-जागा रहा तो मैँने कई काम कर लिए,
-ऐ नीँद आज तेरे न आने का शुक्रिया ,,,

“भूल जाने का मशवरा और जिँदगी बनाने की सलाह,ये कुछ तोहफे मिले है हमे उनसे आखिरी मुलाकात मे..!!

लोग कहते हैं ज़मीं पर किसी को खुदा नहीं मिलता,
शायद उन लोगों को दोस्त कोई तुम-सा नहीं मिलता……!!

किस्मतवालों को ही मिलती है पनाह किसी के दिल में,
यूं हर शख़्स को तो जन्नत का पता नहीं मिलता……….!!

अपने सायें से भी ज़यादा यकीं है मुझे तुम पर,
अंधेरों में तुम तो मिल जाते हो, साया नहीं मिलता……..!!

इस बेवफ़ा ज़िन्दगी से शायद मुझे इतनी मोहब्बत ना होती
अगर इस ज़िंदगी में दोस्त कोई तुम जैसा नहीं मिलता…!!

“दिल का हो रिश्ता तो नीयत नहीं देखी जाती
इश्क़ इबादत में दिमागी नसीहत नहीं देखी जाती,
पत्थर की पूजा से मिल जाए जब हौंसला
कबीर के दोहों की तब अहमियत नहीं देखी जाती,
भक्ति में मीरा जब हो जाए प्रेम दीवानी
रजवाड़ों की झूठी शानोशोकत नहीं देखी जाती,
इश्क़ और इबादत रिश्ता है दिलों का
सीरत हो अच्छी तो सूरत नहीं देखी जाती,
इश्क़,इबादत,जंग’ठलुआ’ ये जुनूनी काम है
जज्बाती सफ़र मे खुद की तबीयत नहीं देखी जाती”

“ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिए वक़्त रुकता नही किसी के लिए ,,,

” ज़िन्दगी का ये हुनर भी आज़माना चाहिए..

जंग अपनो से हो ..तो हार जाना चाहिए..!!

“अब मोहब्बत खत के काबिल भी नही है,

इसलिए अब लोग खत लिखते भी नही हैँ”

“वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से,
मैं एतबार न करता तो क्या करता”

“जब उसूलोँ पर बात आए
टकराना ज़रुरी है,

जो ज़िँदा हो तो फिर नज़र
आना ज़रुरी है”

” उजड़ी दुनिया को तु ….आबाद ना कर..
बीते लम्हो को ….. फिर याद ना कर..

एक कैद परिंदे का तुझसे …यहीं हैं कहना..
मैं भुल चुका हुँ उङना …मुझे आज़ाद ना कर..”

“अभी तो साथ चलते है समंदर की मुसाफत तक,

-किनारे पर फिर देखेंगे
किनारा कौन करता है”

” प्यार का पौधा .. लगाने से पहले…
………ज़मीन परख लेना …मेरे यारो…

क्योँकि…हर मिट्टी मे…वफ़ा नहीं होती..”

” ये श्याही भी …क्या खुब चिज़ हैं जनाब…

अगर खुद बिखरे तो दाग बना देती हैं..
और …कोई बिखैरे …तो अलफाज़ बना देती हैं..”

” कुछ इस तरह सौदा किया…वक्त ने मुझसे…

तजुर्बा दे कर… वो मेरी मासुमियत ले गया…”

“छतरी लगा के घर से निकलने लगे है हम
अब कितनी अहतियात से चलने लगे है हम,

-इस तरह होशियार तो पहले कभी ना थे
अब क्युं कदम कदम पे संभलने लगे है हम,

-हो जाते है उदास कि जब दोपहर के बाद
सूरज पुकारता है कि ढलने लगे है हम,

-ऐसा नही कि बर्फ की तरह हूं मगर
लगता है यूंकी जैसे पिघलने लगे है हम,

-आईना देखने की जरूरत ना थी कोई
खुद जानते थे कि बदलने लगे है हम,

-इसका यकीन आज भला किसको आएगा
इक धीमी धीमी आंच में जलने लगे है हम”

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