अन्तरवर्तीय फसल पद्धति अधिक श्रेष्ठ, लाभदायक एवं उपयुक्त सिद्ध हुई है | इस पद्धति में मुख्य एवं अन्तरवर्तीय फसल का बीज कतारों में अलग – अलग बोया जाता है| इस पद्धति को अपनाने से डेढ गुना उत्पादन के साथ साथ अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करना संभव हो जाता है|

इसके उपरांत कई लाभ प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होते है जैसे –

  1. दोनो फसलों के पत्तो की भिन्न – भिन्न संरचना एवं वृद्धि का समय अलग अलग होने से सूर्य के प्रकाश व् स्थान का पर्याप्त उपयोग |
  2. दोनों फसलों की जड़ों की संरचना अलग होने से भूमि की विभिन्न सतहों से पोषक तत्व एवं पानी का पूरा पूरा उपयोग |
  3. कीट, पौध रोगों व् खरपतवारों का समन्वित नियंत्रण |
  4. भूक्षरण की रोकथाम के साथ जल संचय एवं जल संवर्धन में सहायता |
  5. दोनों फसलों का पकने का समय अलग – अलग होने से प्रबन्धं करने में सरलता |
  6. शीघ्र पकने वाली फसलों से त्वरित आर्थिक लाभ |
  7. अन्तरवर्तीय फसल पद्धति में कोई फसल किसी कारण से ख़राब होती है तो उसके स्थान पर दूसरी फसल से लाभ हो जाता है |
  8. अनाज, दालें, तिलहन, चारे आदि की घरेलु आवश्यकता की पूर्ति में सहायक |
  9. खाद, उर्वरक व् पोषक तत्वों का समुचित उपयोग |

सावधानी:- इस पद्धति को अपनाने के लिए ऐसी फसलों व् जातियों का चुनाव करना चाहिए जो आपस में सूर्य के प्रकाश, पोषण एवं पानी के लिए एक ही समय में स्पर्धा न करती हों

1 (2)

Advertisements