जिनका मिलना मुकद्दर मे लिखा नही होता
उनसे मुहब्बत कसम से कमाल की होती है ।

 

आज मैने पीने से तौबा कर ली..
उन्होंने नज़रों से पिलाने का वादा किया है..

 

“आलिंगन को तरस रही है चार मिनारे ताज की,
दो बाँहे शाहजहां कि , दो बाँहे मुमताज की”

 

” तूने कहा सुना हमने, अब मन टटोलकर सुन ले तू
सुन सुन ओ मंत्री बडबोले, कान खोलकर सुन ले तू
तुझको शायद इस हरकत पे शरम नहीं है आने की
तूने हिम्मत कैसे कर ली यू.एन.ओ.तक जाने की
इस धरती से प्यारा हमको,इस दुनिया में और नहीं
भारत माता की गोदी से, बढकर कोई ठोर नहीं
घर से बाहर जरा निकल के अकल खुजाकर के पूछो
हम कितने हैं यहां सुरक्षित, हमसे आकर के पूछो
पूछो हमसे गैर मुल्क में मुस्लिम कैसे जीते हैं
पाक, सीरिया, फिलस्तीन में खूं के आंसू पीते हैं
इजरायल की गली गली में मुस्लिम मारा जाता है
अफगानी सडकों पर जिंदा शीश उतारा जाता है
यही सिर्फ वह देश जहां सिर गौरव से तन जाता है
यही मुल्क है जहां मुसलमान राष्ट्रपति बन जाता है
इसीलिए कहता हूँ तुझसे, टांग अडाना बंद करो
जाकर अपनी भैंसे ढूंढो,हमें लडाना बंद करो
बंद करो नफरत की बातें,जहर उगलती चालों को
बंद करो भडकाऊ भाषण, विष से बुझे सवालों को
तुझको जाना है तो जा हम गीत इसी के गायेंगे
यहीं हमारा जनम हुआ था,यहीं दफन हो जायेंगे”

 

—तुम सो जाओ अपनी दुनिया में आराम से,
मेरा अभी इस रात से कुछ हिसाब बाकी है ,,,

 

—जब भी मिलता है वो, अंदाज़ जुदा होता है,
चाँद सौ बार भी निकले तो नया होता है,,,

 

खुदा ने मुझे, बड़े ही वफ़ादार दोस्तों से नवाज़ा हैं..
याद मैं ना करु तो …गलती वो भी नहीं करतें.!!

 

हमें ..तो ..खुशियों ..में …साथी ..चाहिये..!
दुँखो ..में तो ..हमारी ..माँ ..अकेली ही काफ़ी हैं।

 

न जाने किसकी दुआओं का फेज़ हैं मुझपर..
मैं जब भी डूबता हू्ँ …दरियाँ उछाल देता हैं॥

 

पसीने की स्याही से, जो लिखते हैं अपने इरादे..
उनके मुकद्दर के पन्ने, कभी कौरे नहीं हुआ करते।

 

तेरे शहर में आने का भी, क्या खूब आलम रहा..
किसी काम से आए थे, किसी काम के नहीं रहें.!!

 

उलझनें क्याँ बताऊं, ज़िन्दगी की..!!
उसी के गले लगकर, उसी की शिकायत करनी हैं.!!

 

बुलंदियों को पाने की ख्वाहिशें, ..तो बहुत थी,
मगर, दूसरों को रौंदने का हूनर, कहाँ से लाता.!!

 

समय की धुँन्ध में ..छिप जाते हैं ..ताल्लुक..!!
बहुत दिनों ..किन्हीं आँखों से ..ओझल ना रहियें.!!

 

हालात ..कर देते हैं ..भटकने पर मजबूर.!!
घर से निकला हर शक्स, ..आवारा नहीं होता.!!

 

ऐ दिल.. चल एक सौदा करते हैं…
तु धड़कना छौड़ दे, मैं तड़पना छौड़ दूँगा।

 

“न दहकती रूप शिखा न मोहक श्रंगार लिखो
आज गरीबी महंगायी लाचारी की मार लिखो,
.
-जिन आँखों में पले नही सुंदर स्वप्न सजीले
उन आँखों की खातिर भी सपनों के आधार लिखो,
.
-प्रीत ,प्रणय ,समर्पण पर तो चल चुकी कलम बहुत
मानव को मानव से जोड़े अब ऎसे अशआर लिखो,
.
-विजय पताका के आगे तो झुकता सबका शीश यहाँ
आज विजय -रण में कुचली मानवता की हार लिखो,
.
-निरंतर कल कल बहती रह्ती अविरल जीवन धारा
बाधाओं से न रुक जाना , ये जीवन का सार लिखो”

 

ऐ नींद, अब तो सुलह कर ले हमसे..
वो दौर चले गयें, जिनके लिए हम जागा करते थे॥

 

दस्तूर के लिखें पर टिकना, मुनासिब नहीं दोस्तों..
ये अक्सर मौके कम.. और धौके ज़्यादा देता है।

 

क्याँ खूब सौदा किया, वक्त ने मुझसे..
तज़ुर्बा दे कर, वो मेरी मासूमियत ले गया..!!

 

बस यहीं दौ मसले, जिन्दगी भर ना हल हुए..
ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए..!!

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