चक्र

भूमि की उर्वरा शक्ति बनाये रखने एवं फसल को अनेक प्रकार के कीटों एवं बीमारियों के प्रकोप को कम करने के लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिये। अनेक फसल चक्र जैसे बाजरा-जौए मूंगफली-जौए ग्वार-जौए मूंग-जौए बाजरा-जौ-ग्वार/मूंग-जौ-बाजरा-सरसों इत्यादि फसल चक्र अपनाये जा सकते है।

बीज उत्पादन

जौ की फसल स्वपरागित होती है। इसमें प्राकृतिक परागण कम ही होता है। किसान कुछ बातों का ध्यान में रखकर जौ का बीज अपने खेत पर ही उगा सकते है। जौ के बीज उत्पादन करने के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहियेए जिसमें पिछले वर्ष जौ की फसल की बुवाई न की गई हो। खेत के चारों ओर कम से कम 5 से 10 मीटर की दूरी तक जौ की फसल न उगायी गयी हो। फसल की बुवाई के लिए उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिये तथा उसमें जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिये। खेत की अच्छी प्रकार जुताई करके पाटा लगाकर भूमि भुरभुरी बना लेनी चाहिये तथा अनुंशासित खाद एवं उर्वरक की उचित मात्रा प्रयोग करनी चाहिये। बुवाई के लिए आधार बीज या प्रमाणित बीज उपयोग में लेना चाहिये। बीज की उचित मात्रा (100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर) प्रयोग करके फसल की बुवाई पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 से.मी. रखते हुए नवम्बर माह में कर देनी चाहिये। सिंचाई फसल की उचित अवस्थाओं जैसे शीर्ष जड़ बनने की अवस्था (25-30 दिन बाद)ए फूटान आने की अवस्था (40-45 दिन बाद) गाँठे बनने की अवस्था (70-75 दिन बाद) फूल आने की अवस्था (90-95 दिन बाद) एवं दुग्धावस्था (110-115 दिन बाद) पर करनी चाहिये। फसल में फूल आने की अवस्था पर तथा पकने की अवस्था पर अवांछित पौधों को खेत से निकाल देना चाहिये। इनमें अलग प्रकार के पौधे तथा बीमारी से ग्रसित पौधे विशेष रूप से कडु़ंवा से ग्रसित पौधों को फसल की कटाई से पहले नष्ट कर देना चाहिये। यदि फसल में कीटों या बीमारियों का प्रकोप हो तो उचित कीट एवं फफूंदनाशियों का प्रयोग करके उचित समय पर नियंत्रण करना आवश्यक है। फसल जब अच्छी तरह से पक जाये तो चारों ओर 5 से 10 मीटर फसल छोड़ते हुए कटाई करनी चाहिये। कटी फसल को अच्छी प्रकार से साफ किये गये अलग खलिहान में सूखने के लिए रखना चाहिये। फसल जब अच्छी प्रकार सूख जाये तथा दाने में 8 से 9 प्रतिशत तक नमी रह जाये तो थै्रशर द्वारा दाने को भूसे से अलग कर लेना चाहिये। दाने को अच्छी प्रकार सुखाकर एवं ग्रेडिंग करके साफ कर, उपचारित कर बोरों में या लोहे की कोठी में भर कर मैलाथियोन 5 प्रतिशत चूर्ण या फेनवलरेट चूर्ण की 250 ग्राम मात्रा को प्रति क्विंटल बीज दर से मिलाकर या एल्यूमिनियम फास्फाइड की गोली या ईडीबी एम्प्यूल को तोड़ कर अनाज के बीच में दबा देना चाहिये तथा कोठी को अच्छी प्रकार से बन्द कर देनी चाहिये।

फसल कटाई एवं गहाई

फसल के पौधे एवं बालियां जब सूखकर पीली या भूरी पड़ जाये तो कटाई कर लेनी चाहिये। अधिक पकने पर बालियां गिरने की आशंका अधिक हो जाती है। फसल की कटाई करने के बाद अच्छी प्रकार सूखाकर थै्रशर द्वारा दाने को भूसे से अलग कर देना चाहिये तथा अच्छी प्रकार सूखाकर एवं साफ करके बोरों में भरकर सुरक्षित स्थान पर भण्डारित कर लेना चाहिये।

उपज एवं आर्थिक लाभ

उन्नत विधियों द्वारा खेती करने पर एक हैक्टेयर क्षेत्र में 35-40 क्विंटल दाने एवं 50-55 कुन्तल भूसे की उपज प्राप्त की जा सकती है। एक हैक्टेयर क्षेत्र में जौ की खेती करने पर लगभग 25 हजार रुपये प्रति हैक्टेयर का खर्च आता है इस प्रकार लगभग 25 से 30 हजार रूपये प्रति हैक्टेयर का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
स्त्रोत

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