परिंदो को मिलेगी मंज़िल एक दिन,
ये फैले हुए उनके पर बोलते है,
और वही लोग रहते है खामोश अक्सर,
ज़माने में जिनके हुनर बोलते है ..

 

जो अपनी कमजोरियों मे आग लगा सकते है,
उन्हें हक है वो सूरज से आंख मिला सकते है,
बुलंदिया ही जिनका मकसद बन गई हों,
वो मुश्किलों से अपनी मंजिल छीन सकते है।

 

रोता वही है जिसने महसूस किया हो सच्चे रिश्ते को..
वरना मतलब के रिश्तें रखने वाले को तो कोई भी नही रूला सकता..

कभी इनका हुआ हूं मै,
कभी उनका हुआ हूं मै
खुद के लिए कोशिश नहीं की,
मगर सबका हुआ हूं मै
मेरी हस्ती बहुत छोटी, मेरा रूतबा नही कुछ भी
लेकिन डूबते के लिए सदा तिनका हुआ हू मै

जाते जाते उसने ये तो कहा
अपना ख्याल रखना,
पर उसकी आंखे कह रही थी,
अब मेरा ख्याल कोन रखेगा।

अब न ख्व़ाबों से, ख़िलौनों से, बहल पाऊँगा,
वक़्त गुम हो गया, मुझसे मेरा बचपन लेकर

—-

जो मौत से ना डरता था, बच्चों से डर गया…
एक रात जब खाली हाथ मजदूर घर गया…!

—-

मुझे अपने लफ़्जो से आज भी शिकायत है,
ये उस वक़त चुप हो गये जब इन्हें बोलना था…

 

पूछो ना उस कागज से,
जिस पर हम दिल की बातें लिखते है,
वो कलम भी दीवानी हो गयी,
जिससे हम तुम्हारा नाम लिखते है..

—-“सुमित महाराज झाँसी”

 

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