कैसे चले जाते हों
क्यूँ आते हों?
क्या रिश्ता है
क्यूँ दिल दुखते हों?
ऐसा क्यूँ हों रहा है
याद तुम्हारी क्यूँ आती है
क्यूँ मेरी आँख नम हों जाती है
मेरी आँखों के कोने क्यूँ भीग रहे हैं
क्यूँ दो बूंदे चुपके से गिर रही हैं
क्यूँ “राज” क्यूँ?
क्या हों रहा है ये
क्यूँ मैं लिख रहा हूँ
क्या किसी से बात करना किसी मतलब से ही जरुरी है?
क्या बिना मतलब के बात नहीं होती?
क्या किसी रिश्ते के लिए कोई नाम होना जरुरी है?
क्या आपस का भरोसा, विश्वास जरुरी नहीं?
एक बात है
एक शख्श मिलता है
दो बाते करता है फिर चार और फिर खूब
बाते करता है
इंसान खूब सारी बाते तो उससे करता है ना
जिससे उसका कुछ तो दिल मिलता है
और जब दिल मिलता है तो
अपनापन भी तो लगता है
फिर एक दिन अचानक…



धीरे धीरे…


वो चला जाता है…
दूर चला जाता है…
कहीं दूर चला जाता है……
अगर किसी को जाना ही होता है
तो आता क्यूँ है
दिल को लुभाता क्यूँ है
अपना होने का एहसास करता क्यूँ है..

पर हम किसी से कुछ नहीं कहते
तुम्हे भी नहीं कहेंगे..
एक गाना मुकेश जी का सुना था…
..”अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी की दिल टूट………”

खुदा जाने..
जब जाना था तो आये क्यूँ????
आते… रहते तो अच्छा लगता
चले जाते तो भी….इतना बुरा ना लगता

पर आये, ठहरे, अपनापन॥ जताया और बिना बताये चले गए..
बुरा लगता है…
मन में जो ख्याल होते हैं ना……टूट जाते हैं
दुःख तब होता है…जब किसी कोने में खुद को अकेला महसूस करता है..
या तो खुदा इंसान बनाता नहीं,
बनाया तो जजबात नही देता
और दिए तो दिल ना मिलाता
मिलाये तो दूर क्यूँ कर दिए…
क्यू फिर क्यू …फिर दिल मिलाये क्यूँ
खुदा भी खेल खेलता है हमारे साथ
ऊपर बैठे बैठे
शतरंज की चाल चलता है दोनों तरफ से…
वाह रे वाह…
तू और तेरी खुदाई!!!!
फिर वो लफ्ज याद आते हैं..
“बुझाना ही था एक दिन तो आस का दीया जलाया ही क्यूँ था,
मैं तो हर हाल में जी रहा था फिर जन्नत का एहसास कराया ही क्यूँ था””
फिर
और नहीं लिख पाउँगा
इससे ज्यादा
की
किसी ने सच कहा
“हम ना समझे थे, बात इतनी सी,
ख्वाब शीशे के, दुनिया मतलब की”
कोई समझ आती दुनिया की ..
या तो हम दुनिया वालो के लायक नहीं
या फिर दुनिया हमारे लायक नहीं……………

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