1 (1)

1.आच्छादान
(अ) मृदाच्छादन : हम जब दो बैलों से खींचने वाले हल से या कुल्टी (जोत) से भूमि की काश्तकारी या जोताई करते हैं, तब भूमि पर मिट्टी का आच्छादन ही डलते हैं। जिस से भूमि की अंतर्गत नमी और उष्णता वातावरण में उड़कर नहीं जाती, बची रहती है।
(ब) काष्टाच्छादन : जब हम हमारी फ़सलों की कटाई के बाद दाने छोड़कर फ़सलों के जो अवशेष बचते हैं, वह अगर भूमि पर आच्छादन स्वरूप डालते हैं, तो अनंत कोटी जीवजंतु और केंचवे भूमि के अंदर बाहर लगातार चक्कर लगाकर चौबीस घंटे भूमि को बलवान, उर्वरा एवं समृद्ध बनाने का काम करते हैं और हमारी फ़सलों को बढ़ाते हैं।
(स) सजीव आच्छादन : हम कपास, अरंडी, अरहर, मिर्ची, गन्ना, अंगूर, अमरुद, लिची, इमली, अनार, केला, नारियल, सुपारी, चीकू, आम, काजू आदि फ़सलों में जो सहजीवी आतर फसलें या मिश्रित फसलें लेते हैं, उन्हें ही सजीव आच्छादान कहते हैं।

2. वाफसा :- वाफसा माने भूमि में हर दो मिट्टी के कणों के बीच जो खाली जगह होती है, उन में पानी का अस्तित्व बिल्कुल नहीं होना है, तो उन में हवा और वाष्प कणों का सम मात्रा में मिश्रण निर्माण होना। वास्तव में भूमि में पानी नहीं, वाफसा चाहिए। याने हवा 50% और वाष्प 50% इन दोनों का समिश्रण चाहिए। क्योंकि कोई भी पौधा या पेड़ अपने जड़ों से भूमि में से जल नहीं लेता, बल्कि,वाष्प के कण और प्राणवायु के याने हवा के कण लेता है। भूमि में केवल इतना जल देना है, जिसके रूपांतर स्वरूप भूमि अंतर्गत उष्णता से उस जल के वाष्प की निर्मिती हो और यह तभी होता है, जब आप पौधों को या फल के पेड़ों को उनके दोपहर की छांव के बाहर पानी देते हो। कोई भी पेड़ या पौधे की खाद्य पानी लेने वाली जड़े छांव के बाहरी सरहद पर होती है। तो पानी और पानी के साथ जीवामृत पेड़ की दोपहर को बारह बजे जो छांव पड़ती है, उस छांव के आखिरी सीमा के बाहर 1-1.5 फिट अंतर पर नाली निकालकर उस नाली में से पानी देना चाहिए।

 

Advertisements